क्‍या ऑड-ईवन पर टिकी है आम आदमी पार्टी की आखिर उम्मीद

बेंगलुरु। सर्दी के मौसम में दिल्ली की सड़कों पर एक बार फिर से ऑड-ईवन योजना देखने को मिलेगी। दिल्ली की अरविंद केजरीवाल सरकार ने शुक्रवार को ऐलान किया कि दिल्ली में 4 नवंबर से लेकर 15 नवंबर तक ऑड-ईवन नियम लागू होगा। माना जा रहा है कि प्रदूषण को ध्यान में रखते हुए केजरीवाल सरकार ने यह फैसला लिया है। लेकिन दिल्ली के मुखिया की आम आदमी पार्टी की सत्ता बचाने की ये आखिरी कोशिश हैं।

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उन्‍हें भी यह अच्‍छे से मालूम है के दिल्ली के अगले विधानसभा में उनकी झाड़ू चुनाव चिन्‍ह वाली आम आदमी पार्टी का सूपड़ा साफ हो जाएगा। उनकी पार्टी में एक दो को छोड़कर सभी कद्ददार नेताओं ने किनारा कस लिया हैं।

पिछले विधानसभा चुनाव में उनके लोकलुभावने वादों के कारण दिल्ली के लोगों ने उनकी पार्टी को वोट दिया था। लेकिन दिल्ली की जनता को उनकी असलियत मालूम पड़ चुकी है। बीतें पांच सालों में पार्टी की पूरी हवा निकल चुकी हैं।

चूंकि पिछली बार ऑड-ईवन लागू करने के बाद केजरीवाल सरकार के इस अनोखे कानून ने उन्‍हें भारत ही नहीं विदेश तक पाॅपुलर बनाया था तो दिल्ली विधान सभा के ठीक पहले उन्‍हें इस कानून की याद आ गयी।

बता दें आम आदमी पार्टी 2019 के लोकसभा चुनाव में 40 सीटों पर लड़ी, मगर उसे कामयाबी सिर्फ़ एक सीट पर मिली। यही नहीं, दिल्ली में जहाँ कि उसी की पार्टी की सरकार है, वहाँ भी पार्टी को सीभी सात सीटों पर हार का मुँह देखना पड़ा। इसके साथ ही वोट प्रतिशत के लिहाज़ से भी ये पार्टी बीजेपी और कांग्रेस के बाद तीसरे नंबर पर पहुंच गई थी। जबकि साल 2014 के लोकसभा चुनाव में इसी पार्टी को पंजाब की चार सीटों पर जीत हासिल हुई थी।

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लोकसभा चुनाव में इतने खराब प्रदर्शन के बाद पार्टी के अंदर और बाहर सभी ओर से पार्टी के नेतृत्व पर सवाल उठाए जाने लगे थे।अभी पिछले दिनों दिल्ली के चांदनी चौक से विधायक अलका लांबा ने आम आदमी पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा दिया और कांग्रेस में शामिल हो गई हैं। अलका लांबा के अलावा आशीष खेतान, कुमार विश्वास, आशुतोष, कपिल मिश्रा, योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, शाजिया इल्मी जैसे जाने-माने चेहरों ने आम आदमी पार्टी को पहले ही अलविदा कह दिया था।

किसी ने कांग्रेस की सदस्यता ले ली है तो किसी ने भाजपा की तो किसी ने राजनीति को अलविदा कह दिया है। ये सभी 2012 में पार्टी की शुरुआत के जाने-माने चेहरे थे। अन्ना आंदोलन के दौरान किरण बेदी भी अरविंद केजरीवाल की सहयोगी हुआ करती थीं। इन सभी के जाने के बाद आम आदमी पार्टी के शुरुआती और अब के स्वरूप में बहुत अंतर आ गया है। कुल मिलाकर अरविंद केजरीवाल पार्टी में अकेले पड़ गए हैं और अकेले दम पर दोबारा सत्ता हासिल कर पाना नामुमकिन है।

अन्‍नाहजारे द्वारा भष्‍ट्राचार के विरोध में किए गए आंदोलन के समय सभी वैचारिक स्तर पर एकजुट हुए थे। लेकिन जब इसमें जुटे लोगों के मिलन ने पार्टी का स्वरुप लिया तो वह प्रयोग था। पार्टी के गठन के एक साल के अंदर ही आपसी मतभेद शुरु हो गया था। जिस पार्टी की बुनियाद एक आंदोलन के रूप में, साफ-सुथरी राजनीति और भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ थी वह जब जब सत्ता में आयी तो सबकुछ बदल गया। वहीं जिस भ्रष्‍टाचार मुक्त और साफसुथरी राजनीति के दम पर आए थे जिस कारण कार्यकताओं और जनता में उत्साह था वह सब निराश हुए हैं।

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आम आदमी पार्टी ने 2013 और 2015 के चुनावों में आशा से कहीं अधिक बढ़ी थी। ऐसा नहीं कि पार्टी बहुमत के साथ सत्ता में आई तब उसने दिल्ली के लिए कोई काम नहीं किया। सत्ता मे आने के बाद केजरीवाल सरकार ने शिक्षा, स्वास्‍थ्‍य बहुत सारे सराहनीय कार्य किए। वह गरीब और पिछले लोगों को लेकर चली और उनके लिए बहुत से कार्य किए। जिसमें आर्ड इवेन और अस्‍पतालों में निशुल्‍क इलाज और आम आदमी क्लीनिक खोली जिससे लोगों को लाभ हुआ। जिसके बाद जनता ने इस सरकार को पसंद भी किया लेकिन पार्टी में अंदरुनी कलह और अन्‍य कारणों से पार्टी के प्रति लोगों का मोह भंग हो गया।

लोकसभा चुनावों में पार्टी में पार्टी को मिली हार से दिल्ली की जनता का मूड का साफ पता चल चुका है। आम आदमी पार्टी पहले की तुलना में कमजोर हुई है और अरविंद केजरीवाल के सामने वो सबकुछ अकेले करने की चुनौती है जो पिछले चुनावों में कई लोग मिलकर कर रहे थे। आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में जिस राजनीति की शुरुआत की थी, वो स्थानीय और क्षेत्रीय समस्याओं से निकल कर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय समस्याओं तक पहुंची थी। एक समय ऐसा लगा था कि देश से निकल कर यह पार्टी देश की राजनीति तक अपनी पहुंच बना लेगी लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। पांच सालों में पार्टी एक आम राजनीतिक पार्टी की तरह काम करने लगी. अंदरुनी मतभेद बढ़ने लगे। पद और कुर्सी की लड़ाई तेज़ हुई। जिस मुद्दे और आंदोलन की राजनीति को लेकर पार्टी चली थी, उसमें निरंतरता बनी नहीं रह पाई।

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