जब भाजपा हारेगी तब जाकर कांग्रेस जीतेगी ! क्या वह खुद कुछ नहीं करेगी ?

चिंतन करने के लिए बैठी कांग्रेस अपनी कार्ययोजना पर ध्यान देने की बजाय दूसरे दल की कमियों पर खीज निकाल रही है। सोनिया गांधी अपना समय ये बताने में खर्च कर रही हैं कि मोदी सरकार अल्पसंख्यक विरोधी है और वह उन्हें दबा रही है। जो जैसा करेगा, वैसा भरेगा। अगर केन्द्र सरकार की नीतियों से जनता नाखुश होगी तो 2024 में वह अपना फैसला सुना देगी। इसकी चिंता कांग्रेस को नहीं करनी चाहिए। कांग्रेस को यह सोचना चाहिए कि उसका संगठन कैसे मजबूत होगा ? कांग्रेस को यह सोचना चाहिए कि दिसम्बर 2022 में जब गुजरात में विधानसभा के चुनाव होंगे तब उसे कैसे जीत मिलेगी ? चिंतन शिविर में भविष्य की राजनीति के लिए रोडमैप बनाने की चर्चा है। कांग्रेस का सारा ध्यान इस रोडमैप के कार्यान्वयन पर होना चाहिए। कांग्रेस का कायाकल्प दो-चार महीनों की बात नहीं। यह एक दीर्घकालिक प्रकिया है। लेकिन कांग्रेस शॉर्टकट रास्ता खोज रही है। उसका मानना है कि नरेन्द्र मोदी पर लगातार हमले करो, मोदी कमजोर होंगे तो भाजपा अपनेआप हार जाएगी। जब भाजपा हार जाएगी तो कांग्रेस खुद- ब- खुद जीत जाएगी। यानी जब भाजपा हारेगी तब जाकर कांग्रेस जीतेगी, उसे खुद कुछ करने की जरूरत नहीं। अब सवाल ये है कि किसी पार्टी को जीत उसके संगठन और नीतियों से मिलती है या फिर व्यक्ति केन्द्रित विरोध से ?

कांग्रेस खुद के अंदर झांकती क्यों नहीं ?

कांग्रेस खुद के अंदर झांकती क्यों नहीं ?

राहुल गांधी पिछले कई साल से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर आक्रमण की झड़ी लगाये हुए हैं। कई बार ये हमले व्यक्तिगत मर्यादा की सीमा पार कर जाते हैं। लेकिन इस आक्रामक रवैये से कांग्रेस को क्या हासिल हुआ ? एक व्यक्ति के विरोध से कांग्रेस कितनी मजबूत हुई ? कांग्रेस अगर आज दुर्गति भोग रही है तो यह उसकी ही गलती है। आज वह भाजपा को अल्पसंख्यक विरोधी बता रही है। लेकिन अल्पसंख्यक विरोधी होने का ठप्पा तो कांग्रेस पर लगा है।1989 में अल्पसंख्यक जो नाराज हुए, उन्होंने आज तक कांग्रेस को माफ नहीं किया। कांग्रेस के कुप्रबंधन से दलित वोटर भी उसके पाले से खिसक गये। ब्राह्मण वोटरों ने भाजपा से नाता जोड़ लिया। कांग्रेस के सारे कोर वोटर एक-एक कर खिसकते गये और वह मुंह ताकती रही। क्या कांग्रेस के इस पतन के लिए दूसरे दल जिम्मेदार हैं ? पंजाब चुनाव में कांग्रेस ने दलित कार्ड खेला था लेकिन जनता ने खारिज कर दिया। सिख समुदाय ने भी कांग्रेस से मुंह फेर लिया। क्या इसके लिए भाजपा जिम्मेदार है ? कांग्रेस खुद के अंदर क्यों नहीं झांकती ?

गठबंधन को लेकर कांग्रेस आजतक असमंजस में

गठबंधन को लेकर कांग्रेस आजतक असमंजस में

लगातार हार से किसी खिलाड़ी का हौसला टूट जाता है। योग्यता रहते हुए भी वह खुद पर भरोसा नहीं कर पाता। कांग्रेस के साथ भी यही हो रहा है। कांग्रेस को अब खुद पर भरोसा नहीं। वह आज तक तय नहीं कर पायी कि उसे अकेले चुनाव लड़ना चाहिए या गठबंधन में। 1998 के पंचमढ़ी अधिवेशन में कांग्रेस ने अकेले चुनाव लड़ने का निर्णय लिया था। तब सोनिया गांधी नयी नयी कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं थीं। लेकिन 1998 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने बिहार में राजद से गठबंधन किया था। 1999 के लोकसभा चुनाव में यह गठबंधन कायम रहा। गठबंधन को लेकर आज भी कांग्रेस असमंजस में है। 2021 में जब पश्चिम बंगाल और केरल में विधानसभा के चुनाव हुए थे तब कांग्रेस ने तो हद कर दी थी। उसने पश्चिम बंगाल में सीपीएम से गठजोड़ कर लिया था जब कि केरल में उसके खिलाफ चुनाव लड़ा था। कांग्रेस यह भी तय नहीं कर पायी है कि गठबंधन की राजनीति में कौन उसका स्वभाविक सहयोगी है। कांग्रेस के कमजोर होने और क्षेत्रीय दलों के मजबूत होने से विपक्ष की राजनीति का स्वरूप बदल गया है। सत्ताच्यूत कांग्रेस अब विपक्ष की भी अगुआ नहीं रही। नरेन्द्र मोदी का विकल्प कौन बनेगा ? इस सवाल का जवाब आसान नहीं है। ममता बनर्जी और शरद पवार जैसे नेता राहुल गांधी को लगातार चुनौती दे रहे हैं। जब तक कांग्रेस मजबूत नहीं होगी तब तक राष्ट्रीय राजनीति में उसकी धाक नहीं जमेगी। समर्पित नेता लगातार पार्टी छोड़ रहे हैं। इस पर भी चिंतन करना होगा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ?

चापलूस नेताओं से कांग्रेस को ज्यादा नुकसान !

चापलूस नेताओं से कांग्रेस को ज्यादा नुकसान !

कांग्रेस छोड़ने वाले पंजाब के वरिष्ठ नेता सुनील जाखड़ ने राहुल गांधी को निजी तौर पर बहुत अच्छा इंसान बताया है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने एक गंभीर आरोप यह लगाया कि राहुल गांधी चापलूसों से घिरे हुए हैं जिसकी वजह से वे सही फैसला नहीं ले पा रहे। सुनील जाखड़ के इस तर्क में दम है। 2013 में जब राहुल गांधी ने दागी नेताओं को बचाने वाले अध्यादेश की प्रति सार्वजनिक रूप से फाड़ी थी तब ये लगा था कि वे मुद्दों पर आधारित ईमानदार राजनीति करना चाहते हैं। लेकिन यूपीए के खुशामदी नेताओं ने राहुल गांधी की इस सोच को आगे नहीं बढ़ने दिया। वे समझौते पर समझौते करते गये। जिससे पार्टी और खुद उनकी राह में कांटे कांटे ही बिछ गये। कांग्रेस में फिलहाल शक्ति के तीन केन्द्र बन गये हैं- सोनिया गांधी, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी। कहने के लिए ये तीनों एक हैं लेकिन इनका व्यक्तित्व अलग-अलग है। पंजाब में जब कैप्टन अमरिंदर सिंह का विवाद चल रहा था तब सोनिया गांधी और राहुल गांधी की राय अलग-अलग थी। इसके लिए दोनों नेताओं के सलाहकारों को जिम्मेदार माना गया था। खुशामदी नेता कांग्रेस को ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं। क्या कांग्रेस इससे मुक्त हो पाएगी ?

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