क्या बंगाल में अभी से तय है भाजपा की जीत, AIMIM के ओवैसी दे रहे संकेत
नई दिल्ली- बिहार में विधानसभा की पांच सीटें जीतने के बाद ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने एक बार फिर राजनीति में बड़ा दिल दिखाते हुए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को चुनाव-पूर्व गठबंधन का प्रस्ताव दिया है। यह उसी तरह का प्रस्ताव है, जो वह बिहार चुनाव से पहले विपक्षी गठबंधन को भी देने का दावा कर चुके हैं। बंगाल में 2021 के मई में चुनाव होने हैं और बिहार के नतीजे आने के साथ ही ओवैसी ऐलान कर चुके हैं कि वह अगला चुनाव पश्चिम बंगाल में लड़ेंगे। बिहार में तो ओवैसी के निशाने पर सीमांचल की कुछ सीटें थीं, लेकिन पश्चिम बंगाल में उनके सामने 100 से 110 मुस्लिम बहुल सीटें पड़ी हुई हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि वह टीएमसी को समर्थन देने को लेकर गंभीर हैं या फिर यहां भी वही राजनीतिक बिसात बिछाने की तैयारी कर चुके हैं, जिसको लेकर भाजपा-विरोधी दलों को वह फूटी आंखों नहीं सुहाते।

हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के सामने यह प्रस्ताव रखा है कि आने वाले राज्य विधानसभा के चुनाव में उनकी पार्टी बीजेपी को हराने के लिए तृणमूल कांग्रेस की मदद करेगी। ओवैसी का यह बयान तृणमूल सुप्रीमो के एआईएमआईएम को लेकर किए गए उस हमले के बाद आया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि 'कुछ बाहरी लोग' लोगों को 'परेशान और आतंकित करेंगे' और राज्य के लोगों से कहा है कि वो 'बाहरियों का विरोध करें।' यही नहीं इससे पहले वह ओवैसी का बिना नाम लिए यह भी कह चुकी हैं, 'अल्पसंख्यक समुदाय के अंदर कुछ उग्रवादी लोग हैं। उन्हें भाजपा पैसे दे रही है। वो हैदराबाद के हैं। वो यहां बैठकें करके मुसलमानों से कह रहे हैं कि उनकी रक्षा करेंगे। मेरे अल्पसंख्यक भाइयों और बहनों उनकी बातों में मत जाना।'
दरअसल, ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम को भाजपा-विरोधी पार्टियों ने वोटकटुवा होने का तमगा दे रखा है। कभी उनपर बीजेपी की बी टीम होने के आरोप लगाए जाते हैं। लेकिन, ओवैसी हर बार इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं। जब बिहार में महागठबंधन की हार का ठीकरा इनपर फोड़ा जाने लगा तो उन्होंने अपनी सफाई में कहा कि उन्होंने तो 'चुनाव से पहले संसद परिसर में महागठबंधन के साथियों को गठबंधन का प्रस्ताव दिया था। लेकिन, हम अपने दम पर पांच सीटें जीतकर आए हैं तो हम पर उंगली क्यों उठाई जा रही है। मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता और हमारी पार्टी बंगाल में भी चुनाव लड़ेगी और हम यूपी के लिए भी तैयार हैं।' ऐसे में सवाल उठता है कि क्या वह ममता बनर्जी के साथ गठबंधन का प्रस्ताव रखकर इस बात की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं कि अगर 30 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले राज्य में मुसलमान वोट बंटेने के चलते भाजपा जीती तो कथित सेक्युलर पार्टियां उनको दोष ना दे पाएं?
वैसे पश्चिम बंगाल में चुनाव लड़ने के ओवैसी के ऐलान से खलबली तृणमूल और कांग्रेस-लेफ्ट गठबधन दोनों में मची हुई है। टाइम्स नाउ से टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने दावा किया है कि एआईएमआईएम को भाजपा ने ही टीएमसी का वोट शेयर घटाने के लिए सेट किया है। वहीं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी का आरोप है कि ओवैसी की पार्टी समाज में ध्रुवीकरण कराना चाहती है। उन्होंने कहा है, 'लेकिन, पश्चिम बंगाल राज्य आजादी के समय से ध्रुवीकरण और सांप्रदायिक राजनीति को नकारता रहा है।' इससे पहले इन्होंने कहा थी कि यह बीजेपी की बी-टीम है, जिसका एकमात्र मकसद मुस्लिम वोट बांटकर सेक्युलर पार्टियों का नुकसान करना है।
दरअसल, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन विशेष रूप से राज्य के तीन मुस्लिम बहुल जिलों पर अपना चुनाव अभियान फोकस करना चाहती है। ये हैं मालदा, मुर्शीदाबाद और उत्तरी दिनाजपुर। 2016 के विधानसभा चुनावों में यहां की 76 में से 34 सीटें कांग्रेस-सीपीएम गठबंधन के खाते में गई थीं। यही वजह है कि ये दोनों पार्टियों ने भी इस बार 6 महीने पहले ही अपनी जमीन बचाने के लिए रणनीति बनानी शुरू कर दी है। वैसे तथ्य ये भी है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में उनका पिछले विधानसभा चुनाव वाला समीकरण भी बिगड़ चुका है। वोट शेयर के मामले में ये दोनों दल 2016 के विधानसभा के चुनाव के मुकाबले 2019 में काफी पिछड़ चुके हैं। मसलन, 2016 में सीपीएम को 19.75% और कांग्रेस को 12.25% वोट मिले थे। जबकि 2019 में सीपीएम को 6.34 % और कांग्रेस को 5.67% ही मिल पाए थे। जबकि, टीएमसी को 2016 में 44.91% और 2019 में 43.69% वोट मिले। लेकिन, भाजपा ने तो सिर्फ तीन वर्ष में ही पूरी कहानी पलट दी। 2016 में उसे सिर्फ 10.28 % वोट मिले थे, लेकिन 2019 में उसने 40.64% वोटों पर कब्जा कर लिया।












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