India Iran Relation: कट्टरपंथी ईरान था फैशन कैपिटल, इस ईरानी महिला ने भारत में शुरू की ड्रेस-ज्वेलरी डिजाइनिंग
India Iran Relation: भारत और ईरान के बीच सांस्कृतिक और कूटनीतिक संबंध सदियों पुराने हैं। मुगल काल में यह रिश्ता और भी मजबूत हुआ था। इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान में महिलाओं पर कई तरह के प्रतिबंध लागू हैं, लेकिन एक दौर में ईरान में महिलाएं ही कला और संस्कृति का चेहरा थीं। दिलचस्प बात यह है कि भारत की पहली फैशन डिजाइनर भी एक ईरानी मूल की महिला को माना जाता है।
मुगल इतिहास में नूरजहां को अक्सर उनकी राजनीतिक ताकत और प्रभावशाली व्यक्तित्व के लिए याद किया जाता है। हालांकि, वह खूबसूरती और महल में अपनी हुकूमत चलाने के लिए ज्यादा याद की जाती हैं। इस वजह से उनका कलात्मक पहलू दब जाता है। नूरजहां मूल रूप से ईरानी थीं और उन्हें इतिहासकार भारत की पहली फैशन डिजाइनर मानते हैं।

India Iran Relation: चिकनकारी और जाली के काम को नई पहचान
लखनऊ की प्रसिद्ध चिकनकारी को लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी नूरजहां को दिया जाता है। माना जाता है कि उन्होंने सफेद मलमल पर सफेद रेशमी धागों से बारीक कढ़ाई की परंपरा को बढ़ावा दिया, जो ईरान की 'जाल' तकनीक से प्रेरित थी। कला इतिहासकार कैथरीन आशेर के अनुसार, नूरजहां ने मुगल दरबार में सूती कपड़ों पर नफीस कढ़ाई को प्रतिष्ठा दिलाई, जो पहले केवल रेशमी वस्त्रों तक सीमित थी।
Nur Jahan ने आम महिलाओं तक पहुंचाई कलात्मकता
नूरजहां सिर्फ परिधान पहनने तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने नए वस्त्रों का सृजन किया। 'नूर-महुदी' नामक महीन कपड़ा, 'पचटोली' जैसी हल्की ओढ़नी और 'बादला' यानी चांदी के तारों से कढ़ाई-ये सभी उनके नवाचार माने जाते हैं। साड़ियों और दुपट्टों पर चांदी की लेस लगाने की परंपरा भी उन्हीं से जुड़ी मानी जाती है। उनके डिजाइन में शाही ठाठ के साथ सादगी का संतुलन दिखाई देता था।
'सादा और सस्ता' शाही फैशन
नूरजहां ने फैशन को केवल दरबार तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने 'नूर महली' नामक एक अपेक्षाकृत किफायती लेकिन बेहद खूबसूरत शादी का जोड़ा तैयार किया था। यह जोड़ा आम जनता के बीच भी लोकप्रिय हुआ। इतिहासकार खाफी खान ने 'मुंतखब-उल-लुबाब' में लिखा है कि उनके डिजाइन इतने प्रचलित हुए कि आम शादियों में भी अपनाए जाने लगे।
गहनों और इत्र में भी किए कई प्रयोग
गहनों में समरूपता और फूलों के पैटर्न को लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी नूरजहां को दिया जाता है। उनकी मां अस्मत बेगम द्वारा विकसित 'इत्र-ए-गुलाब' को उन्होंने अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाई। इस तरह वे सौंदर्य और सुगंध की दुनिया में भी ट्रेंडसेटर साबित हुईं।
इतिहासकार रूबी लाल और आर.पी. त्रिपाठी का मानना है कि नूरजहां का प्रभाव केवल महल की चारदीवारी तक सीमित नहीं था। उन्होंने बाजार, व्यापार और फैशन की पूरी श्रृंखला को प्रभावित किया। सच कहा जाए तो नूरजहां केवल एक मलिका नहीं, बल्कि भारतीय फैशन इतिहास की पहली वैश्विक हस्ती थीं। उनके शुरू किए प्रयोग सदियों बाद भी महसूस किए जा सकते हैं।












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