ICMR:दोबारा कोरोना होने की संभावना कितनी है ? नई स्टडी में सामने आई सच्चाई
नई दिल्ली: भारत में इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएआर) के वैज्ञानिकों ने दोबारा कोरोना संक्रमण पर अपनी तरह की पहली स्टडी की है, जिसके नतीजे चौंकाने वाले रहे हैं। 1,300 लोगों पर किए गए इस शोध का परिणाम जर्नल एपिडेमियोलॉजी एंड इंफेक्शन में प्रकाशित करने के लिए स्वीकार कर लिया गया है। इस स्टडी में उन लोगों को शामिल किया गया, जिनका कम से कम दो बार कोविड-19 टेस्ट पॉजिटिव आया है। आईसीएआर ने इस शोध के लिए जो तरीका अपनाया है, वह अपने आप में पहला है और दुनियाभर के वैज्ञानिकों को इसके लिए व्यवहारिक रास्ता दिखा सकता है। क्योंकि, अभी तक दो बार संक्रमण की पुष्टि के लिए जो मानदंड अपनाया जाता है, उससे किसी ठोस नतीजे पर पहुंचना लगभग असंभव है। इसलिए आईसीएमआर की रिपोर्ट काफी कारगर मानी जा रही है और सबको सचेत करने वाली है कि कोरोना का संक्रमण दूसरी बार भी हो रहा है।

दोबारा संक्रमण की दुनियाभर में क्या है स्थिति
कोरोना के दोबारा संक्रमण को लेकर दुनियाभर के वैज्ञानिकों के बीच अभी भी चर्चा जारी है। अभी तक यह पूरी तरह से साफ नहीं है कि अगर किसी को यह बीमारी हो गई तो क्या उसके शरीर में इस वायरस के खिलाफ स्थाई एंटीबॉडी निर्मित हो जाती है या फिर कुछ निश्चित समय के बाद वह दोबारा से संक्रमित हो सकता है। इसका पता लगाना इसलिए जरूरी समझा जा रहा है कि आखिर लोग यह तो तय कर पाएं कि उन्हें कबतक मास्क लगाकर रखना है या फिर सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते रहना है। इससे वैक्सिनेशन की रणनीति में भी सुधार की जा सकती है। अभी तक तो दुनियाभर में दोबारा संक्रमण के बहुत ही कम मामलों की पुष्टि हुई। पहला कंफर्म केस पिछले साल अगस्त में हॉन्ग कॉन्ग में मिला था। इसके बाद अमेरिका और बेल्जियम में भी दो केस ऐसे ही सामने आए थे। भारत में भी कुछ लोगों की कोरोना रिपोर्ट कई बार पॉजिटिव आ चुकी है, लेकिन उन सबको दोबारा संक्रमण नहीं माना जा सकता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वायरस का कुछ अंश शरीर में बाद में भी लंबे वक्त तक मौजूद रह सकता है। कोरोना से स्वस्थ हो चुके कई मरीजों में यह स्थिति कई बार तीन महीने तक रह सकती है। यूं समझ लीजिए कि ऐसे लोगों में सिर्फ टेस्ट में कोरोना वायरस की मौजूदगी का पता चलता है,लेकिन वास्तव में वह ना तो उस व्यक्ति को दोबारा बीमार करने लायक होता है और ना ही वह किसी दूसरे को संक्रिमित कर सकता है।
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दोबारा संक्रमण का कैसे पता चलता है?
दोबारा संक्रमण की पुष्टि के लिए दुनियाभर के वैज्ञानिक अभी तक वायरस सैंपल का जीनोम एनालिसिस करते रहे हैं। लेकिन, यह काम आसान नहीं है और इसके लिए बहुत लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। सच्चाई ये यह भी है कि हर कोरोना संक्रमित व्यक्ति के वायरस सैंपल का जीनोम एनालिसिस नहीं किया जाता है और कोरोना वायरस का बर्ताव जानने के लिए चुनिंदा मरीजों का ही सैंपल जीनोम एनालिसिस के लिए इकट्ठा किया जाता है। यही वजह है कि सामान्य तौर पर दोबारा संक्रमण का पता लगाना मुश्किल है,क्योंकि ज्यादातर मरीजों का पहले वाला जीनोम सैंपल सुरक्षित ही नहीं रहता। हॉन्ग कॉन्ग वाले केस में पिछले साल इसलिए यह पता लगाना संभव हुआ था,क्योंकि संयोग से 33 वर्षीय उस मरीज का पुराना सैंपल भी जीनोम एनालिसिस के लिए भेजा गया था। इसीलिए उसके पुराने और नये सैंपल की तुलना करना मुमकिन हुआ और पता चल गया कि वह दो बार संक्रमित हुआ है।

आईसीएमआर के वैज्ञानिकों ने क्या तरकीब अपनाई ?
आईसीएमआर के वैज्ञानिकों के पास जीनोम एनालिसिस के लिए डेटा उपलब्ध नहीं था। इसीलिए उन्होंने ऐसे मरीजों पर शोध किया जिनकी कोरोना पॉजिटिव होने की दोनों रिपोर्ट कम से कम 102 दिनों के अंतराल पर आई थी। क्योंकि, इतने दिनों के अंतर के बाद उसके शरीर में पुराने वाले वायरस के अंश के बचे रहने की संभावना नहीं थी। अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (सीडीसी) के मुताबिक वायरस की परछाई अधिकतम 90 दिनों तक ही मौजूद रह सकती है। अपनी शोध की प्रामाणिकता के लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने सिर्फ उन्हीं मरीजों को चुना, जिनकी कोरोना रिपोर्ट 102 दिनों के बीच में कम से कम एकबार भी निगेटिव आ चुकी थी। भारतीय वैज्ञानिको को 1,300 लोगों में से 58 केस ऐसे मिले। बाकी मामलों में शोध के सारे मानदंड पूरे नहीं हो रहे थे। इस स्टडी के लिए कट ऑफ डेट 7 अक्टूबर की रखी गई थी।

शोध में शामिल 58 लोगों को दोबारा हुआ कोरोना
आईसीएमआर के तय मानदंडों के आधार पर जो 58 लोग दोबारा संक्रमित माने गए, उनमे से सिर्फ 38 लोगों से ही और ज्यादा जानकारी के लिए संपर्क किया जा सका। क्योंकि, 20 ने या तो फोन नंबर गलत दिए थे या उनमें से कुछ ने इस स्टडी का हिस्सा बनने से मना कर दिया। जिन 38 लोगों को दोबारा संक्रमण का केस माना गया, उनमें से 29 पुरुष थे, जिनकी उम्र 20 से 40 साल के बीच है। 38 में से 12 तो हेल्थकेयर वर्कर हैं। जिन 38 लोगों को दोबारा से कोरोना हुआ, वो 102 दिनों से लेकर 160 दिनों के भीतर फिर से संक्रमित हुए। 38 में से 27 लोगों ने कहा कि दोनों इंफेक्शन के बीच के दिनों में वो एसिम्पटोमेटिक रहे, जबकि 8 को हल्के लक्षण थे। बाकी 3 ने बताया कि उनको बुखार, खांसी या सांस की कमी की शिकायत थी। 38 में से 20 ने बताया कि उन्हें दोनों बार लक्षण थे, जिनमें से 6 को दूसरी बार बहुत ही गंभीर संक्रमण हुआ था। बाकी 6 को पहलीबार वाला संक्रमण ज्यादा गंभीर था। वहीं 8 लोग ऐसे थे जिनको तो दोनों बार में ही बहुत गंभीर संक्रमण हुआ था।

स्थाई इम्युनिटी पाना मुश्किल
अगर वैज्ञानिक तौर पर देखें तो जीनोम एनालसिस के बिना अभी भी दोबारा संक्रमण की पुष्टि नहीं की जा सकती। लेकिन, वैज्ञानिकों का कहना है कि इस शोध से यह तो पता चलता है कि स्थाई इम्युनिटी नहीं पाई जा सकती। दोबारा संक्रमण अभी भी हो रहा है, इसकी पुष्टि तभी हो सकती है, जबकि हर संक्रमित के सैंपल का जीनोम एनालिसिस करना संभव हो सके। हालांकि, यह संभव नहीं है इसलिए वैज्ञानिक इस स्टडी के आधार पर आम राय बनाना चाहते हैं, जिसमें 102 दिनों के अंतर में कम से कम एक निगेटिव रिपोर्ट आ चुकी हो।












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