विधानसभा चुनाव में उम्दा प्रदर्शन के बाद कांग्रेस इन चुनौतियों से कैसे निपटेगी?

राहुल गांधी
Reuters
राहुल गांधी

पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए प्रस्तावित महागठबंधन में राहुल गांधी को अगली क़तार में लाकर खड़ा कर दिया है.

तेलंगाना में मिली नाकामी ने भले ही आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की धार कम कर दी हो लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि राहुल गांधी ने नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली एनडीए के ख़िलाफ़ राज्यवार गठजोड़ बनाने की शुरुआत कर दी है.

कांग्रेस पार्टी की कमान औपचारिक तौर पर संभाले हुए राहुल गांधी के एक साल पूरे हो गए हैं.

और तब से अब तक कांग्रेस के अंदर और बाहर दोनों ही मोर्चों पर राहुल गांधी का क़द यक़ीनन बढ़ा है.

साल 2014 के बाद पहली बार मोदी-शाह की बीजेपी राहुल की कांग्रेस के हाथों सीधे मुक़ाबले में हारी है.

राहुल गांधी पर अब इस बात का दबाव बढ़ेगा कि वे ख़ुद को प्रधानमंत्री पद के दावेदार के तौर पर पेश करें या क्षेत्रीय पार्टियों का गठजोड़ खड़ा करने की पहल करें.

उनके सामने ये दोनों ही रास्ते हैं और दोनों ही विकल्पों के अपने-अपने ख़तरे भी हैं.



राहुल अब क्या करेंगे?

अब सब की निगाहें बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती की तरफ़ होंगी.

सवाल ये भी है कि क्या वे दूसरी बार राहुल गांधी के साथ तालमेल करने के लिए तैयार होंगी?

कांग्रेस का दामन थामने को लेकर मायावती की हिचकिचाहट कोई नई बात नहीं है.

राहुल गांधी
Reuters
राहुल गांधी

कांग्रेस की कामयाबी से मायावती और महागठबंधन के बीच दूरियां बढ़ने और बसपा के एनडीए ख़ेमे में जाने के आसार बनते दिख रहे हैं.

हालांकि मायावती एनडीए का दामन थामेंगी, ये कहना जितना आसान है, हक़ीक़त में उतना ही मुश्किल भी है.



मायावती किस ओर जाएंगी

मायावती का ख़ुद अपना मिजाज़ ऐसा है कि वे शायद ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली को अपनी रज़ामंदी दें.

योगी आदित्यनाथ
Getty Images
योगी आदित्यनाथ

और तस्वीर का दूसरा पहलू ये भी है कि उत्तर प्रदेश में भाजपा के अपने ख़ेमे में इतनी जगह ही नहीं है कि उसमें मायावती की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को समाहित किया जा सके.

सत्तर सांसदों और 320 विधायकों के साथ किसी भी गठबंधन में मायावती के लिए लोकसभा और विधानसभा चुनावों में वाजिब सीटें छोड़ना एक ख़ौफ़नाक़ अनुभव हो सकता.

इसके नतीजे भी उल्टे साबित हो सकते हैं.

जम्मू और कश्मीर, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़ और गुजरात, पूरी हिंदी पट्टी से लोकसभा के लिए 273 सांसद चुने जाते हैं.

मायावती
Getty Images
मायावती

मौजूदा लोकसभा में इनमें से क़रीब 200 सीटें भारतीय जनता पार्टी के पास हैं.

मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनावी नतीजों और उत्तर प्रदेश में बसपा और समाजवादी पार्टी के संभावित गठजोड़ के मद्देनज़र इस बात की पूरी संभावना है कि भाजपा साल 2019 के आम चुनावों में 80 से 100 सीटें तक गंवाने जा रही है.

तेलंगाना में गठबंधन की आस और पूर्वोत्तर भारत, पश्चिम बंगाल या फिर तमिलनाडु में सीटें बढ़ने की उम्मीद से इन सीटों की चौथाई से ज़्यादा की भरपाई के आसार नहीं दिखते.

छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की कामयाबी सबसे ज़्यादा स्पष्ट है. ये वो सूबा है जहां कांग्रेस के पास कोई भी ताक़तवर क्षत्रप नहीं था.



कांग्रेस के सामने चुनौतियां

चावल वाले बाबा के तौर पर शोहरत, स्वीकार्यता, कल्याणकारी सरकारी योजनाओं की लंबी फ़हरिस्त लिए और नक्सल हिंसा के ख़िलाफ़ मोर्चा खोलने वाले रमन सिंह को एक स्पष्ट विजेता के तौर पर पेश किया जा रहा था.

लेकिन छत्तीसगढ़ के मतदाता इसे क़बूल करने के लिए तैयार नहीं थे और उन्होंने रमन सिंह की सरकार को नकार दिया.

बसपा
Reuters
बसपा

अंदाज़ा लगाइए कि अगर बाक़ी देश के लोग भी छत्तीसगढ़ की तर्ज़ पर वोट करने लगे तो क्या होगा?

शायद वे इस बात पर ग़ौर ज़रूर करेंगे. चाहे वो संसदीय लोकतंत्र में यक़ीन रखने वाले हों या फिर व्यक्ति की लहर के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की उम्मीद रखने वाले लोग हों, दोनों ही को एहतियात बरतने की ज़रूरत है.

मुद्दे और भी हैं जिन्हें ध्यान से देखे जाने की ज़रूरत है.



महागठबंधन को समीकरण बनाने की ज़रूरत

क्या नोटबंदी और जीएसटी ने भाजपा सरकारों के पतन की इबारत लिखी?

क्या कृषि संकट और किसानों की परेशान सरकार के लिए परेशानी का सबब बन रही है?

राहुल गांधी
AFP
राहुल गांधी

क्या एससी-एसटी एक्ट में संशोधन ने हिंदी पट्टी के सवर्णों को बीजेपी से दूर किया है?

और सबसे अहम सवाल तो ये है कि बीजेपी के लिए सबसे ज़्यादा वोट जुटाने वाले नरेंद्र मोदी की चमक फीकी पड़ रही है?

ग़ैर-एनडीए विपक्ष के पास अब इस बात पर आश्वस्त होने की पर्याप्त वजहें हैं कि 17वीं लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ताक़त कमतर होगी.

मोदी के ख़िलाफ़ एक कामयाब महागठबंधन के लिए ज़रूरी है कि कांग्रेस और यूपी, बिहार, बंगाल, आंध्रा, तमिलनाडु जैसे राज्यों के ग़ैर-एनडीए क्षत्रपों के बीच सही संतुलन बने.

लेकिन मोदी विरोधी महत्वाकांक्षी राजनेता सही तालमेल और समझदारी की राजनीति करने में नाकाम साबित हुए हैं जिससे संसदीय चुनावों में मोदी को सत्ता से बेदख़ल किया जा सके.

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+