एक नेत्रहीन फ़ोटोग्राफर की आंखों से कैसी दिखती है दुनिया?

Posted By: BBC Hindi
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प्रणव लाल, फ़ोटोग्राफ़र, ब्लाइंड फ़ोटोग्राफ़र
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प्रणव लाल, फ़ोटोग्राफ़र, ब्लाइंड फ़ोटोग्राफ़र

"आप मुझे डिसेबल्ड कहने के बजाय अंधा ही कहिए. जब मुझे ख़ुद को अंधा कहने या मानने में शर्म नहीं तो आपको कहने में क्यों अजीब लग रहा है?"

38 साल के प्रणव लाल देख नहीं सकते. वे जन्म से नेत्रहीन हैं लेकिन फ़ोटो खींचते हैं.

साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञ का काम करते हैं और हर रोज़ किसी नई तकनीक, नए ऐप पर काम करते हैं. ब्लॉग लिखते हैं और मिनट-मिनट का हिसाब रखते हैं.

मसलन, अगर आपने उन्हें कहा कि आप 11 बजकर 30 मिनट पर उनसे मिलेंगे और आप 11:35 पर उनके पास पहुंचे तो वो आपको टोक देंगे, "आप तय समय से पांच मिनट लेट हैं."

देख नहीं सकता...

प्रणव देख नहीं सकते लेकिन उनकी कहानी करुण रस की नहीं, वीर रस की है. ये कहानी किसी पीड़ित की नहीं है.

कहावत है न, 'मन के हारे हार है, मन के जीते जीत', प्रणव इसी का उदाहरण हैं.

वो कहते हैं, "मैं देख नहीं सकता और ये एक ऐसी सच्चाई है जिसे मैं बदल नहीं सकता तो, मैं उस पर बैठकर आंसू बहाने या दुखी होने से बेहतर परेशानियों का निपटारा करने का सोचता हूं."

प्रणव लाल, फ़ोटोग्राफ़र, ब्लाइंड फ़ोटोग्राफ़र
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पिता की किताबें...

प्रणव की मां बताती हैं कि जब प्रणव पैदा हुए तो उन्हें पता चला कि वो देख नहीं सकते. उन्हें थोड़ा बुरा तो लगा लेकिन शिक़ायत कभी नहीं हुई.

"हमें कभी शिकायत नहीं हुई लेकिन प्रणव के पापा को सिर्फ़ ये बुरा लगा कि उनका बेटा वो दर्जनों किताबें नहीं पढ़ पाएगा जो उसके दादा और पापा ने पढ़ीं और धरोहर बनाकर रखी थीं. प्रणव के पापा ने सोच लिया था कि सारी किताबें वो किसी को दे देंगे लेकिन प्रणव ने मना कर दिया. इसके बाद जब स्कैनर आ गया तो उसने एक-एक किताब पढ़ डाली. उसके बाद उसने अपने पापा को कहा कि अब जिसे मर्ज़ी ये किताबें दे दो."

प्रणव भी मानते हैं कि वो खुशकिस्मत हैं जो उन्हें ऐसे मां-बाप मिले. जिन्होंने उन्हें कभी ये एहसास ही नहीं होने दिया कि वो देख नहीं सकते. जिन्होंने उन्हें कभी बांधकर नहीं रखा.

प्रणव लाल, फ़ोटोग्राफ़र, ब्लाइंड फ़ोटोग्राफ़र
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कैसा रहा बचपन?

प्रणव कहते हैं, "मैंने खुद को कभी कमतर नहीं माना तो चुनौतियां भी बहुत बड़ी नहीं लगीं. हालांकि एक जगह से दूसरे जगह जाना एक समस्या रही. इसके अलावा मैथ्स में परेशानी होती थी क्योंकि उसे सुनकर तो सॉल्व नहीं किया जा सकता."

प्रणव कभी स्पेशल स्कूल नहीं गए. उन्होंने हमेशा मेन स्ट्रीम के स्कूल और कॉलेज से ही पढ़ाई की.

फ़ोटोग्राफ़र बनने का कब और क्यों सोचा?

"इसके पीछे कोई बड़ी वजह नहीं थी. बस मैं लोगों के सामने वो तस्वीर रखना चाहता था जो सिर्फ़ मैं देख सकता हूं."

प्रणव लाल, फ़ोटोग्राफ़र, ब्लाइंड फ़ोटोग्राफ़र
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लैंडस्केप्स को अपने कैमरे में कैद करने का शौक रखने वाले प्रणव को लोगों की तस्वीर खींचना कम पसंद है.

अपने ड्रीम प्रोजेक्ट के बारे में बात करते हुए वो कहते हैं कि मैं इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन से धरती की तस्वीर लेना चाहता हूं.

"इसके अलावा धधकते ज्वालामुखी के क्रेटर की भी तस्वीर लेना चाहता हूं."

"मुझे लगा कि मैं वो दिखाऊं, जो सिर्फ़ मैं देख सकता हूं कोई और नहीं."

"लैंडस्केप्स की तस्वीरें लेना मुझे सबसे अधिक अच्छा लगता है."

प्रणव आवाज़ को आधार बनाकर तस्वीरें खींचते हैं.

उन्होंने कोई प्रोफ़ेशनल ट्रेनिंग नहीं ली है और जिन उपकरणों का वो इस्तेमाल करते हैं वो भी उन्होंने खुद ही बनाए हैं.

प्रणव बताते हैं, "मैं किसी शख़्स को देख नहीं सकता लेकिन बात तो कर सकता हूं. जो लोग देख सकते हैं वो इंसान के रंग, बॉडी शेप के आधार पर तय करते हैं कि सामने वाला शख़्स कैसा है लेकिन मैं किसी को देखकर नहीं, उससे बात करके तय करता हूं कि वो शख़्स कैसा है."

कैसे खींचते हैं तस्वीरें?

"मैं तस्वीरें खींचने के लिए किसी तरह की तय तकनीकी का इस्तेमाल नहीं करता हूं. मैं लाइव इमेज को आवाज़ के माध्यम से समझता हूं."

"मैं कान में एक डिवाइस पहनता हूं जो मुझे सामने रखी चीज़ को क्षैतिज स्थिति में समझाता है. अगर कोई चीज़ बांयी तरफ़ है तो बांए कान में आवाज़ आने लगती है और अगर कोई चीज़ दायीं ओर है तो दाएं कान में आवाज़ आने लगेगी. आवाज़ की पिच से मुझे सामने रखी चीज़ की ऊंचाई पता चलती है. वॉल्यूम से मुझे ब्राइटनेस का पता चलता है. वॉल्यूम जितना ज़्यादा होगा, ब्राइटनेस भी उतनी ही अधिक होगी."

प्रणव लाल, फ़ोटोग्राफ़र, ब्लाइंड फ़ोटोग्राफ़र
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क्या सोचते हैं उनके मम्मी-पापा?

प्रणव की मां कहती हैं उन्होंने प्रणव को कभी ये सोचकर बड़ा नहीं किया कि वो देख नहीं सकता.

"बचपन से ही वो अपना सारा काम खुद करता है. मैं सिर्फ़ उसके कपड़ों वाली आलमारी को ठीक करती हूं, बाकी वो सारे काम ख़ुद करता है. मुझे उसकी वजह से कभी परेशानी नहीं हुई, हां लेकिन एक शिकायत ज़रूर है... वो समय का इतना पाबंद है कि दूसरे को भी वैसा ही बनना पड़ता है."

प्रणव लाल, फ़ोटोग्राफ़र, ब्लाइंड फ़ोटोग्राफ़र
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"मान लीजिए, हम डाइनिंग टेबल पर बैठे हैं और रोटी आने में दो मिनट लगेंगे तो वो अपने कमरे में चला जाता है. वहां काम करने लगता है और ठीक दो मिनट बाद वापस आ जाता है. मैं उसकी इस आदत से कभी-कभी तंग हो जाती हूं.""पर वो दुनिया का सबसे अच्छा बेटा है."

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English summary
How does the world look with a blind photographers eyes
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