कितना मुश्किल हो सकता है स्टालिन के लिए आगे का सफ़र?

तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री और डीएमके नेता एम. करुणानिधि के शव को मरीना बीच पर दफ़नाए जाने के फ़ैसले के बाद राजाजी हॉल में खुशी की लहर छा गई थी.

अंतिम दर्शन के लिए करुणानिधि का शव राजाजी हॉल में रखा गया था और उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए बड़ी संख्या में लोग आए थे.

एम. करुणानिधि के बेटे और डीएमके के कार्यकारी अध्यक्ष एमके स्टालिन हाथ बांधकर खड़े थे और बेहद भावुक नज़र आ रहे थे.

7 अगस्त को करुणानिधि की मृत्यु के बाद उनके शव को मरीना बीच पर दफ़नाए जाने की इजाज़त नहीं मिलने से डीएमके के सदस्यों और करुणानिधि को अपना नेता मानने वाले लोग उग्र होने लगे थे.

तब स्टालिन ने उनसे शांति बनाए रखने की अपील की थी और फ़ैसला आने से लेकर अंत्येष्टि तक धैर्य बनाए रखा.

नेता और अप्पा

पिता के आख़िरी सांस लेने के बाद स्टालिन ने उनके नाम ख़त भी लिखा.

अपने खत में उन्होंने लिखा, ''पूरी ज़िंदगी मैंने आपको पिता से ज़्यादा एक नेता के तौर पर संबोधित किया है. मेरे नेता, क्या अब मैं आपको अप्पा कह सकता हूं.''

इन सभी घटनाओं ने स्टालिन की छवि में सकारात्मक बदलाव ला दिया है. हालांकि, कई लोगों का ये भी कहना था कि ये सिर्फ़ शुरुआती दिन हैं.

जब राजनीति में रखा क़दम

स्टालिन के राजनीति में क़दम रखा ही था. साल 1975 में आपातकाल के दौरान उनकी गिरफ़्तारी और जेल में अत्याचार की ख़बरों ने पार्टी के बीच उनका सम्मान बढ़ा दिया था. इसके बाद स्टालिन बहुत तेज़ी से पार्टी में आगे बढ़ते गए.

पार्टी मुख्यालय में 14 अगस्त को डीएमके की कार्यकारी परिषद की बैठक हुई. वैसे तो ये कहा गया कि ये बैठक करुणानिधि की मृत्यु पर शोक मनाने के लिए रखी गई थी लेकिन पार्टी प्रमुख का पद खाली होने के चलते राजनीतिक कयास लगने लाज़मी थे.

क्या स्टालिन डीएमके के अध्यक्ष के तौर पर चुने जाएंगे? आने वाले दिनों में ये सवाल और ज्यादा उठने वाला है.

स्टालिन जनवरी साल 2017 में पार्टी के पहले कार्यकारी अध्यक्ष बने थे. लेकिन, अपने राजनीतिक सफर में उन्होंने कई मुश्किलों और रुकावटों का सामना किया है.

स्टालिन ने स्कूल के दिनों से ही अपना राजनीतिक सफर शुरू कर दिया था. उन्होंने चेन्नई के गोपालपुरम में पार्टी की यूथ विंग की शुरुआत की और राजनीति में अपनी रूचि दिखाई.

बाद में, साल 1970 की शुरुआत में उन्होंने युवाओं को प्रोत्साहित करना शुरू किया और पार्टी की बैठकों में भाग लेने लगे.

साल 1980 में करुणानिधि ने मदुरै में पार्टी की यूथ विंग की शुरुआत की. स्टालिन इसका संचालन करने लगे और बाद में उसके सचिव के तौर पर नियु​क्त किए गए. इस पद पर स्टालिन लंबे समय तक बने रहे.

हालांकि कुछ समय के लिए वो पार्टी के उप महासचिव भी रहे और साल 2008 में कोषाध्यक्ष के तौर पर भी काम किया.

करुणानिधि, एमके स्टालिन, एमके अड़ागिरी, डीएमके तमिलनाडु
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करुणानिधि, एमके स्टालिन, एमके अड़ागिरी, डीएमके तमिलनाडु

स्टालिन के चुनावी रिकॉर्ड

उन्होंने 1984 में थाउजंड लाइट्स विधानसभा से पहला विधानसभा चुनाव लड़ा लेकिन एक वरिष्ठ एआईएडीएमके नेता से बहुत कम वोटों से हार ​गए.

बाद में वो साल 1989, 1996, 2001 और 2006 में इसी क्षेत्र से विधानसभा में पहुंचे. इस बीच 1991 में हुए चुनावों में वो हार गए थे.

साल 2011 और साल 2016 में वो कोलाथपुर इलाक़े से चुनाव जीत गए. फिलहाल वो राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका निभा रहे हैं.

जब स्टालिन बने मंत्री

डीएमके के साल 2016 में सत्ता में आने के बाद स्टालिन को स्थानीय प्रशासन मंत्री बनाया गया. पांच साल के कार्यकाल में उन्हें उनके प्रशासकीय कौशल के लिए काफी सराहा भी गया.

साल 1996-2000 के दौरान वो चेन्नई के मेयर रहे और तारीफ़ें बटोरीं. राज्य में बुनियादी ढांचे और सड़कों की हालत में सुधार के लिए उनका नाम हुआ.

लेकिन साल 2001 में स्टालिन, करुणानिधि और कुछ अन्य लोगों को चेन्नई में पुलों के निर्माण में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं के आरोपों में गिरफ़्तार कर लिया गया था. बाद में सरकार ने उनके ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर नहीं की थी.

करुणानिधि, एमके स्टालिन, एमके अड़ागिरी, डीएमके तमिलनाडु
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करुणानिधि, एमके स्टालिन, एमके अड़ागिरी, डीएमके तमिलनाडु

बने पहले ​उप मुख्यमंत्री

साल 2009 में स्टालिन ने इतिहास बनाया और उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली.

कुछ रिपोर्ट ये भी कहती हैं कि स्टालिन साल 2014 के आम चुनावों और 2016 के विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रमुख रणनीतिकार भी रहे थे.

उन्होंने उम्मीदवारों के चयन और ​अन्य दलों से गठबंधन को लेकर फ़ैसले में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.

स्टालिन की आलोचना

भाषण देने और लिखने के तरीक़े को लेकर स्टालिन की तुलना उनके पिता करुणानिधि से की जाती रही है.

वैसे तो हर नेता की अपनी-अपनी योग्यताएं होती हैं जैसे नेतृत्व क्षमता, वाक-पटुता और प्रबंधन कौशल. लेकिन, डीएमके को लेकर ये धारणा रही है कि उनके नेताओं की बेहतरीन भाषणकला और लेखन कौशल के चलते ही पार्टी सत्ता में आई है. इस धारणा के कारण भी स्टालिन आलोचनाओं का सामना करते रहे हैं.

साल 2015 में स्टालिन ने राज्य भर में यात्रा करने के लिए एक अभियान की शुरुआत की और उसे नाम दिया 'नमाक्कु नामे'. इस अभियान का मकसद सभी वर्गों के लोगों से मिलना-जुलना था.

इस यात्रा से जहां उन्हें सराहना मिली, वहीं आलोचनाएं भी झेलनी पड़ीं.

इस अभियान के दौरान स्टालिन के चाय की दुकानों पर लोगों से बातचीत करने, पार्टी समर्थकों के साथ बाइक चलाने और उनकी अन्य गतिविधियों को विरोधियों और आलोचकों ने स्टंट बताया था.

स्टालिन के लिए आगे क्या?

करुणानिधि पार्टी के प्रमुख नेताओं जैसे अनबलगन, वीरासामी, दुराईमुरुगन के बहुत क़रीब थे. ये नेता पार्टी प्रमुख को सलाह दिया करते थे. लेकिन स्टालिन के पास उनको सलाह देने के लिए ऐसा कोई नेता मौजूद नहीं था.

करुणानिधि के जाने के बाद डीएमके और राजनीतिक हलकों में स्टालिन से उम्मीदें और बढ़ने वाली हैं.

साल 2016 में पूर्व मुख्यमंत्री जे. जयललिता की मृत्यु के बाद एआईएडीएमके में दरार आ गई. पार्टी की कमान हाथ में लेने की कोशिश में दो फाड़ हो गए.

एआईएडीएमके की इस स्थिति को देखने वाले अन्य राजनीतिक दलों की नजर अब डीएमके पर टिकी हुई है.

राजनीतिक विशेषज्ञों की नज़र अब इस बात पर है कि स्टालिन और उनके बड़े भाई एमके अड़ागिरी के बीच बढ़ते विवाद के चलते क्या अड़ागिरी को पार्टी से बाहर कर दिया जाएगा. ऐसा किए जाने से क्या दोनों के समर्थकों में भी टकराव पैदा हो जाएगा.

अब आगे पता चलेगा कि स्टालिन पार्टी के सदस्यों और गठबंधन सहयोगियों से जुड़े मामलों को संभालने में दोस्ताना और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हैं या नहीं.

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