ग़ुलाम नबी आज़ाद: कांग्रेस की चार सरकारों में मंत्री रहे, फिर ये कड़वाहट क्यों

क़रीब दो साल से कांग्रेस से नाराज़गी ज़ाहिर कर रहे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद ने आख़िरकार बेहद तल्ख़ भाषा का इस्तेमाल करते हुए पार्टी के सभी पदों और सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया.

ग़ुलाम नबी आज़ाद का पार्टी छोड़ना तो हैरान नहीं करता लेकिन जो भाषा सोनिया गांधी को लिखे पांच पन्नों के पत्र में उन्होंने इस्तेमाल की है वो ज़रूर हैरान करती है.

अपने पत्र में ग़ुलाम नबी आज़ाद ने राहुल गांधी के व्यक्तित्व और नेतृत्व को निशाने पर लिया है और कहा है कि 'जैसे मनमोहन सिंह की सरकार रिमोट कंट्रोल से चलती थी वैसे ही कांग्रेस पार्टी रिमोट कंट्रोल से चल रही है.'

उन्होंने आरोप लगाया कि पार्टी में वरिष्ठ नेताओं की बात नहीं सुनी जाती है और अधिकतर फ़ैसले राहुल गांधी और उनके क़रीबी 'पीए और गार्ड' लेते हैं.

कश्मीर में इंडियन यूथ कांग्रेस से राजनीति शुरू करने वाले ग़ुलाम नबी आज़ाद 50 वर्ष से अधिक तक कांग्रेस में रहे.

इस दौरान वो चार प्रधानमंत्रियों (इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह) की सरकारों में केंद्रीय मंत्री रहे और कश्मीर के मुख्यमंत्री भी रहे.

सिर्फ सत्ता ही नहीं पार्टी में भी उच्च पदों पर रहे ग़ुलाम नबी आज़ाद के इस कड़वाहट के साथ पार्टी छोड़ने से विश्लेषक हैरान हैं.

मूलरूप से कश्मीर के डोडा ज़िले से आने वाले ग़ुलाम नबी आज़ाद का कभी कोई ठोस जनाधार नहीं रहा.

उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन में सिर्फ़ चार बार चुनाव जीते. 1980 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व में जब देशभर में कांग्रेस की लहर थी तब उन्होंने महाराष्ट्र के वाशिम से लोकसभा चुनाव जीता. इसके बाद 1984 में वो आठवीं लोकसभा के लिए महाराष्ट्र से ही चुने गए.

2006 में आज़ाद ने जम्मू-कश्मीर की भदरवा सीट से उपचुनाव जीता और फिर 2008 में यहीं से दोबारा विधायक चुने गए. 2014 में उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा और हार गए.

सत्ता और पद का मज़ा लेते रहे आज़ाद

ग़ुलाम नबी आज़ाद अधिकतर समय कांग्रेस की तरफ़ से राज्यसभा सदस्य रहे. उन्हें कुल पांच बार राज्यसभा भेजा गए.

कांग्रेस की राजनीति पर नज़दीकी नज़र रखने वाले राजनीतिक विश्लेषक और वरिष्ठ पत्रकार औरंगज़ेब नक़्शबंदी कहते हैं, "ग़ुलाम नबी आज़ाद ऐसे नेता हैं जो हमेशा सत्ता के क़रीब रहे. वो हमेशा जीतने वाले पक्ष के साथ खड़े रहे. जब नरसिम्हा राव का वक़्त आया तो वो उनके साथ हो गए और जब हवा राव के ख़िलाफ़ हुई तो सबसे पहले यही उनके ख़िलाफ़ हुए. नरसिम्हा राव के बाद जब सीताराम केसरी अध्यक्ष बनें तो ये उनके साथ हो गए लेकिन जब सोनिया गांधी अध्यक्ष बनीं तब उन्होंने सीताराम को हटाने में पूरा सहयोग दिया."

औरंगज़ेब कहते हैं, "अपने पचास साल के राजनीतिक करियर में आज़ाद ने हमेशा सत्ता का मज़ा लिया. या तो वो सरकार में रहे या पार्टी में ताक़त के पद पर रहे."

औरंगज़ेब कहते हैं, "आज आज़ाद गांधी परिवार पर सवाल उठा रहे हैं लेकिन वो ख़ुद गांधी परिवार से नज़दीकी का फ़ायदा उठाते रहे हैं. उनका कोई ठोस जनाधार नहीं था, बावजूद इसके वो कांग्रेस में हमेशा बड़ा पद पाते रहे. जितनी पहुंच उनकी गांधी परिवार और पार्टी हाई कमान तक थी इतनी सभी को नहीं मिल पाती."

ग़ुलाम नबी आज़ाद अक्तूबर 2005 में केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार में संसदीय कार्य मंत्री पद से इस्तीफ़ा देकर जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री बनें थे. फिर 2008 में अपनी सरकार जाने तक मुख्यमंत्री बने रहे.

विश्लेषक मानते हैं कि अपने पत्र में जिस भाषा का इस्तेमाल ग़ुलाम नबी आज़ाद ने किया वो अशोभनीय है.

राजनीतिक विश्लेषक विनोद शर्मा कहते हैं, "ये पत्र नाराज़गी और राजनीति दोनों दिखा रहा है. उन्होंने अपने जीवन के पचास वर्ष कांग्रेस में गुज़ार दिए. जाते समय इस तरह की भाषा इतने वरिष्ठ नेता को शोभा नहीं देती है."

शर्मा कहते हैं, "उन्होंने राहुल गांधी पर व्यक्तिगत आरोप लगाए हैं. उन्होंने कहा कि राहुल गांधी का जो तरीक़ा है वो अपमानजनक था, ये बात सच हो सकती है, लेकिन ये कहना है कि आज कांग्रेस वैसे ही रिमोट कंट्रोल से चल रही है जैसे मनमोहन सिंह की सरकार रिमोट कंट्रोल से चलती थी, वो स्वयं मंत्री थे मनमोहन सिंह की सरकार में, इसलिए उनका ये कहना शोभा नहीं देता था. अगर उस वक़्त सरकार रिमोट कंट्रोल से चल रही थी तो उनको खड़े होकर इसका विरोध करना चाहिए था."

आज़ाद भारत में सबसे लंबे समय तक सत्ता पर रहने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस इस समय अपने मुश्किल दौर में हैं. 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी की शर्मनाक़ हार हुई.

ग़ुलाम नबी आज़ाद ऐसे पहले कांग्रेसी नेता नहीं है जो इस मुश्किल दौर में पार्टी को छोड़कर गए हैं. उनसे पहले माधव राव सिंधिया, आरपीएन सिंह और जितिन प्रसाद ने भी पार्टी छोड़ी लेकिन ऐसी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया.

विनोद शर्मा कहते हैं, "सिर्फ़ हेमंत बिस्वा शर्मा ने कांग्रेस छोड़ते समय ऐसी भाषा का इस्तेमाल किया था या इतनी ही तल्ख़ भाषा सुनील जाखड़ ने इस्तेमाल की थी. ग़ुलाम नबी आज़ाद से पहले और किसी ने इस लहज़े में बात नहीं की."

अपने पत्र में आज़ाद ने सबसे तीखा निशाना राहुल गांधी और उनके क़रीबी नेताओं पर साधा है. हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि आज़ाद स्वयं हाईकमान से नज़दीकी का फ़ायदा उठाते रहे हैं.

औरंगज़ेब नक़्शबंदी कहते हैं, "ग़ुलाम नबी आज़ाद इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के क़रीबी रहे हैं और अब स्वयं राहुल गांधी के क़रीबी लोगों पर सवाल उठा रहे हैं."

राज्यसभा ना भेजे जाने से नाराज़ थे आज़ाद

ग़ुलाम नबी आज़ाद का राज्यसभा का कार्यकाल फ़रवरी 2021 में समाप्त हुआ. उन्हें उम्मीद थी कि पार्टी उन्हें फिर से राज्यसभा भेजेगी. लेकिन जब उन्हें संकेत मिले की उनका टिकट कट सकता है तो उन्होंने नाराज़गी ज़ाहिर करनी शुरू कर दी.

औरंगज़ेब कहते हैं, "ग़ुलाम नबी आज़ाद की बात में वज़न होता अगर वो 2014 के बाद बोलते या फिर अपने राज्यसभा का कार्यकाल ख़त्म होने से पहले बोलते. जैसे ही राज्यसभा के लिए उनका नामांकन नहीं हुआ, वो विद्रोही हो गए. अगर कांग्रेस उन्हें राज्यसभा भेजती तो वो शांत रहते."

वहीं विनोद शर्मा कहते हैं, "उन्हें दोबारा राज्यसभा का नोमिनेशन नहीं मिला, इससे वो नाराज़ थे. वो पार्टी की कार्यसमिति के सदस्य थे. कार्यसमिति की बैठक होने जा रही है, वो पार्टी फोरम पर ये बात रख सकते थे."

नक़्शबंदी कहते हैं, "जम्मू-कश्मीर में नया प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की प्रक्रिया चल रही थी, उसमें ये काफ़ी सक्रिय थे और अपने निकट सहयोगी वकार रसूल को पीसीसी अध्यक्ष बनवा दिया और अब मौका देखकर पार्टी छोड़ दी."

विनोद शर्मा कहते हैं कि कुछ लोग आज़ाद की नीयत पर भी सवाल उठा रहे हैं और कह रहे हैं कि जब वो सत्ता में रहे तब उन्होंने अपना क्रोध शांत रखा लेकिन अब जब वो सत्ता में नहीं हैं और उन्हें उनकी इच्छा के मुताबिक़ पद नहीं मिल रहा है तब वो ऐसी बातें कर रहे हैं. वो कहते हैं, "ये उन जैसे संयम और शोहरत के आदमी को शोभा नहीं देता है."

कांग्रेस को कितना नुक़सान

कांग्रेस अपने राजनीतिक इतिहास के सबसे मुश्किल दौर में है
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कांग्रेस अपने राजनीतिक इतिहास के सबसे मुश्किल दौर में है

ग़ुलाम नबी आज़ाद राज्यसभा में कांग्रेस के नेता थे. कई राज्यों के चुनाव प्रभारी रहे और मीडिया में भी कांग्रेस का नियमित चेहरा रहे. उन्होंने पांच दशक से अधिक तक कांग्रेस के साथ राजनीति की. ऐसे में उनके पार्टी छोड़ने से कांग्रेस को नुक़सान तो होगा लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि इसका असर कांग्रेस की चुनावी राजनीति पर बहुत अधिक नहीं होगा.

औरंगज़ेब नक़्शबंदी कहते हैं, "राजनीति में पर्सेप्शन बहुत मायने रखता है. एक वरिष्ठ नेता के जाने से ज़रूर पार्टी की छवि को झटका लगेगा. लेकिन जहां तक वोटों का सवाल है तो पार्टी पर कोई असर नहीं होगा. ग़ुलाम नबी आज़ाद का कभी भी अपना जनाधार नहीं रहा है.

विश्लेषक मानते हैं कि अगर जम्मू-कश्मीर में चुनाव होंगे तब भी पार्टी पर बहुत असर नहीं होगा. जम्मू-कश्मीर के बाहर देश में कहीं भी इनका कोई असर नहीं है.

औरंगज़ेब कहते हैं, "आज़ाद मूल रूप से चिनाब घाटी के डोडा ज़िले के हैं. वो चाहेंगे कि यहां कुछ सीटें जीतकर राज्य की राजनीति में अपने लिए दरवाज़े खुले रखें. वो बीजेपी के साथ नहीं जाएंगे क्योंकि उन्हें घाटी में बहुत समर्थन नहीं मिलेगा. वो चाहेंगे कि अपनी क्षेत्रीय पार्टी बनाएं और आगे चलकर बीजेपी का समर्थन लें."

वहीं विनोद शर्मा मानते हैं कि ग़ुलाम नबी आज़ाद के इस बेरुख़ी के साथ पार्टी छोड़ने से कांग्रेस की छवि को बड़ा झटका लगा है.

विनोद शर्मा कहते हैं, "कांग्रेस की छवि को झटका तो लगा है. राजनीति में लड़ाई पर्सेप्शन (समझ) की होती है कि जनता की नज़र में क्या छवि पार्टी की बन रही है. लगातार जब लोग किसी पार्टी को छोड़कर जाते हैं तो ज़ाहिर है कि लोगों के मन में सवाल उठेगा कि क्या पार्टी में सब कुछ सही चल रहा है, क्या पार्टी अपनी राह से भटक कई है."

वरीं रशीद किदवई कहते हैं, "किसी भी राजनीतिक दल में अगर कोई वरिष्ठ नेता जाता है तो नुक़सान तो ज़रूर होता है. जो तल्खी ग़ुलाम नबी आज़ाद ने दिखाई है वो भी कोई अच्छा संकेत नहीं है."

किदवई कहते हैं, "ग़ुलाम नबी आज़ाद के जाने से पार्टी को चुनावी राजनीति में कोई ख़ास नुक़सान नहीं होगा. आज़ाद का अधिकांश समय राज्यसभा में रहा और लोकसभा चुनाव भी वो पार्टी की हवा में जीते. जम्मू-कश्मीर में उनका कुछ असर है और अगर वहां कोई चुनावी प्रक्रिया होती है तो कांग्रेस को कुछ नुक़सान हो सकता है, इसके अलावा कांग्रेस की सिर्फ़ छवि को ज़रूर नुक़सान पहुंचा हैं, बाक़ी कोई बड़ा नुक़सान नहीं हुआ है."

पार्टी में बड़ी टूट नहीं

राजनीतिक दल में जब बुरा समय आता है तो उसमें टूट होती है जैसे कांग्रेस 1977 में टूटी और फिर 1996 में भी उसके कई धड़े हो गए.

अर्जुन सिंह गुट, माधवराव सिंधिया गुट, बंगरप्पा गुट भी पार्टी से अलग हो गए थे. बाद में शरद पवार और ममता बनर्जी जैसे नेताओं ने भी अपने दल बनाए.

लेकिन 2014 और 2019 की करारी हार के बावजूद कांग्रेस में कोई टूट नहीं हुई है, कुछ नेता भले ही पार्टी छोड़कर गए हैं.

कांग्रेस में अंसतुष्ट नेताओं के समूह जी-23 ने कई बार खुलकर केंद्रीय नेतृत्व और ख़ासकर गांधी परिवार के प्रति नाराज़गी ज़ाहिर की है. ग़ुलाम नबी आज़ाद इसी गुट का हिस्सा था. इसी गुट में शामिल रहे कपिल सिब्बल पहले ही पार्टी छोड़कर समाजवादी के टिकट पर राज्यसभा पहुंच चुके हैं.

विश्लेषक मानते हैं कि हो सकता है कांग्रेस के कई और नेता भी आज़ाद के रास्ते पर चल पड़ें. रशीद किदवई कहते हैं,

"कांग्रेस में बहुत से ऐसे लोग हैं जो घुटन महसूस कर रहे थे और मौका मिलते ही दूसरे दलों में चले गए. कांग्रेस के सामने बिडंबना ये है कि चुनाव वो जीत नहीं पा रही है और नेताओं में निराशा का माहौल है. ऐसे में हो सकता है कि कांग्रेस के असंतुष्ट खेमे के कुछ और नेता आज़ाद की राह पर चलें."

वहीं औरंगज़ेब नक़्शबंदी कहते हैं, "कांग्रेस में आनंद शर्मा, मनीष तिवारी जैसे कई नेता हैं मौका मिलने पर पार्टी से अलग हो सकते हैं. सवाल ये है कि इनके जाने का पार्टी पर कितना असर पड़ेगा. आनंद शर्मा का भी आज़ाद की तरह ही अपना ऐसा जनाधार नहीं है."

अब क्या करेंगे आज़ाद?

ग़ुलाम नबी आज़ाद के अगले राजनीतिक क़दम को लेकर मीडिया में कयास लगते रहे हैं. द न्यू इंडियन एक्सप्रेस की जनवरी में प्रकाशित एक रिपोर्ट में दावा किया गया था कि आज़ाद जम्मू-कश्मीर में चुनाव से पहले अपना दल बना लेंगे.

औरंगज़ेब नक़्शबंदी कहते हैं कि बहुत अधिक संभावना है कि आज़ाद अपनी पार्टी बनाएं और जब जम्मू-कश्मीर में चुनाव हों तो मैदान में उतरें.

वहीं ग़ुलाम नबी आज़ाद के प्रधानमंत्री मोदी के साथ भी अच्छे रिस्ते हैं और हाल के सालों में बीजेपी के प्रति भी वो नरम ही रहे हैं.

आज़ाद जब संसद से रिटायर हुए तो प्रधानमंत्री मोदी ने उनकी खुलकर तारीफ़ की थी. भाजपा सरकार ने ही उन्हें जनवरी 2022 में पद्मविभूषम से भी सम्मानित किया. ये कयास भी लगाए जाते रहे हैं कि वो बीजेपी के क़रीब भी आ सकते हैं.

विनोद शर्मा कहते हैं, "कुछ दिन पहले जब उन्होंने चिट्ठी लिखी थी और जी-23 को लेकर घटनाएं हुईं थीं तब गुलाम नबी आज़ाद ने कहा था कि अगर मैं बीजेपी के साथ जाता हूं तो जम्मू-कश्मीर में काली बर्फ गिरेगी. अब देखना ये होगा कि जम्मू-कश्मीर में काली बर्फ़ गिरने वाली है? वो बीजेपी के साथ जाएंगे या बीजेपी के क़रीब जाएंगे ये आने वाले वक़्त की बात है, उसके लिए तो इंतेज़ार करना होगा."

कांग्रेस में नेतृत्व का संकट

सोनिया गांधी और ग़ुलाम नबी आज़ाद
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सोनिया गांधी और ग़ुलाम नबी आज़ाद

कांग्रेस पार्टी इस समय नेतृत्व के संकट से गुज़र रही है. 2019 में राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के बाद से सोनिया गांधी अंतरिम अध्यक्ष हैं और अभी तक पार्टी के अध्यक्ष पद का चुनाव नहीं हो सका है.

विश्लेषक मानते हैं कि इस समय पार्टी में नेतृत्व का खालीपन है क्योंकि राहुल गांधी अध्यक्ष पद संभालने से हिचक रहे हैं और ये धारणा बन रही है कि वो बिना अध्यक्ष पद की ज़िम्मेदारी संभाले पर्दे के पीछे से उसे नियंत्रित करना चाहते हैं.

विनोद शर्मा कहते हैं, "कांग्रेस पार्टी में आज बड़ा संकट है. ये बात भी सच है कि आज कांग्रेस में एक बहुत बड़ा लीडरशिप वैक्यूम (नेतृत्व का खालीपन) है. कांग्रेस सुचारू रूप से नहीं चल रही है, लगातार चुनाव हार रही है, ये सब सच है. लेकिन जिस तर्ज में ग़ुलाम नबी आज़ाद ने चिट्ठी लिखी है वो सोभा नहीं देता है."

राहुल गांधी अपनी टीम बनाने की कोशिश कर रहे हैं और इसी से पार्टी के कई वरिष्ठ नेता नाराज़ हैं.

औरंगज़ेब कहते हैं, "1985 में राजीव गांधी ने कुछ यंग लोगों को जिनमें अशोक गहलोत, अहमद पटेल, दिग्विजय सिंह जैसे नेता शामिल थे, को ऊपर उठाया और उन्हें प्रदेश कांग्रेस समिति का अध्यक्ष तक बना दिया. जब भी कोई नेता आता है तो वो चाहता है कि वो अपनी टीम बनाकर अपनी तरह से पार्टी को चलाए. राहुल गांधी भी ऐसा ही करना चाहते हैं तो इसमें ग़लत क्या है."

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