जनता की पहुंच से दूर जेनेरिक दवाइयां: गुणवत्ता का सवाल या दवाई कंपनियों का प्रलोभन हावी

'सस्ता रोए बार बार, महंगा रोए एक बार', यही वह प्रचलित कहावत है जिसकी वजह से सस्ते में मिला कोई भी सामान खरीद कर हम संतुष्ट नहीं होते। कभी सस्ते सामान की क्वालिटी और विश्वसनीयता पर सवाल उठाया जाता है तो कभी उसे नकली बता दिया जाता है। कुछ इसी तरह का मसला जेनेरिक दवाइयों के साथ है।

ऐसे समय में जब दिनों दिन स्वास्थ्य की देखभाल की लागत आसमान छूती जा रही हो और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा करना एक चुनौती बन जाए तो 'हेल्थ इज वेल्थ' भी बेमानी सा लगने लगता है। इसी को देखते हुए जरूरतमंद और आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति के लिए सरकार की ओर से रियायती दर पर सरकारी स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं, लेकिन यहां भी कुछ डॉक्टर्स ने अपना और निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाने के चक्कर में मरीज और उनके परिजनों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ बढ़ा दिया है।

Generic medicines out of reach of public pharmaceutical companies

इसी का नतीजा है कि आम लोगों के लिए जरूरी चिकित्सा खर्च उठाना भी मुश्किल हो गया है। एक अनुमान के अनुसार, किसी भी रोगी की चिकित्सा पर होने वाले व्यय का 70 प्रतिशत केवल दवाओं पर खर्च हो जाता है। सरकार ने लोकसभा में पूछे गए प्रश्न के उत्तर में बताया था कि इलाज और दवा पर होने वाले खर्च की वजह से देश में हर साल तीन करोड़ से ज़्यादा लोग गरीबी रेखा से नीचे चले जाते हैं। यह समझना मुश्किल नहीं कि अपेक्षाकृत कम खर्च में बीमारियों का इलाज करवाने की स्थितियां लोगों के लिए कितनी मददगार हो सकती हैं।

नेशनल मेडिकल कमीशन के मुताबिक भी देश में लोग कमाई का बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य पर खर्च कर रहे हैं, जिसमें बड़ी रकम सिर्फ दवाओं पर खर्च होती है। जेनेरिक दवाएं ब्रांडेड दवाओं से 30 से 80% तक सस्ती हैं और इन दवाइयों से खर्च में कमी आएगी। भारत जैसे देश में जहां आज भी सरकारी स्वास्थ्य सुविधाओं का इन्फ्रास्ट्रक्चर इतना मजबूत नहीं है और ज्यादातर मामलों में गंभीर बीमारी की वजह से लोगों को अपनी बचत खर्च करनी पड़ती है।

कई बार तो बीमारियों के इलाज में लोगों को अपनी संपत्ति तक बेचनी पड़ती है। इसी को देखते हुए नेशनल कंडक्ट ऑफ रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिशनर रेगुलेशन ने डॉक्टरों को जेनेरिक दवाएं लिखने का निर्देश दिया है। नियम का उल्लंघन करने पर पेशेवर प्रशिक्षण के लिए ट्रेनिंग में शामिल होने को कहा जा सकता है या उसका लाइसेंस भी कुछ समय के लिए निलंबित हो सकता है। हालांकि डॉक्टरों के अलग-अलग संगठन इससे खुश नहीं हैं। डॉक्टर्स और उनके अलग-अलग संगठनों का कहना है कि व्यावहारिक तौर पर ये मुमकिन नहीं है और इस फैसले का विरोध भी हो रहा है।

क्या होती हैं जेनेरिक दवाएं

किसी एक बीमारी के इलाज के लिए तमाम तरह की रिसर्च और स्टडी के बाद एक फ़ॉर्मूला तैयार किया जाता है जिसे मेडिकल भाषा में सॉल्ट कहा जाता है। इस सॉल्ट को आम लोगों के लिए उपलब्ध कराने के लिए दवा का रूप दिया जाता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जेनरिक और ब्रांडेड दवा में एक जैसा ही सॉल्ट होता है और कई मामलों में यह भी देखा गया है कि ब्रांडेड कंपनियों का भी एपीआई या रॉ मैटेरियल वहीं से आया है जहां से जेनेरिक दवाओं का। जेनरिक दवाएं, रासायनिक नामों से ही बेची जाती हैं जिनसे आम जनता परिचित नहीं होती। उदाहरण के तौर पर क्रोसिन और कालपोल ब्रांडेड दवाओं के तहत आती हैं जबकि जेनेरिक दवाओं में उनका नाम पैरासिटामोल है।

अब सवाल उठता है कि जेनेरिक दवा और दूसरी दवा में क्या अंतर है। असल में जब कोई दवा कंपनी कई सालों की रिसर्च और टेस्टिंग के बाद दवा बनाती है तो उसके बाद उस दवा का पेटेंट कराती है। अमूमन किसी दवा के लिए पेटेंट 10 से 15 साल के लिए होता है। जब तक के लिए कंपनी को पेटेंट मिलता है तब तक उस दवा को सिर्फ वही कंपनी बना सकती है। लेकिन जब दवा का पेटेंट खत्म हो जाता है तब उसे जेनेरिक दवा कहा जाता है। यानी पेटेंट खत्म हो जाने के बाद कई सारी कंपनियां उस दवा को बना और बेच सकती है। लेकिन हर कंपनी की दवा का नाम और दाम अलग-अलग होता है। ऐसी स्थिति में वो दवा ब्रांडेड जेनेरिक दवा के नाम से जानी जाती है। भारतीय बाजार में मिलने वाली सिर्फ 9 फीसदी दवाएं ही पेटेंट है जबकि 70 फीसदी से ज्यादा दवाएं ब्रांडेड जेनेरिक है।

पेटेंट ब्रांडेड मेडिसिन की कीमत कंपनियां तय करती हैं। इनके रिसर्च, मार्केटिंग, डेवलपमेंट आदि पर पैसे खर्च किए जाते हैं। जेनेरिक दवाएं पेटेंट फ्री होती हैं और इसी वजह से जेनेरिक दवाओं की सीधे मैन्यूफैक्चिरिंग की जाती है। इनकी कीमतें सरकार के हस्तक्षेप से डिसाइड की जाती हैं और न तो इनके विज्ञापन पर बहुत खर्च होता है और न ही इसमें कमीशन का खेल होता है। इस वजह से जेनेरिक दवाएं सस्ती बिकती हैं। क्वालिटी में ये दवाएं ब्रांडेड से कमतर नहीं होती हैं।

जेनेरिक दवाओं की कमी रहा है बड़ा मुद्दा

भारत में जेनेरिक दवाएं नहीं लिखी जाने के पीछे कई वजहें हैं। इनमें से एक आम तर्क यह भी है कि देश में ये दवाएं पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं है। एक हद तक इस बात में सच्चाई भी है क्योंकि सरकारी अस्पतालों में भी कई बार जरूरी दवाएं नहीं होती हैं। ऐसी स्थिति में मजबूरन भी ब्रांडेड महंगी दवाइयां खरीदनी पड़ती हैं। उदाहरण के तौर पर, देश के सबसे प्रतिष्ठित अस्पताल एम्स की ओर से भी कोविड आपदा के बाद जेनेरिक और जीवन रक्षक दवाओं की उपलब्धता में कमी की रिपोर्ट केंद्र सरकार को दी गई थी। इसके अलावा, पूरी दुनिया में फर्मास्युटिकल कंपनियों के दबदबे और उनका भ्रष्टाचार कोई नया मुद्दा नहीं है। अमेरिका जैसे देश में फार्मा लॉबी को सरकार बनाने और गिराने के कारणों में गिना जाता है। फर्मास्युटिकल कंपनियों के बड़े अस्पतालों और डॉक्टरों के साथ साठ-गांठ और भ्रष्टाचार का मुद्दा कई बार सामने आ चुका है। इससे पहले भी सरकार ने जेनेरिक दवाएं लिखने का निर्देश दिया था और इसके अलावा फार्मा कंपनियों और मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव्स के मिलने संबंधी नियम बदले गए थे। कई बार जेनेरिक दवाएं लिखने के निर्देश के बाद भी अब तक इस पर सख्ती से कार्रवाई नहीं हो सकी है।

इसका एक पहलू यह भी है कि जेनेरिक दवाओं के प्रति फैली भ्रांतियों के कारण लोग इनके इस्तेमाल से बचते हैं। इनको लेकर अधिकांश लोग भ्रम की स्थिति में रहते हैं कि कम कीमत होने के कारण इनका असर भी कम होता होगा, जबकि जेनेरिक दवाओं के साथ ऐसा कुछ नहीं है। जेनेरिक दवाएं पूरी तरह से सुरक्षित हैं और खास बात यह है कि जेनेरिक दवाएं कई ब्रांडेड कंपनियां भी बना रही हैं। कई बार मरीजों को इनके प्रति डराया जाता है। कुछ डॉक्टर्स, मरीजों को अपने रिस्क पर जेनरिक दवाओं का इस्तेमाल करने की बात कहते हैं और ऐसे में मरीजों में भ्रम पैदा हो जाता है। जेनेरिक दवाओं की डोज और साइड इफेक्ट ब्रांडेड दवाइयों जैसे ही होते हैं। इनको लेकर फैली भ्रांतियों और जागरुकता के अभाव में मरीजों को मजबूरी में महंगी दवाओं का यूज करना पड़ रहा है।

जेनेरिक दवाइयों में नंबर वन
भारत जेनेरिक दवाओं के मामलों में दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले काफी आगे है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत दुनिया के देशों को सबसे अधिक जेनेरिक दवा उपलब्ध कराने वाला देश है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि विदेशों में 20 फीसदी जेनरिक दवाओं का निर्यात भारत से किया जाता है। इसका सीधा मतलब है कि दुनिया भर के देशों में भारतीय दवाएं गुणवत्ता और मूल्य दोनों के लिहाज से अंतरराष्ट्रीय मानकों पर खरी हैं । भारत में बनी जेनरिक दवाओं की मांग अमेरिका, कनाडा, जापान, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन समेत अनेक विकासशील देशों में भी है। अगर रिपोर्ट्स की मानें तो भारत का दवा उद्योग 60 चिकित्सीय श्रेणियों में 60,000 जेनेरिक ब्रांड मुहैया कराता है और यह अमेरिका की 40% और अफ्रीका की 50% जेनेरिक दवाओं की मांग को पूरा करते हैं।

लैटिन अमेरिका और अफ्रीका के गरीब देशों की सस्ती दवा जरुरतों को पूरा करने में भारत का बहुत बड़ा योगदान है। भारतीय फार्मा कंपनियों का अमेरिकी बाजार में दबदबा बढ़ रहा है और भारतीय जेनेरिक दवा कंपनियों का अमेरिका में निवेश अब बढ़कर 82 हजार करोड़ रुपए से ज़्यादा का हो गया है। हाल ही में अमेरिका की दवा नियामक फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (FDA) ने पहली बार ग्रेन्युल्स कंपनी को मेड इन इंडिया टैग के साथ दवा निर्यात को मंजूरी प्रदान की है। अमेरिका के एसोसिएशन फॉर एक्सेसेबल मेडिसिन के मुताबिक, जेनेरिक दवाओं के इस्तेमाल के कारण हेल्थकेयर सिस्टम को 2019 के दौरान लगभग 25। 66 लाख करोड़ रुपए की बचत भी हुई थी।

स्वास्थ्य हर नागरिक का मूलभूत अधिकार है। बड़ी आबादी वाले हमारे देश में इस मोर्चे पर पहले से ही बहुत-सी समस्याएं मौजूद हैं और ऐसे में सस्ती दवाओं की पहुंच बढ़ाने के लिए बने नियमों को सख्ती से लागू किया जाना आवश्यक है। इसके लिए और नए जन औषधि केंद्र खोलना, जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता एवं आमजन की जागरूकता जरूरी है। साथ ही, चिकित्सकों का भी यह नैतिक दायित्व है कि वे मरीजों को सस्ती जेनेरिक दवाओं को अपनाने का सुझाव दें।

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