गंगा नदी में पायी जाने वाली डॉल्फिन खतरे में

Ganga pollution rising, Dolphin in danger
कानपुर। गंगा हमारी आस्था से जुड़ी वह पवित्र नदी है, जो अपने नाम के साथ अनेक किंवदंतियों, परंपराओं और सभ्यताओं को समेटे हुए है। लेकिन निरंतर बढ़ते प्रदूषण से न सिर्फ गंगा मैली हो गई, बल्कि इसकी गोद में पल रहा हमारा राष्ट्रीय जलीय जीव, गंगा डॉल्फिन, का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया।

डॉल्फिन के संबंध में माना जाता है कि यह अति प्राचीन मछली है, जो मानव समाज की दोस्त है। कहा जाता है कि भगीरथ की तपस्या से जब गंगा स्वर्ग से उतरी थी, तब उसकी धारा में यह मछली भी थी। बहरहाल, डॉल्फिनों को बचाने की सबसे पहली मुहिम सम्राट अशोक के काल में शुरू हुई थी, पर उसके बाद लंबे समय तक इसे बचाने का कोई प्रयास नहीं हुआ और यह शिकारियों का शिकार होती रही।

वर्ष 2005 से विश्व प्रकृति निधि और सेवियर्स संस्था ने इस मछली को बचाने की मुहिम चलाई है। इसी मुहिम के तहत सरकार ने वर्ष २००९ में गंगा की डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलीय जीव घोषित किया। उत्तर प्रदेश के पांच जिलों मेरठ, बिजनौर, मुरादाबाद, गाजियाबाद और बुलंदशहर में बह रही गंगा नदी में ये डॉल्फिनें हैं। बिजनौर बैराज से लेकर नरौरा बैराज तक 165 किमी के जल क्षेत्र में ये विचरण करती हैं।

गढ़ से लेकर नरौरा तक के 86 किमी तक का क्षेत्र रामसर क्षेत्र घोषित है, जिसमें यह प्रजनन भी करती हैं। उनकी संख्या बढ़ाने के लिए अब यहां प्रयास भी किए जा रहे हैं। सेवियर्स संस्था की सचिव स्वाति शर्मा और विश्व प्रकृति निधि के अधिकारियों की मानें, तो रामसर साइट में वर्ष 2005 में डॉल्फिनों की संख्या 35 थी, जो वर्ष 2010 में बढ़कर 53 हो गई है। डॉल्फिनों के व्यवहार को जानने के लिए टोक्यो यूनिवर्सिटी, जापान और आईआईटी जैसे संस्थान शोध भी कर रहे हैं और इसी के लिए बुलंदशहर के कर्णबास में गंगा नदी के अंदर विभिन्न प्रकार के उपकरण भी लगाए गए हैं।

डॉल्फिन के लिए सबसे बड़ी समस्या है, गंगा पर बैराजों का निर्माण। इस निर्माण के कारण गंगा में गंदगी और रेत बढ़ रही हैं और उसका जल स्तर घट रहा है। इसके अलावा 'पलेज' की खेती भी इसके लिए एक बड़ी समस्या बनी है, जिसमें प्रयोग होने वाली रासायनिक खाद डॉल्फिन के जीवन को निगल रही है।

लेकिन एक अच्छा संकेत यह है कि अब आम आदमी भी इस मछली को बचाने के लिए आगे आ रहा है। संस्था के प्रयासों से जहां पांच जिलों के करीब सौ स्कूलों के बच्चे इस जीव के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए अभियान चला रहे हैं, वहीं नदी में रहकर अपना जीवन यापन करने वाले निषाद समुदाय के लोग भी इसे बचाने में सहयोग दे रहे हैं। गढ़ में रहने वाले निषाद समुदाय के नेता राजमल लोगों को ऐसी जगह जाल डालने से मना कर रहे हैं, जहां डॉल्फिनें आती हैं।

चूंकि गंगा की गोद में पलने वाली यह मछली जन्मजात अंधी होती है और सोनर तरंग के माध्यम से चलती है। जब यह तरंग सूत केजाल से टकराकर वापस लौटती है, तो उसे सचेत कर देती है। लेकिन नायलॉन के जाल में यह तरंग पार हो जाती है, जिस कारण यह उसमें फंस जाती है। यदि तीन मिनट तक वह ऊपर नहीं आती, तो पानी के अंदर ही दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है।

लेकिन डॉल्फिनों को बचाने के लिए और अधिक प्रयास की जरूरत है। अभी इनके संरक्षण के लिए प्रदेश के पांच जिलों में ही कार्य हो रहे हैं। यदि अन्य जिलों के लोगों को भी इससे जोड़ लिया जाए, तो गंगा की स्वच्छता का प्रमाण कही जाने वाली डॉल्फिनें गंगा में आसानी से नजर भी आएंगी।

Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+