#PehlaPeriod: 'लगता था, पीरियड्स यानी लड़की का चरित्र ख़राब'
लगता था पीरियड्स यानी लड़की का चरित्र ख़राब
#PehlaPeriod सिरीज़ में हमने अब तक महिलाओं के अनुभव आपके साथ शेयर किए.
इस दौरान लड़कियों ने बताया कि कैसे उनके पिता पीरियड्स की बात सुनकर झेंप गए या कैसे उनके भाई को लगा कि वे पेट दर्द का बहाना बना रही हैं.
इसलिए सिरीज़ के आखिर में हम पेश कर रहे हैं पुरुषों के कुछ अनुभव. मसलन, माहवारी के बारे में उनकी क्या धारणा है और उन्हें इस बारे में कैसे पता चला.
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पहले मुझे पता नहीं था कि पीरयड्स असल में क्या होते हैं. स्कूल में पीरियड्स के ऊपर जब भी बात होती थी, तो साथ के लड़के हमेशा लड़कियों का मज़ाक बनाते थे.
उनकी बातें सुनकर मुझे भी यही लगने लगा था कि इसका मतलब कुछ गंदा ही है.
दिल्ली का लड़का होते हुए भी मेरे लिए किसी लड़की के बारे में यह सुनना कि उसे पीरियड हो रहे हैं, उसके चरित्र पर उंगली उठाने को मजबूर करता था.
ख़राब चरित्र से रिलेट करने की वजह इस बारे में जानकारी न होना था. स्कूल लाइफ़ में एक भी लड़की दोस्त का न होना शायद इसकी एक वजह हो सकती है.
साथ ही यह भी बताना चाहूंगा कि आज तक मेरे घरवालों ने मुझसे इस बारे में कोई बात नहीं की है.
एक बार मैंने घर में देखा था कि मम्मी ने दीदी को कागज में लपेटकर कुछ दिया था और वो सीधा बाथरूम चली गई थी.
मैंने पूछा तो नहीं पर मैं समझ गया था कि कुछ तो है. मुझे आज भी याद है, मेरे एक दोस्त ने एक लड़की की चाल देखकर कहा था कि इसे पीरियड्स हो रहे हैं.
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खैर, मुझे पीरियड का असली मतलब मेरी ही एक दोस्त ने बताया. उसने एक बार मुझसे कहा था, "रवि, यार मुझे पीरियड हो रहे हैं."
यह सुनकर मैं उसके सामने ही हंस पड़ा था. फिर उसने मुझे ग़ुस्से से घूरा था और लताड़ कर बोली थी, "तुझे पता भी है कि पीरियड होता क्या है?"
कम ज्ञान और अनुभव ने मुझे डरा दिया. मेरे ना में जवाब देने पर उसने मुझे समझाया कि पीरियड क्या होता है, क्यों होता है और इसमें कितना दर्द होता है.
मैं दिल्ली से हूं और शहरी होने के कारण हम खुद को अडवांस भी मानते हैं.
इस तथाकथित अडवांस कल्चर में रहते हुए भी, आज भी हम जैसे लड़के पीरियड्स को लेकर कटाक्ष कस देते हैं.
अगर कोई लड़की खुलकर इस बारे में बात करने लगे तो उसे खुला ऑफर समझ लेते हैं. जब तक इन मुद्दों पर खुलकर बात नहीं होगा, हालात बदलना मुश्किल है.
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पीरियड्स के बारे में मुझे ग्रेजुएशन में पता लगा. मेरी एक दोस्त ने ही बताया.
कुछ दिनों के लिए उसका व्यवहार बदल जाता था, ग़ुस्सा ज्यादा करती थी और चिड़चिड़ी भी हो जाती थी,
पहले अजीब लगता था पर कुछ समय बाद संवेदनशील हो गया. उसे पीरियड्स के दौरान दर्द बहुत होता है. मैं हमेशा उससे एक ही सवाल करता हूं, इतना दर्द कैसे सहती हो?
मेरे घर पर इसको लेकर कभी बात नही की गई. पीरियड्स के दौरान अब भी मेरी मां किचन में नहीं जाती हैं और सैनिटरी नैपकिन्स को लेकर भी जागरूकता की कमी है.
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कब पता नहीं. कैसे? ये थोड़ा-थोड़ा याद है. दो बहनें हैं मेरी. लेकिन बचपन से घर से दूर रहा हूँ तो हमारे बीच आम भाई-बहन की तरह लगाव नहीं है.
इस वजह से कभी बहनों की तरफ से मालूम नहीं चला. हालांकि 13 या 14 का रहा होउंगा जब हॉस्टल से छुट्टियों में घर आया तो मेरी बहनें हमारी चचेरी बहन से कुछ खुसुर फुसुर कर रही थीं.
मुझे बोला लड़कियों की बातें हैं. फिर भी कौतूहलवश थोड़ा ज़ोर लगा कर सुना तो व्हिस्पर सुन पाया.
इसके बाद दोस्तों से बातचीत, लड़कपन की अधकचरी जानकारियां, महिलाओं वाली मैगज़ींस. थोड़ा इंट्रोवर्ट हूं तो कोई ऐसी दोस्त भी नहीं रही जिससे खुलकर पूछ सकूँ.
आज भी जो मालूम है, हो सकता है कुछ ग़लत भी होगा उसमें, वो इसी तरह धीरे-धीरे जाना है. छोटे शहरों में ऐसा ही तो होता है.
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अनिमेष मुखर्जी
मुझे कभी समझ में नहीं आता था कि मेरे परिवार की महिलाएं अचानक से क्यों अचार देने से मना कर देती हैं. या दुर्गा पूजा में भी नहीं जाती हैं.
नौवीं में ये सब कोर्स का हिस्सा था पर टीचर ने कुछ नहीं पढ़ाया, ये कहते हुए कि ये इम्पॉर्टेंट नहीं है. 12वीं में बायॉलॉजी का छात्र था और तब तक कुछ 'बड़े' दोस्त बन चुके थे.
इस बार सक्सेना सर ने पढ़ाया तो, लेकिन इतने ज़्यादा वैज्ञानिक शब्दों में कि रट्टा मार सकते थे पर समझ नहीं आता.
आधे-अधूरे ज्ञान वाले उन बड़े दोस्तों ने बताया कि ये लड़कियों का मज़ाक उड़ाने वाली कोई चीज़ है. इस दौरान सेक्स नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे लड़कियां प्रेग्नेंट हो जाती हैं.
इस बीच एक लड़के से दोस्ती गहरी हुई जिसका मेडिकल स्टोर था. शुरू में बड़ा अजीब लगा कि कैसे वो लड़कियों को पैकेट बेचता है या पिताजी को बताता है कि डीलक्स और व्हिस्पर का स्टॉक खत्म हो गया. मगर उसी से पता चला कि ये अश्लील नहीं बायोलॉजिकल प्रक्रिया है.
इसके बाद एक गर्लफ्रैंड थी. उसके साथ ही मूड स्विंग और दर्द जैसी चीजों का पता चला. हालांकि वो तमाम अंधविश्वासों को वैज्ञानिक मानती थी.
सबसे खास बात ये कि इससे जुड़ी इन्फॉर्मेशन 10 साल से ज़्यादा समय में मिली जिसे एक दिन क्लास में बैठ कर समझाया जा सकता था.
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