किसान आंदोलन: फ़ोन की घंटी के इंतज़ार में बीते चार माह, नए कृषि क़ानूनों का भविष्य क्या है?
भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 जनवरी 2021 को किसान संगठनों से कहा था, "केंद्र सरकार के प्रस्ताव पर अगर किसान नेता चर्चा करना चाहते हैं तो मैं बस एक फोन कॉल दूर हूँ."
इस बात को चार महीने बीत गए. कोरोना महामारी के बीच सर्दियों के मौसम में शुरू हुए आंदोलन को लेकर गतिरोध जस-का-तस बना हुआ है जबकि देश में कोरोनो की दूसरी लहर और गर्म हवाओं के थपेड़े जारी हैं.
सवाल यही है कि पहले फोन उठाकर कॉल कौन करेगा? पहले आप, पहले आप के चक्कर में किसान आंदोलन को शुरू हुए छह महीने बीत गए हैं. छह महीने पूरे होने के मौके पर बुधवार को किसान देश भर में 'काला दिवस' मना रहे हैं.
कोरोना महामारी में अब बॉर्डर पर डटे किसानों की संख्या ज़रूर कम हुई है लेकिन उनका दावा है कि आंदोलन जारी है और उनकी तैयारी 2024 तक की है.
किसान संगठनों के दावों और केंद्र सरकार के कृषि सुधार के वादों के बीच अब ये देखना ज़रूरी है कि आख़िर उन तीन क़ानूनों का भविष्य क्या है?
नए कृषि क़ानून की आज की स्थिति
सितंबर में तीन कृषि क़ानून भारत की संसद ने पास किए. उसके बाद उन्हें राष्ट्रपति से मंजूरी भी मिल गई. लेकिन तुरंत ही मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँच गया.
कोर्ट ने मामले में चार सदस्य कमेटी का गठन किया गया, जिसे दो महीने में कोर्ट को रिपोर्ट देनी थी. तब तक केंद्र सरकार को क़ानून अमल में न लाने के लिए कहा गया.
यानी कोर्ट के फैसले तक क़ानून पर रोक थी. संयुक्त किसान मोर्च ने कमेटी के सदस्यों के नाम पर आपत्ति जताई. कमेटी के सामने वो अपनी गुहार लेकर नहीं गए.
एक सदस्य ने इस्तीफा दे दिया. बाकी के तीन सदस्यों ने दूसरे किसान संगठनों के साथ बातचीत के बाद सुप्रीम कोर्ट को अपनी रिपोर्ट सौंप दी है. उस रिपोर्ट को अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है.
दूसरी तरफ़, नए कृषि क़ानून के विरोध में 40 किसान संगठनों ने अपना एक मोर्चा बनाया, नाम रखा संयुक्त किसान मोर्चा. इस संगठन के नेताओं की केंद्र सरकार के साथ 11 दौर की बातचीत चली, जो अब तक बेनतीजा ही रही.
यह बातचीत इतने तनावपूर्ण माहौल में हुई कि किसान नेता विज्ञान भवन में होने वाली बैठकों में अपना खाना ले जाते रहे, उन्होंने सरकारी खाना खाने से इनकार कर दिया.
केंद्र सरकार की तरफ़ से आख़िरी प्रस्ताव जो किसान संगठनों को दिया गया उसमें कृषि सुधार क़ानूनों 18 महीनों के लिए टाल दिए जाने की बात कही गई थी.
लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा ने ये प्रस्ताव भी नामंजूर कर दिया, वे तीनों कानूनों को रद्द करने की माँग पर अड़े रहे और उन्हें काला कानून कहते रहे. यानी संयुक्त किसान मोर्चा न तो सुप्रीम कोर्ट की कमेटी के सामने गया, न ही सरकार का प्रस्ताव मंज़ूर किया.
ये ज़रूर है कि 22 जनवरी 2021 से बंद पड़ी बातचीत को दोबारा शुरू करने को लेकर एक चिट्ठी प्रधानमंत्री को लिखी है. इस चिट्ठी के जवाब का उनको बेसब्री से इंतज़ार है.
इस बीच 26 मई को 'काला दिवस' मनाने का ऐलान किया गया है. पहले दिल्ली बॉर्डर पर दोबारा से किसानों को बुलाने की योजना थी लेकिन कोरोना महामारी की जगह इसे स्थगित करके जो जहाँ है, वहीं 'काला दिवस' मनाए, ऐसी घोषणा की गई है.
https://twitter.com/_YogendraYadav/status/1395790739464982533
ऐसे में सवाल उठता है कि उन कृषि क़ानूनों का क्या जिसे सरकार कृषि क्षेत्र के लिए लाभकारी बता रही थी. क्या वो ठंडे बस्ते में यूं ही पड़े रहेंगे? या फिर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय ही अंतिम फैसला होगा? और अगर कोर्ट से भी हल न निकला तो इनका क्या होगा?
सभी पक्षों से जुड़े जानकार मानते हैं कि नए कृषि क़ानून में कुछ मसले राजनीतिक हैं, तो कुछ क़ानूनी भी. इस वजह से समाधान भी दोनों तरह से ढूंढने की ज़रूरत होगी.
नए कृषि क़ानून का भविष्य?
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के सह-संस्थापक और अध्यक्ष एमआर माधवन से बीबीसी ने इस बारे में बात की. यह संस्था भारत की संसद के कामकाज का विस्तृत लेखा-जोखा रखती है.
उनका कहना है कि "सुप्रीम कोर्ट के पास इस बात पर फैसला सुनाने का अधिकार है कि नए कृषि क़ानून संवैधानिक है या नहीं. ये अधिकार सुप्रीम कोर्ट को भारत के संविधान से ही मिले हैं. कोर्ट का फैसला आने तक नए कृषि क़ानून को स्थगित करने का अधिकार भी उनके पास है. लेकिन ये क़ानून उचित हैं या नहीं - इस पर फैसला सुनाने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट के पास नहीं है."
जब संयुक्त किसान मोर्चा ने कमेटी की सिफारिशें आने से पहले ही उसे मानने से मना कर दिया हो, ऐसी सूरत में माधवन संभावित स्थितियों की बात करते हैं--
·सुप्रीम कोर्ट मामले की अगली सुनवाई में क़ानून संवैधानिक है या नहीं, इस पर फैसला सुना दे.
·अगर क़ानून को संवैधानिक करार दिया जाता है तो केंद्र सरकार सरकार के पास दो विकल्प होंगे
पहला तो ये कि सरकार इसी रूप में नए क़ानून को लागू करने के लिए आगे बढ़े सकती है. फिर उसके परिणाम जैसे हों उससे निपटने के लिए सरकार तैयार रहे.
दूसरा ये हो सकता है कि कोर्ट इसे संवैधानिक करार दे दे, उसके बाद भी केंद्र सरकार किसानों की सलाह पर क़ानून में कुछ बदलाव कर सकती है.
·अगर क़ानून असंवैधानिक करार दिया जाता है तो केंद्र सरकार नए कृषि क़ानून को वापस संसद में ले जा सकती है, और नए सिरे से चर्चा कराकर बदले हुए कानून पारित करा सकती है.
माधवन कहते हैं, "फिलहाल जब क़ानून पर सुप्रीम कोर्ट की तरफ़ से रोक है, ऐसे में केंद्र सरकार ने उसके लिए नियम नहीं बनाए हैं. और न ही वो ऐसा तुरंत करने के लिए बाध्य है. दरअसल, क़ानून पास होने के बाद उसके प्रावधान बनाने के लिए कोई समय-सीमा निर्धारित नहीं है. जैसा लोकपाल बिल के साथ हुआ. भारत में लोकपाल क़ानून संसद ने पास कर दिया है, लेकिन लोकपाल की नियुक्ति आज तक नहीं हुई है. ठीक वैसा ही नए कृषि क़ानून पर भी संभव है."
भारतीय किसान संघ के सुझाव
नए कृषि क़ानून के भविष्य पर एक सुझाव भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय सचिव मोहिनीमोहन मिश्रा का भी है. बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "देश भर के किसानों का प्रतिनिधित्व संयुक्त किसान मोर्चा नहीं करता. इस संगठन के अंदर आने वाले ज़्यादातर किसान पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हैं. सरकार को क़ानून के प्रावधान बनाते वक़्त केवल इतना करना है कि इसे राज्य सरकारों पर छोड़ दे, यानी पंजाब हरियाणा जैसे राज्य जो इसे लागू नहीं करना चाहते, वे न करें, और बाकी देश में यह लागू हो जाए."
भारतीय किसान संघ की राय है कि केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट में जाकर कहे कि कोर्ट ने भी कोशिश कर ली, केंद्र ने भी कोशिश कर ली. अब कोर्ट, केंद्र को क़ानून लागू करने की इजाजत दे दे.
मिश्रा का कहना है कि केवल संयुक्त किसान मोर्चा के तहत आने वाले किसान संगठनों की माँग है कि कृषि बिल वापस लिए जाए, बाकी संगठन ऐसा नहीं चाहते.
उनके मुताबिक, देश के बाकी किसान संगठन थोड़े बदलाव के साथ इन नए कृषि बिल को मानने के लिए तैयार हैं. सरकार उन बदलावों के लिए तैयार भी दिख रही है जैसे फसल ख़रीदने वाले व्यापारियों के लिए अलग से पोर्टल, व्यापारियों के लिए बैंक गारंटी को अनिवार्य बनाना, किसी भी विवाद की सूरत में मामले का निपटारा ज़िला स्तर पर होना.
अपनी माँगों को लेकर वो कहते हैं हमें नए कृषि क़ानून में मूलत: यही तीन बदलाव चाहिए, जो प्रावधान बनाते समय आसानी से शामिल किए जा सकते हैं. इसके अलावा वो ये भी चाहते हैं कि एमएसपी पर फसल ख़रीद को लेकर केंद्र और राज्य सरकारें कोई प्रावधान ज़रूर बनाएँ.
किसान आंदोलन: आरएसएस से जुड़े संगठनों को भी एमएसपी पर कोई बरगला रहा है?
संयुक्त किसान मोर्चा की तैयारी
संयुक्त किसान मोर्चा ख़ुद को पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर-प्रदेश तक सीमित नहीं मानते. उनके मुताबिक़ फिलहाल क़ानून स्थगित है, लेकिन नए क़ानून पर से ये स्टे कभी भी हटाया जा सकता है, इसलिए उनके पास आंदोलन जारी रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं है.
बीबीसी से बातचीत में संयुक्त किसान मोर्चा के सदस्य योगेंद्र यादव ने कहा, "कोरोना के मद्देनज़र उनका आंदोलन धीमा नहीं पड़ा है. लेकिन एहतियात के तौर पर उन्होंने ख़ुद किसानों से आग्रह किया है कि वो 26 मई को दिल्ली आएं लेकिन जत्थे में नहीं. कुछ समय के लिए आम लोगों का और मीडिया का ध्यान आंदोलन से ज़रूर हटा है, लेकिन किसान अब भी बॉर्डर पर डटा है."
आंदोलन कब और कैसे ख़त्म होगा? इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, "सच तो ये है कि सरकार के पास किसानों को देने के लिए कुछ नहीं है. सरकार की हिम्मत नहीं है ऐसे किसी क़ानून को दोबारा लागू करने की. आज केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट की आड़ में बैठी है. कल कोई और बहाना हो जाएगा. लेकिन अपने घमंड के कारण वो इसे लिखने में कतरा रही है. आंदोलन कैसे ख़त्म हो? इसका रास्ता सरकार को निकालना है. ये ज़िम्मेदारी कुर्सी पर बैठने वाले की होती है. अगर वो कुर्सी पर बैठकर नया प्रस्ताव नहीं दे सकते, तो उतर जाएँ."
संयुक्त किसान मोर्चा के ही दूसरे सदस्य और मध्य प्रदेश के किसान नेता शिव कुमार कक्काजी कहते हैं 26 मई के आगे उनकी तैयारी 2024 तक के लिए हो गई है. लेकिन वो क्या है? इस पर वो ज़्यादा नहीं बताते.
क्या 'मिशन यूपी' होगा अगला पड़ाव?
इस साल जनवरी फरवरी तक राजनीतिक विश्लेषकों को लग रहा था कि किसान आंदोलन और नए कृषि क़ानून का भविष्य पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव से जुड़ा है. लेकिन अब चुनाव ख़त्म हो गए हैं, नतीजे भी सामने आ गए. हार और जीत के कारणों का सभी पार्टियाँ विश्लेषण भी कर रही हैं.
लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा में कई किसान नेताओं को लगता है कि उन्होंने बंगाल में जाकर जो प्रचार किया, बीजेपी की पश्चिम बंगाल में हार के पीछे वो भी एक कारण है. उन्हें लगता है कि चुनाव में बीजेपी की हार ही उनकी कमज़ोर नब्ज़ है.
बीजेपी को भले आंदोलन से फ़र्क पड़े ना पड़े, लेकिन चुनाव हारने से ज़रूर फ़र्क पड़ता है.
इस वजह से इस बात की पूरी संभावना लगती है कि अगले चरण में संयुक्त किसान मोर्चा 'मिशन यूपी' में प्रचार के लिए जुटेगी. हालांकि इसका आधिकारिक एलान नहीं हुआ है, लेकिन इससे इनकार भी नहीं किया जा रहा.
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव में बीजेपी का प्रदर्शन उम्मीद से कम रहा है. इससे भी किसान नेता थोड़े उत्साहित है. नाम ना छापने की शर्त पर एक किसान नेता ने कहा,"बंगाल में जब गए तो छह हफ़्ते भी हमारे पास नहीं थे, हमारी संगठन की उतनी पहुँच भी नहीं थी, लेकिन उत्तर प्रदेश चुनाव में तो अभी वक़्त है. हम आज से एक-एक गाँव में जाकर बैठेंगे, किसी पार्टी का सपोर्ट नहीं करेंगे. बस इतना कहेंगे, किसान विरोधी सरकार को हटाओ."
हरवीर सिंह कृषि मामलों के जानकार पत्रकार हैं और ग्रामीण भारत से जुड़ी एक वेबसाइट चलाते हैं. पश्चिमी उत्तर प्रदेश को उन्होंने सालों से कवर किया है. बीबीसी से बातचीत में वो कहते हैं, "बीजेपी को किसानों के 'मिशन यूपी' डर ज़रूर सता रहा है. उसी राजनीतिक नुक़सान को कुछ कम करने के लिए केंद्र सरकार ने खाद सब्सिडी बढ़ाने का फैसला हाल ही में लिया है. इस क़दम से स्पष्ट संकेत मिलते हैं कि केंद्र सरकार किसानों की और नाराज़गी मोल नहीं लेना चाहती है."
दरअसल, डाई अमोनियम फ़ॉस्फेट खाद के दाम इस साल अप्रैल में 1200 रुपये प्रति बोरी से बढ़कर 1700 रुपये प्रति बोरी हो गई थी. इस खाद का इस्तेमाल ज़्यादातर फसलों में किया जाता है. इससे किसान और ज़्यादा नाराज़ हो रहे थे. सरकार ने आनन-फानन में बैठक बुलाकर जितने दाम बढ़े उतनी ही सब्सिडी दे दी थी.
लेकिन संयुक्त किसान मोर्चा इस सब्सिडी से भी खुश नहीं दिखती. योगेंद्र यादव कहते है, "मैं आपको कह दूं कि कल तक जो चीज़ 5 रुपये में मिल रही थी, उसके दाम मैंने 15 रुपये कर दिए हैं, लेकिन 10 रुपये की सब्सिडी देंगे, तो क्या आप उस 10 रुपये की सब्सिडी का जश्न मनाएंगें? इसे सब्सिडी ना ही कहा जाए तो अच्छा है."
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब 8-10 महीने का वक़्त बचा है. पंचायत चुनाव के नतीज़ों में पश्चिम उत्तर प्रदेश में बीजेपी का प्रदर्शन वैसा नहीं रहा जैसा पार्टी को उम्मीद थी. बीकेयू का असर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इन्हीं इलाकों में है. ये बातें भले ही कृषि क़ानून से सीधे ना जुड़ी हों, लेकिन क़ानून पर केंद्र सरकार के रूख को ज़रूर प्रभावित करेंगी. ऐसा हरवीर मानते हैं.
इससे समझा जा सकता है कि एक तरफ़ किसान आंदोलन से केंद्र सरकार दबाव में है तो दूसरी तरफ़ किसान संगठनों के सामने चुनौती कोरोना महामारी में आंदोलन को ज़िंदा रखने की है.
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