पति की संपत्ति में हाउसवाइफ़ का बराबर का हक़, पर क्या बदलेगा परिवार का नज़रिया?

पति की संपत्ति में हाउसवाइफ़ बराबर की हक़दार
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पति की संपत्ति में हाउसवाइफ़ बराबर की हक़दार

मद्रास हाई कोर्ट ने हाल ही में एक मामले में कहा कि पति की संपत्ति में उनकी गृहिणी पत्नी का बराबर का अधिकार है.

ये मामला तमिलनाडु की एक दंपती का था, जहां पति की कमाई से महिला ने संपत्तियां ख़रीदी थीं.

इस महिला के पति दुबई में काम करते थे और वापस लौटने के बाद पति ने पांच संपत्तियों पर अपने मालिकाना हक़ को लेकर कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था.

इस मामले में कोर्ट ने कहा था कि पत्नी घरेलू काम करते हुए संपत्ति में योगदान देती है और इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि संपत्ति पत्नी के नाम ख़रीदी गई है या पति के नाम पर.

कोर्ट का कहना था, ''पति या पत्नी ने अगर परिवार की देखभाल की है तो संपत्ति में बराबरी का हक़ होगा. पति आठ घंटे की नौकरी करता है लेकिन पत्नी चौबीस घंटे काम करती है.''

कोर्ट ने इस मामले में ये भी कहा, ''अगर गृहिणी न हो तो पति को कई चीज़ों के लिए पैसे ख़र्च करने पड़ते. जबकि गृहिणी घर में कई भूमिकाएं निभाती है. वो खाना बनाती है. घर में डॉक्टर, इकोनॉमिस्ट समेत कई लोगों का काम एक साथ करती है. इससे पति को नौकरी करने में आसानी होती है.''

पति की संपत्ति में गृहणी पत्नी को बराबर का हक़
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पति की संपत्ति में गृहणी पत्नी को बराबर का हक़

कोर्ट का सकारात्मक फ़ैसला

महिला कार्यकर्ताओं और जानकारों का कहना है कि परिवार में महिला के काम को कभी प्रमुखता से नहीं देखा जाता है ऐसे में मद्रास हाई कोर्ट का यह फ़ैसला एक सकारात्मक क़दम है.

पंजाब यूनिवर्सिटी में डिपार्टमेंट ऑफ़ विमेन स्टडीज़ में डॉक्टर अमीर सुल्ताना कहती हैं कि आमतौर पर पिता के घर में बेटी को पराया धन माना जाता है वहीं शादी के बाद वो पति का घर हो जाता है.

घरेलू काम करके अपनी ज़िंदगी गुज़ार देने वाली महिला अगर पति का घर छोड़ देती है तो भावनात्मक तौर पर वो टूट तो जाती ही है उसका आर्थिक आसरा भी उससे छूट जाता है.

ऐसे में मद्रास कोर्ट का फ़ैसला महिलाओं को आर्थिक रूप से सक्षम और सशक्त बनाता है.

आमतौर पर ये माना जाता है कि महिला घर में चूल्हा चौकी, साफ़ सफ़ाई, बच्चों और बड़े बुज़ुर्गों की देखभाल करती है जिसका उसे कोई आर्थिक लाभ भी नहीं होता, यानी उसे इस काम के एवज में कोई वेतन नहीं मिलता.

संपत्ति
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काम के बदले वेतन

अभिनेता से राजनेता बने कमल हासन ने 2018 में अपनी राजनीतिक पार्टी मक्कल निधि मय्यम के लॉन्च पर कहा था कि अगर उनकी पार्टी सत्ता में आती है तो घर-गृहस्थी संभाल रही महिलाओं को वेतन दिया जाएगा.

उन्होंने कहा था कि गृहस्थी संभाल रही महिलाओं को उनकी सेवाओं के लिए पैसे देने से उनकी ताक़त और स्वायत्तता बढ़ेगी और इससे एक यूनिवर्सल बेसिक इनकम पैदा होगी.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने भी इस विचार का समर्थन किया था.

वहीं 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले में कहा था कि घर पर एक महिला के काम का मूल्य ऑफ़िस में काम करने वाले उनके पति से कम नहीं है.

दरअसल एक सड़क दुर्घटना में दिल्ली के एक दंपति की मौत हो गई थी.

इस मामले में मोटर एक्सिडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने बीमा कंपनी को 40 लाख रुपये का मुआवज़ा देने की बात कही. जिसके बाद कंपनी ने हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया.

जहां हाई कोर्ट ने महिला के गृहिणी होने के कारण आय का न्यूनतम निर्धारण करते हुए मुआवजा घटाकर 22 लाख कर दिया.

इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई.

सुप्रीम कोर्ट ने इसकी सुनवाई के दौरान कहा था, "एक गृहिणी की आमदनी को निर्धारित करने का मुद्दा काफ़ी अहम है. यह उन तमाम महिलाओं के काम को मान्यता देता है जो चाहे विकल्प के रूप में या सामाजिक/सांस्कृतिक मानदंडों के परिणामस्वरूप इस गतिविधि में लगी हुई हैं. यह बड़े पैमाने पर समाज को संकेत देता कि क़ानून और न्यायालय गृहिणियों की मेहनत, सेवाओं और बलिदानों के मूल्य में विश्वास करता है."

साथ ही कोर्ट का कहना था, "यह इस विचार की स्वीकृति है कि ये गतिविधियां परिवार की आर्थिक स्थिति में वास्तविक रूप से योगदान करती हैं और राष्ट्र की अर्थव्यवस्था में योगदान करती हैं. इस तथ्य के बावजूद इन्हें पारंपरिक रूप से आर्थिक विश्लेषण से बाहर रखा गया है.''

परिवार में महिलाओं का योगदान

भारतीय महिलाएं हर रोज़ क़रीब चार घंटे बग़ैर कोई पैसे लिए करती हैं घरेलू काम
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भारतीय महिलाएं हर रोज़ क़रीब चार घंटे बग़ैर कोई पैसे लिए करती हैं घरेलू काम

नेशनल काउंसिल ऑफ़ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च-एनडीआईसी में प्रोफ़ेसर सोलनडे देसाई कहती हैं कि परिवार में महिलाओं के योगदान को कभी गिना नहीं जाता और इस बात से कतई इनकार नहीं किया जा सकता कि वे अप्रत्यक्ष रूप से अर्थव्यवस्था में अपनी भागीदारी निभाती हैं.

एक उदाहरण देते हुए वो समझाती हैं, ''मैंने अर्थशास्त्री देवकी जैन के साथ काम किया था. इसमें हमने ये पाया था कि जिस घर में महिलाएं पारिवारिक खेती संभाल रही थी और पुरुष बाहर नौकरी कर रहे थे, उस परिवार में वेतन ज़्यादा था. ऐसे में अगर घर के काम में महिला की भूमिका को माना ही नहीं जाएगा तो घर की संपत्ति में अधिकार भी नहीं दिया जाएगा.''

साथ ही उनका कहना है कि जब महिलाओं के लेबर या श्रम को आधिकारिक तौर पर स्वीकार किया जाएगा तो ये पता चलेगा कि वे अर्थव्यवस्था में कितनी भागीदारी निभा रही हैं और उससे उनके लिए नीतियां बनाने में भी मदद मिलेगी.

वहीं जंयती घोष एक और अहम बिंदू उठाते हुए कहती हैं, "अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) ने काम की परिभाषा में बदलाव किया है. इसमें अगर कोई बिना वेतन के काम भी कर रहा है उसे काम ही माना जाएगा और जिसे काम के लिए वेतन मिल रहा है उसे रोज़गार माना जाता है."

जेएनयू में सेंटर फ़ॉर इकोनॉमिक स्टडीज़ एंड प्लेनिंग की अध्यक्ष और अर्थशास्त्री जयंती घोष का कहना है कि महिलाएं जो काम करती हैं समाज उसे काम नहीं समझता है लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए.

महिला, पुरुष में कौन कितना करता है घरेलू काम?
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महिला, पुरुष में कौन कितना करता है घरेलू काम?

काम को लेकर भेदभाव

2017 मिस वर्ल्ड प्रतियोगिता में मानुषी छिल्लर से जब पूछा गया कि दुनिया में सबसे ज़्यादा वेतन किस पेशे को मिलना चाहिए तो उनका जवाब था, ''एक मां के पेशे को दुनिया में सबसे ज़्यादा वेतन और आदर मिलना चाहिए.''

समाज में महिला और पुरुष के श्रम को बांटा जाए तो घर के काम महिला के पाले में डाल दिए जाते हैं और पेशेवर काम को पुरुष के खाते में जोड़ कर देखा जाता है.

2011 में की गई जनगणना के मुताबिक़ 15.98 करोड़ महिलाओं ने घरेलू काम को अपना मुख्य व्यवसाय बताया था.

केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने 'टाइम यूज़ इन इंडिया' (2019) शीर्षक नाम से एक रिपोर्ट निकाली थी जिसमें बताया गया था कि महिलाएं हर दिन घर के काम (अवैतनिक घरेलू कार्य) में 299 मिनट लगाती हैं. वहीं भारतीय पुरुष दिन में सिर्फ 97 मिनट घर के काम में लगाते हैं.

यही नहीं, इस रिपोर्ट में ये भी सामने आया था कि महिलाएं घर के सदस्यों का ख़्याल रखने में रोज़ 134 मिनट लगाती हैं. वहीं पुरुष इस काम में सिर्फ 76 मिनट ख़र्च करते हैं.

महिलाओं के प्रति सोच में बदलाव
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महिलाओं के प्रति सोच में बदलाव

सोच में बदलाव

हरियाणा में महिलाओं के अधिकारों के लिए काम करने वाली जगमती सांगवान का कहना है, ''जब महिलाओं से पूछिए कि पति क्या करते हैं तो वो कहती हैं नौकरी करते हैं, बच्चे क्या करते हैं? तो वो बोलती हैं कि पढ़ाई करते हैं और जब उनसे ये पूछा जाए कि वो क्या करती हैं? तो उनका जवाब होता है कुछ नहीं.''

घर के काम को महिलाओं में इतना रचा बसा दिया है कि वो उसे श्रम(लेबर) नहीं मानती लेकिन एक ज़िम्मेदारी के तौर पर देखती हैं. ऐसे में इसे भी श्रम में डाला जाना चाहिए और उसके एवज में वेतन भी दिया जाना चाहिए.

जयंती घोष कहती है कि ये मान लिया जाता है कि चाहे कोई भी परेशानी हो महिलाएं घर का काम, बच्चे और बुज़ुर्गों की देखभाल करना नहीं छोड़ेंगी.

उनके अनुसार, ''ऐसे में उनकी बारगेनिंग क्षमता ख़त्म हो जाती है जबकि ये काम अत्यावश्यक काम में गिने जाने चाहिए और जब तक परिवार, समाज और सरकार के लिए ये काम प्राथमिकता नहीं बनेंगे महिलाओं के काम उनकी रणनीति या नीतियों का हिस्सा भी नहीं बन पाएंगे.

जानकारों की राय में पुरुषों के साथ साथ महिलाओं को भी अपनी सोच में बदलाव लाने की ज़रूरत है.

महिलाओं को इस समझ को दरकिनार करना होगा कि अगर वे नौकरी नहीं करतीं तो घर के काम की सारी ज़िम्मेदारी उन्हीं पर है और ये उनका कर्तव्य है.

वहीं पुरुषों को अपने इस विचार में बदलाव लाना होगा कि अगर वे नौकरी करते हैं तो घर के काम में उनकी भागीदारी कम हो जाती है.

हालांकि बदलते समय में ये देखा जा रहा है जहां परिवार में पति और पत्नी दोनों काम कर रहे हैं वहां पुरुष आगे आकर महिला का हाथ बटा रहे हैं लेकिन वो प्रतिशत काफ़ी छोटा है और महिलाएं दोहरे रोल में ही नज़र आ रही हैं.

लेकिन कोर्ट का फ़ैसला केवल पीड़ित को प्रभावित करता है और इससे अन्य महिलाएं अछूती रह जाती हैं. ऐसे में मानसिकता में बदलाव लाने की ज़रूरत है.

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