Electoral Bonds Scheme: इलेक्टोरल बॉन्ड पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक, जानिए 10 बड़ी बातें
Amendment to companies Act are unconstitutional: चुनावी बॉन्ड योजना की वैधता के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने आज बड़ा फैसला सुनाया। उसने चुनावी बॉन्ड पर रोक लगा दी है।

देश की उच्चतम न्यायालय ने इसे असंवैधानिक बताया और सरकार को किसी अन्य विकल्प को तलाशने के लिए कहा है, कोर्ट ने इलेक्टोरल बॉन्ड योजना की आलोचना की है और कहा कि नेताओं की फंडिग के बारे में खुलासा होना बहुत जरूरी है।
इस बड़ी खबर को जानिए विस्तार से...
- सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में SBI बैंक को 2019 से अब तक चुनावी बॉन्ड की पूरी जानकारी देने का आदेश दिया है।
- भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय संविधान पीठ ने पिछले साल दो नवंबर को मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया था जिसे आज सुनाया है।
- आज जिस पीठ ने सुनाया है उसमें न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के अलावा न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बीआर गवई, न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा भी शामिल थे।
क्या है चुनावी बॉन्ड योजना ?
- चुनावी बॉन्ड योजना या इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम का ऐलान साल 2017 में हुआ था।
- सरकार ने 29 जनवरी 2018 को इसे कानून के रूप में लागू किया था।
- इंडिया का कोई भी नागरिक इलेक्टोरल बॉन्ड को भारतीय स्टेट बैंक की चुनिंदा शाखाओं से खरीद सकता है और इसके जरिए किसी भी राजनीतिक दल को बिना बताए दान कर सकता है।
- बॉन्ड स्कीम को हर वो डोनर खरीद सकता है जिसके पास अपना बैंक अकाउंट है और उसके पास KYC हो।
- इलेक्टोरल बॉन्ड में Payer का नाम नहीं होता है।
- इलेक्टोरल बॉन्ड स्टेट बैंक की कुछ च्निहित शाखाओं पर मौजूद हैं और 1000 रुपये, 10,000 रुपये, 1 लाख रुपये, 10 लाख रुपये और 1 करोड़ रुपये में मौजूद हैं।
- ये बॉन्ड्स की अवधि केवल 15 दिनों की होती है।
- इसके जरिए केवल उन्हीं राजनीतिक दल को डोनेट किया जा सकता है लोकसभा या विधानसभा चुनावों में कम से कम 1 प्रतिशत वोट हासिल किया हो।












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