मध्य प्रदेश में 28 नवंबर को डाले जाएंगे वोट, जानें कैसे तय होगी शिवराज की जीत-हार
नई दिल्ली। चुनाव आयोग ने शनिवार को पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की तारीखों का ऐलान कर दिया। आयोग ने मध्य प्रदेश, मिजोरम, राजस्थान और तेलंगाना में एक चरण में ही चुनाव कराए जाने की बात कही है, जबकि छत्तीसगढ़ में दो चरणों में मतदान कराया जाएगा। मध्य प्रदेश और मिजोरम में एक ही चरण में 28 नवंबर को वोट डाले जाएंगे।

मध्य प्रदेश की जमीनी हकीकत से जुड़े आंकड़े
- मध्य प्रदेश में 2013 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 165 सीटों पर जीत मिली थी। कांग्रेस 58 विधानसभा सीटें पर जीत दर्ज करने में सफल रही थी, जबकि बसपा को 4 विधानसभा सीटें मिली थीं। 2013 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 45.7 प्रतिशत वोट मिला था, जबकि कांग्रेस को 37.1 प्रतिशत मत प्राप्त हुआ था। बसपा को 2013 विधानसभा चुनाव में 6.4 प्रतिशत वोट प्राप्त करने में सफल रही थी।
-मध्य प्रदेश की कुल 230 विधानसभा सीट हैं।
- 230 विधानसभा सीटों में 35 एससी यानी शेड्यूल कास्ट के लिए रिजर्व हैं।
-इसी प्रकार से करीब 47 सीटें एसटी यानी आदिवासी समुदाय के प्रत्याशियों के लिए रिजर्व हैं।
-एससी और एसटी सीटों को जोड़ दें तो 230 विधानसभा सीटों में से 82 सीटें रिजर्व हैं।
- अनुसूचित जनजाति वर्ग की 47 सीटों में से फिलहाल बीजेपी के पास दो तिहाई मतलब 32 सीटें हैं, जबकि कांग्रेस के पास एक तिहाई यानी 15 सीटें हैं। इसके अलावा सामान्य सीटों में भी से 31 ऐसे विधानसभा क्षेत्र हैं, जहां पर आदिवासी वोट फैक्टर हार-जीत तय करने में अहम भूमिका निभाता है।
-एमपी का ट्रेंड देखें तो जब-जब आदिवासी वोट करवट लेता है, तब-तब सरकारें बदल जाया करती हैं। 1990 में जब संयुक्त मध्यप्रदेश था, तब बीजेपी को इसी आदिवासी वोट के सहारे सत्तासीन होने का अवसर मिला था और जब 1993, 1998 में जब यही वोट बैंक कांग्रेस की ओर झुका बीजेपी को सत्ता गंवानी पड़ी।
-2003 विधानसभा चुनाव में आदिवासी भाजपा के साथ आए, तब प्रदेश में आदिवासी सीटों की संख्या 41 थी, जिसमें भाजपा को 34 और कांग्रेस को सिर्फ दो सीट मिली थीं। परिसीमन के बाद 2008 के चुनाव में ये सीटें बढ़कर 47 हो गईं। 2008 चुनाव में भाजपा के खाते में 29 सीट ही आईं। इस चुनाव में कांग्रेस को 17 सीट मिली थीं। 2013 चुनाव में फिर भाजपा को 32 और कांग्रेस को 15 सीट मिलीं। देखना होगा कि इस बार क्या नतीजा आता है।

-शिवराज सिंह चौहान को मध्य प्रदेश की राजनीति का किंग माना जाता है। वह 15 साल से यहां राज कर रहे हैं। दरअसल, एमपी की करीब 90 विधानसभा सीटों पर ओबीसी वोट बैंक का खासा प्रभाव है। शिवराज सिंह चौहान इसी वर्ग से आते हैं।
-प्रदेश में लोध वोटरों की अच्छी खासी संख्या हैं। लोध समाज के नेताओं में पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती और पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल का नाम सबसे पहले आता है।
-बीजेपी की नजर इसी ओबीसी वोट बैंक पर है। पीएम नरेंद्र मोदी भी इसी समाज से आते हैं।
-मध्यप्रदेश की जनसंख्या की बात करें तो यहां एससी- 15.6% और एसटी 21.1% हैं। दोनों का कुल 36 प्रतिशत से थोड़ा ज्यादा बैठता है। बताने की जरूरत नहीं कि ये वोट अगर एकमुश्त पड़ जाए तो क्या होगा? यही कारण है कि मायावती का एमपी में अकेले चुनाव लड़ना कांग्रेस के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है।
-पिछले तीन विधानसभा चुनावों में बसपा ने ग्वालियर, मुरैना, शिवपुरी, रीवा और सतना जिलों में दो से लेकर सात सीटों पर जीत दर्ज की है। भिंड, मुरैना, ग्वालियर, दतिया, शिवपुरी, टीकमगढ़, छतरपुर, पन्ना, दमोह, रीवा, सतना की कई सीटों बसपा दूसरे स्थान पर रही है।
-मध्य प्रदेश में पिछले तीन विधानसभा चुनावों में शिवराज सिंह चौहान जीत दर्ज करने में सफल रहे हैं। पिछले तीनों चुनावों के आंकड़ों बताते हैं कि बसपा और कांग्रेस ने अलग-अलग लड़कर एक-दूसरे को बहुत नुकसान पहुंचाया। नतीजों पर गौर करें तो बसपा और कांग्रेस के अलग लड़ने से बीजेपी को 40 से 60 विधानसभा सीटों पर लाभ मिलता रहा है या यूं कहें कि कांग्रेस और बसपा को 40 से 60 सीटों पर हार मिलती रही है। केवल कांग्रेस की बात करें तो उसे करीब 30 से 40 सीटें हर चुनाव में बसपा की वजह से गंवानी पड़ीं। मध्य प्रदेश 2018 विधानसभा चुनाव में भी दोनों पार्टियां साथ नहीं आ सकीं।
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