दुलारी देवी और भूरी बाई: मेहनत मज़दूरी से कला की दुनिया में आने से लेकर पद्म सम्मान पाने की मिसाल

दुलारी देवी और भूरी बाई: मेहनत मज़दूरी से कला की दुनिया में आने से लेकर पद्म सम्मान पाने की मिसाल

मिथिला पेंटिंग के क्षेत्र में योगदान के लिए मधुबनी ज़िले के रांटी गाँव की दुलारी देवी को पद्मश्री पुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई है. मिथिला पेंटिंग के क्षेत्र में अब तक छह महिला कलाकारों को पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है, लेकिन दुलारी देवी का संघर्ष सबसे अलग रहा है.

पारंपरिक रूप से मिथिला कला में कायस्थों और ब्राह्मण कलाकारों का वर्चस्व रहा है, लेकिन पिछले कुछ समय से दलित कलाकारों का दख़ल बढ़ा है. दुलारी देवी हाशिए के समाज से आती हैं. उनकी कला में उनका जीवन अनुभव और संघर्ष स्पष्ट रूप से दिखता है.

पद्मश्री की घोषणा के बाद उन्होंने कहा- बहुत कष्ट स गुजरल छीं. बहुत संघर्ष में सीखने छीं. आई हमरा बहुत खुशी होइय. एते दिन सुनै छलिए. हमर गाम के महासुंदरी देवी, गोदावरी दत्त...बौआ देवी (जितवारपुर) के भेटल रहैन. आई हमरो भेटल ए त आरो खुशी होइए. (बहुत कष्ट से गुज़री हूँ. बहुत संघर्ष में रह कर सीखी. मुझे बहुत ख़ुशी है. पहले सुनती थी कि मेरे गाँव की महासुंदरी देवी, गोदावरी दत्त...बौआ देवी (जितवारपुर) को पुरस्कार मिला. आज मुझे भी मिला तो और भी ख़ुशी हुई.)

संघर्ष

मछुआरा जाति में जन्मीं दुलारी देवी को पढ़ने-लिखने की सुविधा नहीं मिली और बचपन में ही उनकी शादी हो गई. कम उम्र में एक लड़की को जन्म दिया जो ज़िंदा नहीं रही. फिर पति के ताने. 15 साल की होते-होते उन्होंने अपने पति को छोड़ दिया. खेतों में मज़दूरी और संपन्न लोगों के घर झाड़ू-बुहारी करते उनका समय बीतता रहा.

इसी क्रम में जब वो मिथिला चित्र शैली की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त कलाकार कर्पूरी देवी के घर काम करती थीं, तो उनकी उत्सुकता इन चित्रों के प्रति बढ़ी.

कुछ वर्ष पहले उन्होंने बताया था, "मैं जब महासुंदरी देवी, कर्पूरी देवी को चित्र बनाते हुए देखती थी तो मेरी भी इच्छा होती थी मैं भी इन्हें बनाऊँ. मैंने महासुंदरी देवी के साथ छह महीने की ट्रेनिंग ली और फिर चित्र बनाने लगी."

फिर धीरे-धीरे उनकी ख्याति बढ़ती गई. मधुबनी स्थित विद्यापति टॉवर में उन्होंने अपनी कूची से सीता के जन्म से लेकर उनकी जीवन यात्रा का मनमोहक भित्तिचित्र बनाया है. मिथिला पेंटिंग को लेकर वह चेन्नई, कोलकाता, बेंगलुरु भी जा चुकी हैं.

दुलारी देवी को शब्दों की पहचान भले ना हो, पर रंगों की बख़ूबी पहचान है. उनके चित्रांकन की शैली मिथिला पेंटिंग के 'कचनी शैली' से मिलती है.

इस शैली में रेखाओं की स्पष्टता पर ज़ोर रहता है. उनके चित्रों में मिथिला पेंटिंग के पारंपरिक विषयों के अतिरिक्त उनके जीवन की छवियाँ और आत्म संघर्ष अंकित है. कुछ वर्ष पहले आई उनकी आत्मकथा 'फ़ॉलोइंग माइ पेंट ब्रश' में उन्होंने इसे रेखाचित्र के माध्यम से उकेरा है.

जब मैंने उनसे एक पेंटिंग ख़रीदी थी तो कहा कि अपना नाम लिख दीजिए. जब मैंने दिनांक अंकित करने को कहा तब उन्होंने कहा था कि 'बस मुझे नाम लिखना आता है!

भूरी बाई

इसी तरह इस साल भीली शैली चित्रकला के लिए चर्चित कलाकार भूरी बाई को पद्मश्री दिए जाने की घोषणा हुई है.

उनका जीवन भी दुलारी देवी की तरह ही संघर्ष से भरा रहा है. वह भील जनजाति से आने वाली पहली महिला हैं, जिन्होंने काग़ज़ और कैनवास पर अपने अनुभवों और जातीय स्मृतियों को दर्ज किया है.

उनके चित्रों में जीवन के अनुभव जीवंत है. अस्सी के दशक में मशहूर कलाकार जगदीश स्वामीनाथन जब भोपाल स्थित भारत भवन के निदेशक थे, तब उन्होंने भूरी बाई की प्रतिभा को पहचाना था और उन्हें चित्र बनाने को प्रेरित किया.

भूरी बाई वहाँ पर मज़दूरी के लिए आई थी. आज भी वह शिद्दत से उन्हें याद करती हैं. वह कहती हैं, "ऊपर जाने के बाद भी वे मुझे कला बाँट रहे हैं. वे मेरे गुरु भी थे और देव के रूप में भी मैं उनको मानती हूँ."

भूरी बाई के चित्रों के माध्यम से भीलों का जीवन आधुनिक भारतीय चेतना का हिस्सा बना. दुलारी देवी की तरह ही उनके चित्रों में आत्मकथात्मक रंग भरा है. उन्होंने भी अपनी कहानी दीवारों पर अंकित करने के साथ 'डॉटेड लाइंस' किताब में कही है.

इसमें उन्होंने झाबुआ ज़िले में स्थित अपने गाँव, परिवार के बारे में रेखांकन किया है. अपनी कला में वह पारंपरिक 'पिठौरा' पर्व के चित्रण के माध्यम से भीलों की संस्कृति को खूबसूरत रंगों से उकेरती हैं.

वह कहती हैं, "पिठौरा देव के घोड़े को महिलाएँ नहीं बनाती है. इसे पारंपरिक रूप से पुरुष ही मिल कर बनाते हैं. इस अनुष्ठान से जुड़ी जो अन्य पेंटिंग हैं-मोर, पेड़ और भी बहुत कुछ, वह मैं बनाती हूँ." उनके अन्य चित्रों में भीलों का रहन-सहन, पेड़-पौधे, जानवर, ढोल-मांदल और आस-पड़ोस का चित्रण है.

उनकी रेखाओं और चटख रंगों के चयन में एक सहजता सब जगह दिखती है. यहाँ बिंदियों की प्रधानता है, जो भील जनजाति के जीवन-यापन से जुड़ी है. इन बिंदियों को वह खेती के समय मक्का बोने की स्मृतियों से जोड़ती है.

भूरी बाई अपनी कला के संग देश के अनेक हिस्सों सहित अमेरिका भी गईं. उनकी सफलता से प्रभावित होकर आज भील समुदाय की बहुत सारी युवतियाँ इस कला से जुड़ रही हैं.

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