Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

कोरोना के चलते 87 करोड़ हिन्दुस्तानियों की जेब खाली, भुखमरी की ना आ जाए नौबत

कोरोना के चलते 87 करोड़ हिन्दुस्तानियों की जेब खाली, भुखमरी का ना आ जाए नौबत

नई दिल्ली। जिंदगी, मौत के मुहाने पर खड़ी है। एक तरफ कोरोना है तो दूसरी तरफ गरीबी। अगर कोरोना से बच गये तो गरीबी मार देगी। लॉकडाउन तोड़ा तो जिंदगी पर खतरा और लॉकडाउन माना तो रोटी पर खतरा। आमदनी बंद है, जेब खाली है। प्राइवेट जॉब पर तलवार लटकी है। कुछ हटा दिये गये। कुछ को हटाने की तैयारी है। क्या कोरोना भारत को गरीबी और भुखमरी के गहरे कुएं में ढकेल देगा ? भारत जैसे गरीब देश में लोग रोज कमाते हैं तो रोज खाते हैं। लॉकडाउन ने तो रोज कमाने का भी अधिकार छीन लिया है। एक महीना में ही दम निकलने लगा। भारत में पहले से ही 37 करोड़ गरीब थे। कोरोना की वजह से और 40 करोड़ लोग गरीबी का दंश झेल रहे हैं। अभी भारत में 87 करोड़ लोगों के पेट पर आफत है। ईमानदारी से कहें तो कोई भी सरकार 87 करोड़ लोगों का पेट नहीं भर सकती। मुफ्त राशन और हजार रुपये की मदद फुसलाने वाली कोशिश है। पक्का और अनवरत रोजगार चाहिए। ये लॉकडाउन कितने दिनों तक चलेगा, कहना मुश्किल है। अगर लंबा चला तो बिना भोजन-भात के ही जान निकल जाएगी।

नौकरी जाने से हताशा

नौकरी जाने से हताशा

20 अप्रैल 2020। लॉकडाउन की वजह से बिहार के एक युवक की नौकरी चली गयी। हताशा में उसने खुदकुशी कर ली। यह युवक एक टेलीकॉम कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर के पद नियुक्त था। लॉकडाउन में उसकी नौकरी चली गयी। नौकरी थी तो जिंदगी एक ढर्रे पर रही थी। पटना के एक अपार्टमेंट में वह अपने परिवार के साथ रहता था। अब घर कैसे चलेगा, इस हताशा में उसने अपनी जान दे दी। इसी तरह उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद में भी लॉकडाउन ने एक बेरोजगार युवक की जान ले ली। नवाबगंज इलाके के नगला हाई गांव का रहने वाला एक युवक बनारस में रह कर मेहनत-मजदूरी करता था। लॉकडाउन लागू हुआ तो उसका काम बंद हो गया। निराश हो कर वह घर आ गया। बिन पैसों की गुजर मुश्किल थी। गरीबी से हताश हो कर 25 अप्रैल को उसने खुदकुशी कर ली। ये घटनाएं स्थिति की गंभीरता को दर्सातीं हैं। आज के दौर में एक तो रोजगार मुश्किल से मिलता है। अगर वह छिन जाए तो जिंदगी में बिल्कुल अंधेरा छा जाता है। मुफलिसी इंसान को तोड़ देती है और वह गलत फैसला लेने पर मजबूर हो जाता है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में कुल वर्कफोर्स 45 करोड़ है। इसमें 90 फीसदी यानी करीब 40 करोड़ लोग असंगठित क्षेत्र में काम करते हैं। कोरोना ने इन 40 करोड़ लोगों को गरीबी में धकेल दिया है। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 36.9 करोड़ लोग पहले से गरीब हैं। यानी अभी भारत में 87 करोड़ लोगों के सामने रोजी-रोटी की गंभीर समस्या आ खड़ी हुई है।

जेब में पैसा नहीं तो खरीदेगा कौन ?

जेब में पैसा नहीं तो खरीदेगा कौन ?

भारत में खुदरा दुकानदारों की किस्मत मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के लोगों पर टिकी है। इन वर्गों की जेब खाली है। पाई-पाई जोड़ कर कुछ पैसा बचाया भी है तो सिर पर सौ जिम्मेवारियां हैं। सब खा-पी कर हजम तो नहीं कर सकते। वे सोच समझ कर खरीदारी कर रहे हैं। बैंक से पैसा निकाल कर खाने में आत्मा कचोट रही है। 20 अप्रैल के बाद सरकार ने मुहल्ले की दुकानों को खोलने की इजाजत दी है। दुकानें खुलीं भी हैं लेकिन ग्राहकों का टोटा है। केवल दुकान खोल देने से क्या होगा, सामान खरीदने के लिए जेब में पैसा भी होना चाहिए। असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोगों की जेब में पैसा तभी आएगा जो जब वे काम करेंगे। लेकिन उनके पास तो काम है नहीं। निजी कंपनियों को अपना हित सर्वोपरि है। उन पर सरकार की तरह कोई कानूनी बाध्यता तो है नहीं है। कोई नौकरी से निकाल रहा है तो कम सैलरी दे रहा है। सरकार जब पहले से गरीब लोगों का भला नहीं कर पायी तो अब फटेहालों की फौज कैसे संभालेगी ?

भुखमरी से भी बचना जरूरी

भुखमरी से भी बचना जरूरी

17 अप्रैल 2020 को इंडियन एक्सप्रेस अखबार में देश के तीन आर्थिक विशेषज्ञों ने एक लेख लिखा है। नोबेल प्राइज विजेता अमर्त्य सेन, अभिजीत बनर्जी और रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने लिखा है- अगर दैनिक मजदूरों की समस्या का समाधान जल्द नहीं किया गया तो भारत की एक बड़ी आबादी गरीबी और भुखमरी के शिकंजे में फंस जाएगी। अभी सरकार हर जरूरतमंदों को भोजन मुहैया कराने पर जोर दे। इस कोशिश में अगर कुछ गलत लोग भी फायदा उठा लें तो बात नहीं। लेकिन नियम कायदे के जाल में उलझ कर किसी गरीब को फाकाकशी नहीं झेलनी पड़े। कोरोना महामारी के समय हर जरूरतमंद को राशन मिलना चाहिए। उनके पास राशन कार्ड हो या नहीं हो। भारत में गरीबों की कितनी आबादी है ? इसको लेकर आजतक कोई सर्वमान्य आंकड़ा नहीं निकल सका है। गरीबी का आकलन और उनकी संख्या हमेशा विवादों में रही है। इसलिए राशन कार्डधारियों की संख्या भी विवादों में रही है। अक्सर ये आरोप लगता रहा है सरकार जानबूझ कर गरीबों का आंकड़ा कम रखती है ताकि उन्हें कम से कम रियायती राशन देना पड़े। इन तीन महान अर्थिक विशेषज्ञों ने कहा है कि अगर लॉकडाउन जल्द खुल भी जाएगा तब भी अर्थ व्यवस्था को सुचारू होने में समय लगेगा। ऐसा नहीं है कि लॉकडाउन खत्म हुआ और सभी चीजें एकदम से ठीक हो जाएंगी। अब सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेवारी यही है वह लोगों की इतनी देखभाल जरूर करे ताकि वे कोरोना और भुखमरी, दोने से बच कर जिंदा रहें।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+