72 दिनों तक बिना युद्ध किए भारत ने कैसे चीन को हराया, मिले ये 5 सबक
भारत के लिए यह बड़ी उपलब्धि है कि डोकलाम में उसने चीन को सड़क निर्माण से रोक दिया। गतिरोध को 72 दिनों तक खींचा। एक बूंद ख़ून नहीं बहा।
नई दिल्ली। डोकलाम पर लड़ने को आमादा चीन के तेवर बदल गये हैं। यहां दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे पर निशाना साधे खड़ी थी और वह भी महज 100 मीटर की दूरी पर। अब दोनों पक्ष पीछे हटे हैं। युद्ध का ख़तरा टल गया है, कूटनीतिक तौर पर ऐसा कहा जा रहा है। लेकिन, विश्वास से ऐसा कह पाना मुश्किल है। सच ये है कि चीन के साथ सीमा पर एक मोर्चा और खुल चुका है और अब उस ओर से सीमा की हिफाजत के लिए अतिरिक्त सतर्कता की ज़रूरत आन पड़ी है।

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भारत के लिए यह बड़ी उपलब्धि है कि डोकलाम में उसने चीन को सड़क निर्माण से रोक दिया। गतिरोध को 72 दिनों तक खींचा। एक बूंद ख़ून नहीं बहा। युद्ध और तनातनी का माहौल बनने के बाद भी उससे दोनों देश बचे रह सके। ख़ूनी संघर्ष के बिना डोकलाम का जंग जीत लिया गया है, ऐसा माना जा सकता है और जो सुलह चीन के साथ हुई है, जिस तरीके से हुई है उससे कई सबक मिले हैं जिन पर गौर करने की ज़रूरत है।
सबक नंबर एक: न युद्ध करेंगे, न युद्ध से डरेंगे
72 दिनों तक संघर्ष के मोड में रहने के बाद भी अगर संघर्ष नहीं हुआ, तो इसकी वजह यह थी कि भारत हर बुरे परिणाम के लिए भी तैयार था। दरअसल भारत के लिए डोकलाम को चीन के नियंत्रण में जाने देने से बुरा कुछ और नहीं हो सकता था। यह बिना युद्ध किए पराजय को स्वीकार करने जैसा था। यह सच है कि डोकलाम पर भूटान का अधिकार है, जिस पर चीन भी दावा करता है। लेकिन, सच ये भी है कि चीन और भूटान के बीच बातचीत का संबंध भारत के माध्यम से ही संभव है। डोकलाम का महत्व भारत के लिए यह भी है कि यहां से भारत नज़र रख सकता है चीन पर और उसके गलत मंसूबे को नियंत्रित कर सकता है। डोकलाम का महत्व भारत के लिए यह भी है कि अगर यहां चीन का नियंत्रण हुआ, तो अपने पूर्वी हिस्से पर नियंत्रण रखने की परिस्थिति को भारत कमज़ोर कर लेगा। निश्चित रूप से न हम डोकलाम को नज़रअंदाज कर सकते थे, न चीन की आक्रामकता पर चुप रह सकते थे। लिहाज़ा 'न युद्ध करेंगे, न युद्ध से डरेंगे' एक ऐसी आक्रामक नीति थी, जो आम तौर पर खेलों में आक्रामकता के लिए स्टैमिना की ज़रूरत की ओर ध्यान दिलाता है। भारत ने अपना स्टैमिना दिखाया। कूटनीति के कौशल का प्रदर्शन किया।
सबक नंबर 2: सेना को युद्ध के मोड में रखने की ज़रूरत
युद्ध की स्थिति बनते ही चीन ने जिस तरह से ख़ून जुटाया, सैनिक अभ्यास किए, सीमा पर सेना का जमावड़ा किया, मीडिया और देश को युद्ध उन्माद में धकेल दिया; इन घटनाओं को न भूलने की ज़रूरत है न बहुत याद रखने की। बल्कि, ज़रूरत है इससे सबक लेने की। हमने क्या किया? हमें क्या करना चाहिए? आगे हम क्या करने वाले हैं? इन सवालों का तार्किक तरीके से जवाब ढूंढ़ते हुए हमें अपने लिए रास्ते तलाशने होंगे। युद्ध की स्थिति से निपटने के लिए यह जरूरी नहीं है कि सीमा पर सेना की तैनाती रहे। सेना सीमा से दूर रहकर भी युद्ध के मोड में रखी जा सकती है। यह घटना यह सबक देती है कि अब हमें हमारी सेना को सीमा से दूर भी सीमा के लिए युद्ध मोड पर रखना होगा।
सबक नंबर 3: भारत को रूस का साथ भी चाहिए
चीन को नियंत्रण में रखने के लिए अमेरिका काफी नहीं है। अमेरिका के साथ रणनीतिक संबंध कारगर रहेंगे, लेकिन चीन के खिलाफ रूस की भूमिका आज भी महत्वपूर्ण है और आगे भी रहेगी। रूस के संबंध भारत और चीन दोनों देशॆं के साथ हैं और वह बेहतर मध्यस्थता कर सकता है। युद्ध को टालने में उसकी भूमिका की ज़रूरत हमेशा बनी रहेगी। अमेरिका और जापान का समर्थन लेकर भारत ने वाकई चीन पर दबाव बढ़ा दिया था। यह नयी स्थिति थी, जिसके लिए चीन तैयार नहीं था।
सबक नंबर 4: पाकिस्तान पर भी नकेल कसने की ज़रूरत
जिस तरीके से पाकिस्तान ने डोकलाम मुद्दे पर भारत के विरोध में रणनीति अपनायी, उसे देखते हुए पाकिस्तान को सबक सिखाने के बारे में भी सोचा जाना चाहिए। यह कूटनीतिक स्तर पर हो सकता है। इसके लिए धमकी की भाषा नहीं, रणनीति की ज़रूरत होगी। पाकिस्तान को दबाव में लाने के लिए अरब देशों के साथ रिश्ते पर ध्यान देना होगा। वहीं, पाकिस्तान को अमेरिका और जापान से मिलती रही मदद पर भी नज़रें गड़ानी होगी। यह बात भी तय है कि समझाने-बुझाने से पाकिस्तान मानने वाला नहीं है। पाकिस्तान को विश्व विरादरी में अलग-थलग करने की ज़रूरत है। आतंकवाद के समर्थक के रूप में उसके चेहरे को भी बेनकाब किया जाना चाहिए। वहीं, भारत को चाहिए कि मौका देखते हुए वह पाकिस्तान का मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा छीन ले।
सबक नंबर 5: कृत्रिम युद्ध उन्माद से बचना होगा
डोकलाम की घटना के बाद यह सबक लेने की ज़रूरत भी है कि राजनीतिक नेतृत्व विवेक से फैसला करे न कि युद्धोन्माद में आकर। जिस तरीके से भारत की मीडिया युद्ध करा देने पर आमादा हो गयी थी, जो उसने चीन की मीडिया से ही सीखा था, उसे इस बार की ही तरह भविष्य में तवज्जो देने की ज़रूरत नहीं है। दरअसल जब हम युद्धोन्माद में पड़ जाते हैं तो 72 दिनों तक बिना ख़ून बहाए युद्ध के माहौल में डटे नहीं रह सकते। जिस तरह का धैर्य, जैसी रणनीति और जिस तरह की आक्रामकता की ज़रूरत ऐसे वक्त पर पड़ती है वह युद्धोन्माद खत्म कर देता है।
गांधी के देश को डरा न सका माओत्सेतुंग का चीन- ये डोकलाम का ऐसा संदेश है जो चीन के लिए भी सबक बन चुका है। मानव श्रृंखला बनाकर भारत ने चीन को अनधिकृत सड़क निर्माण से रोका था। यह युद्ध जीतने से बड़ी उपलब्धि थी। बाद की घटनाओँ ने इसकी अहमियत को और बढ़ा दिया। आगे भी सीमा पर मजबूत इरादे दिखाते रहने का संकल्प दिखाना होगा- यह तय लगता है।
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