Demonetisation : 6 साल बाद भी 'कैशलेस इंडिया' दूर का सपना ! जनता के पास रिकॉर्ड 30.88 लाख करोड़ रुपये नकदी
Demonetisation को भारतीय अर्थजगत में क्रांति माना गया, लेकिन आज 6 साल बाद कैशलेस इंडिया सपना लगता है। ऐसा इसलिए क्योंकि जनता के हाथों में रिकॉर्ड 30.88 लाख करोड़ कैश है। Demonetisation 2016 Cash in people hand At Record
Demonetisation यानी नोटबंदी के 6 साल बाद भारत की जनता के पास 30.88 लाख करोड़ रुपये नकद हैं। ये एक नया रिकॉर्ड स्तर है। जनता के पास नकदी कम हो, कैशलेस ट्रांजेक्शन को बढ़ावा मिले, बैंक की नजरों से बचकर या चोरी-छिपे कैश का लेन-देन न हो, ऐसे विजन के साथ नोटबंदी के फैसले को जोड़ा गया, लेकिन 21 अक्टूबर की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि पिछले 6 साल में भारत की जनता के पास कैश की मात्रा बढ़ी है। कहा गया है कि 30.88 लाख करोड़ की नकदी रखने वाली जनता एक नया रिकॉर्ड कायम कर चुकी है।

भारतीय अर्थव्यवस्था में नकदी
डिजिटल भुगतान पर 2019 में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के एक अध्ययन में नोटबंदी पर आंशिक रूप से बात की गई थी। अब नोटबंदी के 6 साल बाद जनता के पास नकद 30.88 लाख करोड़ रुपये के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है जो Demonetisation के फैसले पर सवाल खड़ा करता है। 30.88 लाख करोड़ कैश दर्शाता है कि विमुद्रीकरण के छह साल बाद भी भारतीय अर्थव्यवस्था में नकदी का उपयोग अभी भी मजबूती से हो रहा है।

71.84 प्रतिशत अधिक कैश
इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में पीटीआई के हवाले से कहा गया कि 21 अक्टूबर तक की जानकारी के मुताबिक जनता के पास कैश 30.88 लाख करोड़ रुपये है। ये अमाउंट रिकार्ड ऊंचाई पर पहुंच गया है। 4 नवंबर, 2016 को समाप्त पखवाड़े के स्तर से 71.84 प्रतिशत अधिक कैश भारतीय अर्थव्यवस्था में होने के कारण नोटबंदी का फैसला कठघरे में है।

नोटबंदी के समय कितना कैश था
आरबीआई ने शुक्रवार को मुद्रा आपूर्ति पर पाक्षिक आंकड़े जारी किए। इसके अनुसार, जनता के पास 4 नवंबर 2016 को 17.7 लाख करोड़ रुपये कैश थे। अब 21 अक्टूबर को ये अमाउंट बढ़कर ₹ 30.88 लाख करोड़ हो चुका है। जनता के पास कैश का मतलब वैसे नोट और सिक्के हैं जिनका उपयोग लोग लेन-देन करने, व्यापार निपटाने और सामान खरीदने और सेवाओं के बदले भुगतान करने में करते हैं। बैंकों के पास मौजूद नकदी से घटाने के बाद प्रचलन में 30.88 लाख करोड़ की मुद्रा का आंकड़ा निकाला गया है।

डिजिटल पेमेंट के साथ कैश भी बढ़ा
भले ही भुगतान के नए और सुविधाजनक डिजिटल विकल्प भी लोकप्रिय हो रहे हैं, लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था में नकदी का उपयोग भी लगातार बढ़ रहा है। COVID-19 महामारी के दौरान कॉन्टैक्ट लेस लेनदेन पर जोर दिया गया। डिजिटल मोड में भुगतान को बढ़ावा मिला, लेकिन कैश की मात्रा भी बढ़ती गई।

डिजिटल भुगतान पर RBI
डिजिटल भुगतान के मामले में 2019 में आरबीआई के एक अध्ययन में कहा गया था कि हाल के वर्षों में डिजिटल भुगतान धीरे-धीरे बढ़ रहा है। मूल्य और मात्रा दोनों बढ़ रहे हैं। आरबीआई के मुताबिक डेटा यह भी बताता है कि सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में प्रचलन में मुद्रा भी समग्र आर्थिक विकास के अनुरूप बढ़ी है। RBI ने कहा, जीडीपी के अनुपात में डिजिटल भुगतान में वृद्धि से कैश के इस्तेमाल में गिरावट का स्वत: संकेत नहीं मिलता है। रिजर्व बैंक के मुताबिक विमुद्रीकरण के बाद, भारत में डिजिटल लेनदेन में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है, हालांकि देश में जीडीपी अनुपात में डिजिटल भुगतान पारंपरिक रूप से कम रहा है।

दो दशकों में पहली बार 7,600 करोड़ की गिरावट !
हाल ही में एक नोट में स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (एसबीआई) के अर्थशास्त्रियों ने कहा था कि दिवाली वाले सप्ताह में प्रचलन में मुद्रा (Cash in Circulation) में ₹ 7,600 करोड़ की गिरावट आई। लगभग दो दशकों में ऐसी पहली गिरावट देखी गई। 2009 की तुलना में SBI के इकोनॉमिस्ट ने बताया कि उत्सवों के समय उस समय मामूली गिरावट देखी गई थी। करीब 13 साल पहले ऐसी गिरावट वैश्विक वित्तीय संकट के कारण देखी गई थी।

कब और क्यों हुई नोटबंदी
बता दें कि 8 नवंबर 2016 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ₹ 500 और ₹ 1,000 मूल्यवर्ग के बैंक नोट वापस लेने के निर्णय की घोषणा की थी। अर्थव्यवस्था में भ्रष्टाचार और काले धन को कम करने के उद्देश्य के साथ नोट अचानक बंद किए जाने से हड़कंप मच गया था। इस कदम की खराब योजना और क्रियान्वयन के लिए कई विशेषज्ञों ने आलोचना भी की थी। सरकार और खुद पीएम मोदी का कहना था कि भारत को "कम नकदी" वाली अर्थव्यवस्था बनाना है।












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