चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े नए बिल में क्या है खास? क्यों विरोध कर रहा विपक्ष? जानिए वजह
चुनाव आयोग के कार्यों में पारदर्शिता लाने के लिए इस साल मार्च के महीने में सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले के बाद केंद्र ने एक नए बिल को संसद में पेश किया। जिसके तहत मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति और सेवा शर्तों को विनियमित करने का प्रावधान रखा गया। ये बिल संसद के मॉनसून सत्र के दौरान 10 अगस्त को मोदी सरकार ने राज्यसभा में पेश किया था। इस बिल का नाम मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) विधेयक, 2023 रखा गया। लेकिन विपक्ष ने इस विधेयक पर को लेकर राज्यसभा में जमकर हंगामा किया।
18 सितंबर से शुरू हो रहे पांच दिवसीय संसद के विशेष सत्र के दौरान कई अहम बिल पर चर्चा होगी। राज्यसभा के बुलेटिन में कहा गया है कि संसद के विशेष सत्र में तीन बिल पर चर्चा होगा। जबकि लोकसभा में दो बिल पर चर्चा होनी है। जिन बिलों पर राज्यसभा के सदन में चर्चा की जानी है, उनमें चुनाव आयुक्त की नियुक्ति वाला विधेयक भी शामिल है। हालांकि इसे केंद्र सरकार पहले ही राज्यसभा में पेश कर चुकी है।

नए विधेयक में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों के वेतन और भत्तों को घटाकर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश से कैबिनेट सचिव के बराबर करने का प्रस्ताव है। जबकि मौद्रिक मूल्य के अनुसार दोनों का वेतन समान है। हालांकि ये दोनों पद सिस्टम में अपना अलग-अलग कद रखते हैं। विधेयक के मुताबिक अगर मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त कैबिनेट सचिव के समकक्ष हैं, तो उन्हें राज्य मंत्री से नीचे दर्जा दिया जाएगा।
नए विधेयक पर विवाद क्यों?
चुनाव आयोग जैसी स्वतंत्र सरकारी संस्था पर दबाव पारदर्शिता को कम कर देता है। नए विधेयक को लेकर ऐसी ही आशंकाएं व्यक्त की जा रही हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक नया विधेयक ना केवल शीर्ष चुनाव पैनल अधिकारियों का प्रभाव करेगा, बल्कि भारत के चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर भी असर डालेगा। इसके पीछे एक और वजह बताई गई। ईसीआई एक विशेष संवैधानिक संस्था है, क्योंकि सीईसी और चुनाव आयुक्त राजनेताओं के खिलाफ कार्रवाई कर सकते हैं। लेकिन जब आप सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समकक्ष होते हैं, तो उनके पास अलग अधिकार होते हैं। वहीं जब उन्हें नौकरशाहों के पद दिया जाएगा तो स्थित अलग होगी।












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