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70 घंटे काम: नारायण मूर्ति के बयान को कांग्रेस सांसद ने बताया-'मीनिंगलेस'

देश में कार्य संस्कृति को लेकर एक बड़ी बहस छिड़ गई है। इंफोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति द्वारा प्रस्तावित 70 घंटे के कार्य सप्ताह की अवधारणा पर कांग्रेस नेता कार्ति चिदंबरम ने कड़ा विरोध जताया है। चिदंबरम ने इस प्रस्ताव को खारिज करते हुए कहा कि भारत को लंबे कार्य घंटों की बजाय दक्षता और कार्य-जीवन संतुलन पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

चिदंबरम का तर्क, कार्य-जीवन संतुलन है जरूरी

कार्ति चिदंबरम ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि लंबे समय तक काम करना निरर्थक है। दक्षता पर ध्यान दिया जाना चाहिए। दैनिक जीवन में लोग अकुशल बुनियादी ढांचे और घटिया सुविधाओं से जूझ रहे हैं। अच्छे सामाजिक संतुलन के लिए कार्य-जीवन संतुलन बेहद महत्वपूर्ण है।

karti P chidambaram

उन्होंने भारत में छोटे कार्य सप्ताह का सुझाव देते हुए कहा कि सोमवार दोपहर से शुक्रवार दोपहर तक का कार्यकाल लोगों की भलाई और सामाजिक व्यवस्था के लिए बेहतर होगा। चिदंबरम ने यह भी कहा कि किसी देश की तरक्की केवल लंबे कार्य घंटों से संभव नहीं है। बल्कि दक्षता और संतुलित जीवनशैली पर जोर देना भी उतना ही आवश्यक है।

गौरव गोगोई का समर्थन

कांग्रेस के अन्य नेता गौरव गोगोई ने भी चिदंबरम की चिंताओं को दोहराते हुए कहा कि जीवन का मूल्य केवल कार्य में नहीं है। गोगोई ने परिवार, रिश्तों और सामुदायिक समर्थन के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने कामकाजी महिलाओं द्वारा झेली जाने वाली चुनौतियों का जिक्र करते हुए कहा कि पेशेवर और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना उनके लिए विशेष रूप से कठिन हो जाता है।

नारायण मूर्ति का पक्ष, कड़ी मेहनत ही प्रगति का रास्ता

वहीं दूसरी ओर नारायण मूर्ति ने अपने 70 घंटे कार्य सप्ताह के प्रस्ताव को सही ठहराते हुए कहा कि भारत को वैश्विक मंच पर ऊंचाई पर ले जाने के लिए त्याग और कड़ी मेहनत की जरूरत है। उन्होंने कहा कि हमें अपनी आकांक्षाएं ऊंची रखनी होंगी। यदि हम कड़ी मेहनत नहीं करेंगे तो कौन करेगा। 800 मिलियन भारतीय गरीबी में हैं और मुफ्त राशन पर निर्भर हैं। इस स्थिति को बदलने के लिए हमें काम करना ही होगा।

मूर्ति ने चीनी कामगारों के साथ तुलना करते हुए भारतीय श्रमिकों की उत्पादकता में सुधार की जरूरत पर जोर दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 100 घंटे कार्य सप्ताह के समर्पण को एक मॉडल बताया। जिसे देश के विकास के लिए अपनाया जा सकता है।

राष्ट्रीय बहस के केंद्र में कार्य संस्कृति

चिदंबरम और मूर्ति के विपरीत दृष्टिकोण ने कार्य संस्कृति और राष्ट्रीय प्रगति के बीच संतुलन की एक बड़ी बहस को जन्म दिया है। जहां मूर्ति का तर्क है कि लंबी मेहनत देश को आर्थिक रूप से मजबूत बनाएगी। वहीं चिदंबरम और गोगोई जैसे नेता इस बात पर जोर दे रहे हैं कि व्यक्तिगत कल्याण और दक्षता ही स्थायी विकास की कुंजी हैं।

कार्य संस्कृति को लेकर चल रही यह बहस केवल कार्य घंटों तक सीमित नहीं है। बल्कि यह भारत के विकास के लिए नजरिए की गहराई तक जाती है। मूर्ति जहां कड़ी मेहनत और त्याग का मॉडल पेश करते हैं। वहीं चिदंबरम और गोगोई कार्य-जीवन संतुलन और दक्षता पर ध्यान केंद्रित करने का सुझाव देते हैं।

इस चर्चा के बीच सवाल उठता है कि क्या देश लंबी मेहनत के पारंपरिक मॉडल को अपनाएगा या दक्षता और जीवन के अन्य पहलुओं पर जोर देकर एक नई कार्य संस्कृति की ओर बढ़ेगा। जैसा कि भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी जगह मजबूत कर रहा है। यह बहस आने वाले वर्षों में और भी प्रासंगिक होती जाएगी।

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