बंगाल में तृणमूल के लिए बढ़ी कांग्रेस की 'ममता', लेफ्ट का क्या होगा?

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के सबसे बड़े चेहरे अधीर रंजन चौधरी इस बार के लोकसभा चुनाव में सियासी तौर पर निपट चुके हैं या यूं कहें कि निपटाए जा चुके हैं। क्योंकि, जो नेता लोकसभा में पांच साल तक पार्टी की अगुवाई कर चुका हो, उसके चुनाव प्रचार में पार्टी का कोई बड़ा नेता झांकने तक नहीं पहुंचा।

लोकसभा में इस बार जिस तरह का जनादेश आया है, उसके बाद लग रहा है कि कांग्रेस आलाकमान बंगाल में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और उसकी सुप्रीमो ममता बनर्जी से भी नजदीकियां बढ़ाने में जुट गया है।

congress with mamata

बंगाल में कांग्रेस छोड़ेगी लेफ्ट का साथ?
ऐसे में प्रश्न उठता है कि पिछले कुछ वर्षों से प्रदेश में जिस तरह से कांग्रेस सीपीएम की अगुवाई वाले लेफ्ट फ्रंट के साथ राजनीति कर रही थी, उसका भविष्य अब क्या है? मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक गुरुवार को कांग्रेस के दिग्गज और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम कोलकाता आए और राज्य सचिवालय में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के साथ गुफ्तगू कर गए।

बंगाल में कांग्रेस-टीएमसी में सुलह के सिंग्नल
तृणमूल सूत्रों के अनुसार इस दौरान दोनों नेताओं के बीच सोमवार या 24 जून से शुरू हो रहे 18वीं लोकसभा के पहले सत्र में भाजपा की अगुवाई वाले एनडीए सरकार के खिलाफ साझा रणनीत अपनाने को लेकर चर्चा हुई। इससे पहले यह खबर भी आ चुकी है कि अगर सोनिया गांधी की बेटी प्रियंका गांधी वाड्रा केरल में अपने भाई की खाली की गई वायनाड सीट से चुनाव लड़ने पहुंचेंगी तो ममता बनर्जी उनका चुनाव प्रचार करने भी जा सकती हैं।

वैसे विपक्षी दलों के इंडिया ब्लॉक में कांग्रेस, टीएमसी और सीपीएम सभी शामिल हैं। लेकिन, बंगाल में अबतक कांग्रेस-सीपीएम का टीएमसी के साथ छत्तीस का आंकड़ा दिखता रहा है। इसके ठीक उलट केरल में कांग्रेस और सीपीएम परस्पर दो विरोधी गठबंधनों की अगुवाई करते आए हैं। लेकिन, दिल्ली पहुंचते ही सभी एक ही कुनबे में शामिल हो जाते हैं।

बंगाल में सिर्फ 1 सीट जीत सकी कांग्रेस
इस बीच शुक्रवार को लोकसभा चुनावों में हुई करारी हार को लेकर पश्चिम बंगाल कांग्रेस कमेटी की बंद कमरे वाली एक बैठक हुई। यह चुनाव कांग्रेस ने लेफ्ट के साथ गठबंधन करके, बीजेपी और टीएमसी दोनों के खिलाफ लड़ा था। लेकिन, इसके बावजूद कांग्रेस 2 सीटों से सिमट कर सिर्फ 1 सीट पर रह गई।

लेफ्ट को 'लेफ्ट' करने की तैयारी में कांग्रेस?
जानकारी के मुताबिक बैठक में मौजूद अधिकतर नेताओं ने तृणमूल और बीजेपी दोनों के खिलाफ चलने सुझाव दिया। साथ ही यह भी कहा कि लेफ्ट के साथ गठबंधन से भी भले ही अभी वोट शेयर बढ़ा हो, लेकिन लंबे समय के लिए यह पार्टी हित में नहीं है।

एक वरिष्ठ कांग्रेस नेता ने कहा, 'हम नहीं कह रहे हैं कि सीपीएम के खिलाफ भी लड़ने की जरूरत है, लेकिन कम से कम हमें सीपीएम या लेफ्ट फ्रंट के साथ गठबंधन नहीं करना चाहिए। यह लंबे समय में कांग्रेस के लिए फायदेमंद नहीं है।' लेकिन, बरहामपुर में टीएमसी के यूसुफ पठान से हारने वाले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी समेत अधिकतर नेताओं ने इस दौरान चुप्पी में ही भलाई समझी।

पार्टी को बचाने के लिए ममता के साथ जुड़े कांग्रेस- टीएमसी
कांग्रेस जिसका खुलकर इजहार नहीं कर पा रही है, उसका इशारा टीएमसी की ओर से किया जा रहा है। पार्टी नेता और ममता के भरोसेमंद मंत्री फिरहाद हकीम ने कहा, 'हम भी एक समय कांग्रेस में थे और सीपीएम के खिलाफ मिलकर लड़े। ममता बनर्जी ने कांग्रेस छोड़ी और उनसे अकेले लड़ने के लिए टीएमसी बनाई। कांग्रेस की प्रदेश में विश्वसनीयता खत्म हो चुकी है....सीपीएम के साथ गठबंधन करने की वजह से बंगाल ने कांग्रेस में भरोसा खो दिया है। इस विश्वास को बहाल करने के लिए उन्हें बिना शर्त ममता बनर्जी के साथ जुड़ना चाहिए। कांग्रेस को प्रदेश में जीवित करने का सिर्फ यही एक तरीका है।'

अधीर रंजन चौधरी कांग्रेस में ममता बनर्जी के सबसे मुखर विरोधी रहे हैं। लेकिन, लगता है कि अब वह पार्टी में पहले की तरह अपनी बात रखने के 'काबिल' नहीं रह गए हैं। लिहाजा, कांग्रेस और टीएमसी में पक रही सियासी खिचड़ी में फिलहाल कोई समस्या नहीं दिख रही है।

कांग्रेस के बदले हाव भाव के बारे में सीपीएम नेता सुजान चक्रबर्ती ने कहा, 'कांग्रेस क्या करती है, यह उसके प्रदेश और केंद्रीय नेताओं के द्वारा तय किया जाएगा। हमें कुछ नहीं कहना है।'

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