दिल्ली में 'आप' और कांग्रेस का झगड़बंधन ऐसे बीजेपी को पहुंचाएगा फायदा

नई दिल्ली- सिर्फ चार साल में ही दिल्ली की चुनावी सियासत पूरी तरह यू टर्न लेती हुई नजर आ रही है। 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में जब अरविंद केजरीवाल की अगुवाई में आम आदमी पार्टी (APP) ने 70 में से 67 सीटें जीत ली थीं, तो किसी ने नहीं सोचा था कि 2019 के लोकसभा चुनाव में उनके सामने कांग्रेस के साथ गठबंधन करने के लिए एक तरह से मिन्नतें करने की नौबत आ जाएगी। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि इस चुनाव में दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों पर 'आप' (APP) को बहुत बड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। राजधानी में बीजेपी का मनोबल बढ़ने का यह भी कारण है कि उसे लगता है कि मोदी का नाम और आम आदमी पार्टी (APP) एवं कांग्रेस में मचे घमासान से उसे फायदा मिलेगा और वह दिल्ली की सातों सीटें 2014 की तरह दोबारा जीत सकती है।

चार साल में यूं बदल गई 'आप' की स्थिति

चार साल में यूं बदल गई 'आप' की स्थिति

पिछले दो महीनों तक दिल्ली में 'आप' (APP) और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर तरह-तरह की कयासबाजियां चलीं। खुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) इसको लेकर ज्यादा बेबस नजर आए। कांग्रेस ने कई बार 'आप' (APP) के प्रस्तावों को खारिज कर दिया। लेकिन, हर बार 'आप' (APP) कांग्रेस को रिझाने के लिए नए प्रस्तावों के साथ सामने आती रही। लेकिन, आखिरकार उनकी सारी उम्मीदों पर पानी फिर गया। केजरीवाल ने कांग्रेस पर अड़ियल रवैया अपनाने का आरोप लगाया, तो राहुल गांधी ने आम आदमी पार्टी (APP) सुप्रीमो पर यू-टर्न लेने का दोष मढ़ दिया। बाद में केजरीवाल एंड कंपनी ने सफाई दी कि वह दिल्ली की 7, पंजाब-13, हरियाणा-10, चंडीगढ़-1 और गोवा की 2 सीटों पर समझौता करके कुल 33 सीटों पर बीजेपी को घेरना चाहती थी। 'आप' (APP) ने बताया कि जब कांग्रेस नहीं मानी, तो उसने दिल्ली, हरियाणा और चंडीगढ़ की कुल 18 सीटों पर ही गठबंधन की पेशकश की। लेकिन, कांग्रेस दिल्ली से बाहर निकलने के लिए तैयार ही नहीं हुई। राजनीतिक जानकार चंद्रभान प्रसाद ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा है कि, "कांग्रेस- 'आप' का गठबंधन राजधानी में बीजेपी को कड़ी चुनौती देने की स्थिति में होता। यह नहीं होने से वोटिंग पर काफी प्रभाव पड़ेगा और बीजेपी का चांस बढ़ जाएगा।"

पिछले तीन चुनावों का वोट शेयर

पिछले तीन चुनावों का वोट शेयर

अगर 2014 के वोट शेयर को देखें तो उसमें बीजेपी बहुत आगे थी। तब उसे मोदी लहर की बदौलत 46.6% वोट मिले थे, जबकि 'आप' (APP) को 33.1% और कांग्रेस को 15.2% वोट मिले थे। इससे एक साल पहले ही 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने 33%, 'आप' (APP) ने 29.5% और कांग्रेस ने 24.6% वोट हासिल किए थे। जबकि, 2015 के विधानसभा में केजरीवाल की पार्टी ने 54% वोट हासिल करके कांग्रेस का सफाया कर दिया था और पूरे देश में बीजेपी की बढ़त पर ब्रेक लगा दी थी। तब भी बीजेपी को 32% और कांग्रेस को सिर्फ 10% वोट मिले थे। यानी कांग्रेस को जो भी नुकसान हुआ, उसका फायदा आम आदमी पार्टी को मिला। यानी 2013 और 2015 में बीजेपी का वोट शेयर लगभग समान रहा था और 2014 के लोकसभा चुनाव में उसने सबको हराकर राजधानी की सारे सीटें जीत ली थीं। केजरीवाल का कांग्रेस से तालमेल के लिए उतावले होने के पीछे दिल्ली की वोटों का यही गणित था।

'आप और कांग्रेस का कोर वोटर एक

'आप और कांग्रेस का कोर वोटर एक

दिल्ली के वोटरों में पार्टी के प्रभाव को देखें तो 'आप' (APP) और कांग्रेस के कोर वोटर एक हैं। इन दोनों दलों का मुख्य रूप से मुस्लिम और अनिधिकृत कॉलोनियों (unauthorised colonies) और झुग्गियों (slums) वाले वोटरों पर दबदबा है। इसके अलावा दोनों की कुछ मीडिल क्लास वोटरों (middle class) में भी पैठ है। इन्हीं मतदाओं का समीकरण फिट बैठने के चलते 2015 में केजरीवाल की पार्टी ने दिल्ली में ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। ऐसे में अगर दोनों पार्टियां पूरी ताकत से चुनाव मैदान में हैं, तो उनका टारगेट वोटर भी वही हैं। केजरीवाल की दिक्कत ये भी है कि यह न तो यह 2015 है और न ही कांग्रेस के प्रत्याशी कमजोर हैं। जिस एंटी इंकंबेंसी ने शीला सरकार को धूल चटाई थी, उसका सामना इस बार कांग्रेस को नहीं, आम आदमी पार्टी को ही करना है।

मोदी-केजरीवाल फैक्टर

मोदी-केजरीवाल फैक्टर

बीजेपी ने दिल्ली में जिन नए उम्मीदवारों को मौका दिया है उनमें पूर्व क्रिकेटर गौतम गंभीर और सूफी गायक हंसराज हंस भी शामिल हैं। इसी तरह आम आदमी पार्टी ने एजुकेशनिस्ट आतिशी मार्लेना और चार्टर्ड एकाउंटेंट राघव चड्ढा जैसे चेहरों को मौका दिया है। जाहिर है इन सारे चेहरों के पीछे नरेंद्र मोदी और अरविंद केजरीवाल की छवि भी जुड़ी हुई है। जबकि, कांग्रेस ने उन चेहरों को मौका दिया है, जो राजनीतिक तौर पर दिल्ली के लिए खुद ही भारी-भरकम हैं और उनका दिल्ली की सत्ता से पुराना इतिहास भी जुड़ा हुआ है। जैसे-शीला दीक्षित, अजय माकन या अरविंदर सिंह लवली। ऐसे में बीजेपी का वोटर तो मोदी के साथ रहेगा ये तो तय है, लेकिन मोदी-विरोधी वोटर के सामने दो विकल्प मौजूद हैं।

वोटरों के हिसाब से अलग-अलग मुद्दे

वोटरों के हिसाब से अलग-अलग मुद्दे

दिल्ली में वोटरों और रिहायशी इलाकों के हिसाब से भी मुद्दे बंटे हुए हैं। मसलन, छोटे कारोबारियों के लिए सीलिंग और जीएसटी जैसे मुद्ददे हैं, तो अपस्केल कॉलोनियों में प्रदूषण, पार्क, सवच्छता और वॉटर सप्लाई बड़े मसले हैं। जबकि, अनिधिकृत कॉलोनियों (unauthorised colonies) और झुग्गी-झोपड़ियों (slums) के लिए जन-सुविधाएं, रोड और खाद्य सुरक्षा ज्यादा मायने रखते हैं। लाल बाग के स्लम इलाके में अभी हाल ही में केजरीवाल ने एक रोडशो किया था। वहां के एक वोटर ने कहा, "हमारी झुग्गी में पाईप से पीने का पानी नहीं पहुंचता। पिछले दो महीनों से हमें राशन नहीं मिले हैं।" कुछ लोगों का मानना है कि कांग्रेस की न्याय (Nyay) योजना के भी इन इलाकों के वोटरों में प्रभाव पड़ सकता है।

मोदी इफेक्ट

मोदी इफेक्ट

दिल्ली में ऐसे वोटर भी हैं, जो मानते हैं कि यह देश का चुनाव हो रहा है, इसलिए यहां 'आप' के मुकाबले बीजेपी या कांग्रेस ज्यादा मायने रखती है। दिल्ली में ऐसे वोटरों की भी कमी नहीं है जो अपने सांसदों के काम से संतुष्ट नहीं है। लेकिन, ऐसे लोग भी बहुतायत में मिलते हैं जिनका मानना है कि सिर्फ पांच साल में भारत जैसे बड़े देश को नहीं बदला जा सकता। द्वारका के रिटायर्ड सरकारी अफसर अजीत दुबे कहते हैं, "हमें नरेंद्र मोदी को एक और चांस देना चाहिए।" बिजनेस मैनेजर मधुर मेहरोत्रा कहते हैं कि वे दो कारणों से बीजेपी को वोट देंगे- पहला, ताकि मोदी वो काम जारी रख सकें जो उन्होंने शुरू किया है और दूसरा इसलिए, क्योंकि कोई भरोसेमंद विपक्ष है नहीं। अलबत्ता मोदी फैक्टर 2014 जितना ताकतवर तो लग नहीं रहा, लेकिन पुलवामा और बालाकोट उनके दिमाग में अभी भी तरो-ताजा हैं। हैरानी की बात ये है कि झुग्गी-झोपड़ी वाले इलाकों में भी जहां बेसिक सुविधाएं भी मौजूद नहीं हैं, वहां भी राष्ट्रवाद की भावना से गदगद वोटरों की कमी नहीं है।

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