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यहां की किताबों में मनमोहन सिंह हैं मौजूदा पीएम व प्रतिभा पाटिल हैं राष्ट्रपति

किसी स्कूली बच्चे से देश के पीएम और राष्ट्रपति का नाम पूछोगे तो पलक झपकते बता देगा लेकिन कानून के कॉलेज में एडमिशन दिलाने वाली इस किताब में भयंकर गलतियां है।

किसी स्कूली बच्चे से देश के पीएम और राष्ट्रपति का नाम पूछोगे तो पलक झपकते बता देगा लेकिन 'सामान्य कानून प्रवेश परीक्षा (सीएलएटी)' की तैयार कराने के लिए मेरठ-मुख्यालय अरीहंत प्रकाशन द्वारा प्रकाशित एक किताब में प्रतिभा देवी सिंह पाटिल अभी भी देश की राष्ट्रपति हैं। वहीं पूर्व पीएम मनमोहन सिंह देश के मौजूदा प्रधानमंत्री है। यही नहीं भारत के मुख्य न्यायधीश का नाम भी नहीं बदला गया है।

यहां की किताबों में मनमोहन सिंह हैं मौजूदा पीएम व प्रतिभा पाटिल हैं राष्ट्रपति

किताब में अभी भी भारत के मुख्य न्यायधीश के रूप में एसएच कपाड़िया का नाम लिखा है। गौरतलब है कि कपाड़िया 29 सितंबर, 2012 को सेवानिवृत्त हुए थे और पिछले साल 5 जनवरी को उनका देहांत भी हो चुका है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के मुताबिक ये बड़ी गलतियां सामान्य कानून प्रवेश परीक्षा (सीएलएटी)-2017 के लिए प्रवेश परीक्षा पुस्तक का हिस्सा हैं जोकि अरिहंत पब्लीकेशन द्वारा प्रकाशित की जा रही हैं। किताबों की कीमत 495 रुपये है। अरिहंत प्रकाशन देश के बड़े प्रकाशनों में से एक है।

'हाथ से सही करनी पड़ी गलतियां'
खबर के मुताबिक इसका दिल्ली में पंजीकृत कार्यालय और कई प्रमुख शहरों और राज्य की राजधानियों में बिक्री कार्यालय है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक अंजान चटर्जी नाम के एक व्यक्ति ने अपनी बेटी के लिए वीनस बुक डिपोट से अरिहंत प्रकाशन की यही किताब खरीदी। लेकिन जब उनकी बेटी ने उसके केंटेंट को देखा तो दंग रह गए। चटर्जी का कहना है कि "मैंने अरिहंत की रेपुटेशन के हिसााब से अपनी बेटी के लिए किताब खरीदी लेकिन उसमें बड़ी गलतियां निकली। मैंने हाथ से ठीक करके अपनी बेटी को किताब पढ़ने के लिए दिया।"

'बच्चों के भविष्य के साथ हो रहा खिलवाड़'
चटर्जी का कहना है कि पब्लिशर्स को अपनी इन किताबों को तुरंत बाजार से वापस ले लेना चाहिए। यह बच्चों के भविष्य के साथ सीधे-सीधे खिलवाड़ है। राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री व मुख्य न्यायधीश के नाम के अलावा इस किताब में 2002-03 के पुराने इन्कम टैक्स स्लैव के बारे में लिखा है। यहां तक कि योजना आयोग के बारे में भी लिखा है जबकि योजना आयोग की जगह नीति आयोग बन चुका है। 'गैर-संवैधानिक निकाय' वाले चैप्टर में राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) का कोई जिक्र ही नहीं है।

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