Coal crisis: दिवाली से पहले देश पर क्यों छाया है बिजली संकट? पूरा मामला समझिए
नई दिल्ली,12 अक्टूबर: देश की कई बिजली कंपनियों के सामने कोयले के स्टॉक का संकट खड़ा हो गया है। इसकी वजह से देश के कई राज्यों में बिजली संकट की स्थिति पैदा होने की बात कही जा रही है। हालांकि, इस मसले पर कुछ राज्य सरकारों और केंद्र सरकार के दावे में काफी अंतर है। सवाल है कि अगले महीने की शुरुआत में है दिवाली का त्योहार आ रहा है। ऐसे में एक चिंता यह है कि कहीं इस साल दिवाली अंधेरे में ही तो नहीं गुजरेगी। आइए जानते हैं कि दरअसल, यह संकट वाकई में कितना बड़ा है ? यह स्थिति पैदा क्यों हुई है ? क्या वाकई हालात बेकाबू होते जा रहे हैं ? या फिर जितनी चिंता जताई जा रही है, दरअसल स्थिति उतनी भी गंभीर नहीं है ?

दिवाली से पहले अंधेरे की क्यों की जा रही है आशंका ?
सारा मसला कोयले के स्टॉक से जुड़ा है। केंद्र सरकार भी मान रही है कि आमतौर पर बिजली कंपनियों के पास पहले 17 दिन का कोयला स्टॉक में रहता था, जो फिलहाल 4 दिन के करीब आ गया है। दूसरी तरफ पिछले करीब डेढ़ साल तक लॉकडाउन और कोरोना पाबंदियों की वजह से लगभग ठप पड़ी देश की अर्थव्यवस्था तेजी से रफ्तार पकड़ने लगी है। यह भारत में ही नहीं, चीन, यूरोप और अमेरिका में भी हो रहा है। ऊपर से हर साल अक्टूबर के बाद से बिजली की मांग बढ़ने ही लगती है। इस साल इसमें अगस्त-सितंबर से ही तेजी आ गई है और बिजली की खपत 124.2 अरब यूनिट प्रति महीने तक पहुंच गई है। जबकि, दो साल पहले यानी कोरोना से पहले वाले साल में भी इन महीनों में बिजली की खपत 106.6 अरब यूनिट की ही दर्ज की गई थी। लिहाजा दो साल पहले बिजली पैदा करने के लिए जितना कोयला चाहिए था, आज की तारीख में उसकी मांग में करीब 18% का इजाफा हो चुका है। (पहली तस्वीर सौजन्य: एनटीपीसी)
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बिजली उत्पादन में कमी को लेकर राज्यों के दावे
कोयले के स्टॉक में कमी को लेकर सबसे ज्यादा तूफान दिल्ली सरकार मचा रही है। आज दिल्ली के ऊर्जा मंत्री सत्येंद्र जैन ने फिर दावा किया है कि दिल्ली के पास सिर्फ दो-तीन दिनों का ही कोयला बच गया है। रविवार को दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया था कि वह कथित तौर पर ऑक्सीजन की तरह ही कोयले को लेकर भी गलत दावा कर रही है। इसी तरह महाराष्ट्र में 7 थर्मल पॉवर प्लांट की 13 यूनिट बंद होने की बात कही जा रही है। हालांकि, महाराष्ट्र राज्य विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड के प्रबंध निदेशक विजय सिंघल कम से कम 15 दिन तक किसी भी तरह की लोड शेडिंग की आशंका खारिज कर चुके हैं। मध्य प्रदेश ने भी अपने यहां फिलहाल किसी तरह की बिजली संकट की आशंका से इनकार किया है। लेकिन, पंजाब, तमिलनाडु, राजस्थान, आंध्र प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों से भी बिजली आपूर्ति बाधित होने जैसी आशंकाएं जताई जा रही हैं।

बिजली के लिए कोयले पर कितनी निर्भरता है ?
भारत में बिजली उत्पादन आज भी करीब 70% कोयला-आधारित थर्मल पॉवर प्लांट के ही भरोसे है। इसे ऐसे समझिए कि देश में कुल 388 गीगावॉट विद्युत उत्पादन करने वाले संयत्र मौजूद हैं, इनमें से 208.8 गीगावॉट बिजली कोयले से संचालित होने वाले संयंत्रों में ही पैदा होती है। सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी के आंकड़ों के अनुसार 4 अक्टूबर को कोयले पर आधारित 135 बड़े बिजली संयंत्रों में से आधे से भी थोड़े अधिक संयंत्रों में कोयले का स्टॉक तीन दिन से भी कम का बच गया था। रविवार को केंद्रीय बिजली मंत्री राकेश कुमार सिंह ने जानकारी दी थी कि विद्युत संयंत्रों के पास चार-साढ़े दिन का कोयला अभी स्टॉक में है और उसे इतना कोयला रोजाना मिल जा रहा है कि उसकी खपत पूरी हो सकती है।

कोयले का संकट क्यों शुरू हुआ है ?
देश में बिजली संयंत्रों को जितने कोयले की आवश्यकता है, उसका 3/4 कोयला देश के ही खाद्यानों से निकाला जाता है। सार्वजनिक क्षेत्र की कोल इंडिया लिमिटेड देश की सबसे बड़ी कोयला उत्पादक कंपनी है और देश में 84 फीसदी थर्मल कोयला का उत्पादन इसी के भरोसे है। बाकी कोयला विदेशों से आयात किया जाता है। पिछले साल अप्रैल-मई महीने में जब से देश कोविड की चपेट में आया तो कोयले का उत्पादन बुरी तरह से प्रभावित हुआ। हालांकि, तब लॉकडाउन की वजह से बिजली की खपत भी घट गई थी। लेकिन, अब बिजली की मांग बेतहाशा बढ़ने के चलते कोयले की मांग में भी बहुत ज्यादा बढ़ गई है। लेकिन, कोयले का उत्पादन उस रफ्तार से संभव नहीं हो पा रहा है और पहले से कोयला उतना स्टॉक में बचा नहीं है। बाकी दिक्कत इस साल मानसून में ज्यादा बारिश होने के चलते हुई है, जिसके चलते भी उत्पादन बहुत प्रभावित हुआ है। ऊपर से जलवायु परिवर्तन के चलते गैर-पंरपरागत ऊर्जा स्रोतों पर फोकस रहने के चलते कोयला खदानों में उतना निवेश नहीं हुआ है ताकि मांग के मुताबिक उत्पादन की क्षमता बढ़ाने लायक उसका आधुनिकीकरण हो सके।

आयातित कोयले की कीमतों में जबर्दस्त उछाल
यूनाइटेड किंग्डम और चीन में भारत से पहले ही लगभग इन्हीं कारणों से ऊर्जा संकट शुरू हुआ है। मांग की तुलना में उत्पादन कम होने से कोयले की कीमतें बढ़ने लगी हैं। चीन जैसे कम्युनिस्ट देश में भी यह किया गया है। जैसे इंडोनेशिया में इस साल मार्च तक कोयले का भाव 60 डॉलर प्रति टन होता था, जो आज की तारीख में 200 डॉलर प्रति टन हो चुका है। जाहिर है कि अगर बिजली कंपनियां यहां से कोयला खरीदकर बिजली पैदा करेंगी तो उन्हें बिजली के दाम बढ़ाने पड़ेंगे। इसलिए वो उत्पादन घटाने का विकल्प तलाश रही हैं। गुजरात के मुंद्रा में स्थित टाटा पॉवर के साथ यही हो रहा है, जो विदेश से आयातित कोयले पर निर्भर है। उसने देश में कई राज्यों से बिजली सप्लाई का करार कर रखा है। इसलिए उसपर उपभोक्ताओं को बिजली कटौती का संदेश भेजने का आरोप है, जिससे घबराहट पैदा होने का आरोप केंद्र सरकार लगा रही है।

केंद्र सरकार का दावा क्या है ?
केंद्र सरकार का दावा है कि बिजली संकट का डर बेवजह है। केंद्र सरकार के मुताबिक उसने सभी थर्मल पॉवर प्लांट में कोयले के स्टॉक की समीक्षा की है। शनिवार को बिजली संयंत्रों को 19.2 लाख टन कोयला भेजा गया, जबकि खपत सिर्फ 18.7 लाख टन की थी। वहीं, कोयला मंत्रालय के मुताबिक 400 लाख टन से ज्यादा कोयले का स्टॉक कोल इंडिया लिमिटेड (सीआईएल) के पास रखा हुआ है। इसके अलावा 72 लाख टन कोयला विभिन्न पॉवर प्लांट के पास भी स्टॉक में पड़े हैं। उधर, सार्वजनिक क्षेत्र की एनटीपीसी, डीवीसी को कहा गया है कि दिल्ली डिस्कॉम की बिजली की जरूरतों को पूरा करे। बिजली मंत्री आरके सिंह ने कहा है कि यदि कोयले की पर्याप्त सप्लाई के बावजूद लोड शेडिंग की गई तो कानूनी कार्रवाई होगी। उन्होंने टाटा पॉवर को भी बिजली कटौती संबंधित मैसेज उपभोक्ताओं को भेजने को लेकर सख्त चेतावनी दी है।












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