राजस्थान में सीएम पद की दौड़: पढ़ें सचिन पायलट और अशोक गहलोत की ताकत और कमजोरी
नई दिल्ली। कौन बनेगा राजस्थान का सीएम, सचिन पायलट या अशोक गहलोत? इस सवाल पर सस्पेंस बना हुआ है। गुरुवार सुबह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अशोक गहलोत के साथ बातचीत की, लेकिन कोई ऐसी खबर बाहर नहीं आ सकी, जिससे अंदाजा लगाया जा सके कि आखिर कांग्रेस पार्टी राजस्थान की कमान किसे सौंपने जा रही है। लगातार गहराते सस्पेंस के बीच यह जानने की जरूरत है कि आखिर दोनों नेताओं में क्या खूबी है और क्या कमियां? इससे भी ज्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि आखिर इस समय कांग्रेस नेतृत्व सोच क्या रहा है, वह किस बात को ज्यादा प्राथमिकता दे रहा है? इसी आधार पर होगा अनुभवी अशोक गहलोत और युवा जोश से भरपूर सचिन पायलट में से किसी एक का सीएम पद के लिए चयन। सबसे पहले अनुभवी अशोक गहलोत के बारे में बात करते हैं:

जादूगर अशोक गहलोत की कमजोरी और खूबियां
अशोक गहलोत कांग्रेस के गिने-चुने जमीन से जुड़े नेताओं में एक हैं। उनके पिता बाबू लक्ष्मण सिंह गहलोत देश के जाने-माने जादूगर थे। जादू का शौक उन्हें भी था और स्कूल के दिनों में वह खूब जादू दिखाया करते थे। गहलोत जेब में फूल डाला करते और उसे रूमाल बनाकर बाहर निकालते तो चारों ओर तालियां बजने लगतीं। बाद में वह छात्र राजनीति से होते हुए राजस्थान की सियासत के शीर्ष तक पहुंचे।
-अशोक गहलोत के व्यक्तित्व में आकर्षण है। वह दुश्मन को भी दोस्त बना लेते हैं। रणनीतिकार के तौर पर पिछले करीब 2 साल से वह लगातार राहुल गांधी के साथ बने हुए हैं। अगर कहा जाए कि राहुल गांधी के 2.0 अवतार में किसी कांग्रेसी की सबसे बड़ी भूमिका है तो वह अशोक गहलोत ही हैं। गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा को उसी के गढ़ में चुनौती देने के पीछे अशोक गहलोत का ही दिमाग रहा।
-कांग्रेस के सॉफ्ट हिंदुत्व वाले स्टैंड के पीछे भी अशोक गहलोत की ही रणनीति ने काम किया। गुजरात से ही राहुल गांधी ने मंदिर-मंदिर जाना शुरू और मध्य प्रदेश तक यह क्रम जारी रहा।
-राजस्थान की बात करें तो यहां अशोक गहलोत दो बार सीएम रह चुके हैं और तीसरी बार सीएम पद की रेस में हैं। पहली बार वह 1998 से 2003 तक सीएम रहे और दूसरी बार 2008 से 2013 मुख्यमंत्री पद संभाला।
कमजोरी: 2013 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस अशोक गहलोत के ही नेतृत्व में लड़ी थी। पिछले विधानसभा में कांग्रेस की हालत इतनी खराब हो गई थी कि 200 में सिर्फ 21 सीटों पर ही उसे जीत मिल सकी थी।
-अशोक गहलोत की असफलता की कहानी 2014 लोकसभा चुनाव तक जारी रही, जब मोदी लहर में यहां कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया और 25 की 25 लोकसभा सीटों पर बीजेपी जीत गई थी। अशोक गहलोत 2014 में अपनी पार्टी को एक भी सीट नहीं दिला सके थे।
-2008 से 2013 तक अशोक गहलोत का शासन विवादों से भरा रहा। इस दौरान भ्रष्टाचार के दाग उनके दामन पर भी लगे।
-2014 लोकसभा चुनाव के बाद राजस्थान कांग्रेस में इतनी हताशा थी कि हर कोई मान बैठा था कि अब कुछ नहीं हो सकता। धीरे-धीरे अशोक गहलोत राजस्थान की राजनीति में करीब-करीब शून्य पर चले गए थे। राजस्थान में यहीं से गहलोत की कहानी खत्म होनी शुरू हुई और सचिन पायलट का प्रदेश के राजनीतिक पटल पर शानदार अवतरण हुआ।

सचिन पायलट की खूबी और कमजोरियां
सचिन पायलट यूपीए सरकार में केंद्रीय मंत्री रहे। वह राजेश पायलट के बेटे हैं, जो अपने जमाने में कांग्रेस के बेहद कद्दावर और सम्मानित नेता रहे। सचिन पायलट गुर्जर समाज से आते हैं, जो राजस्थान में काफी अहमियत रखता है।
-सचिन पायलट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह कभी विवादों में नहीं रहते। उनके दामन पर भ्रष्टाचार का कोई दाग नहीं है।
-सचिन पायलट ने अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस की घोर नाकामी के बाद पार्टी की कमान संभाली और प्रदेश में वापस उसे खड़ा किया। यह उनकी बड़ी उपलब्धि है।
-सचिन पायलट ने बेहद कम समय में पार्टी के भीतर अपनी लिए जगह बनाई और आज वह सभी विधायकों की पहली पसंद भले न हों, लेकिन कार्यकर्ताओं के सच्चे नेता हैं।
-वह पढ़े-लिखे नेता हैं और कांग्रेस का भविष्य हैं। उनके पास अभी काफी समय है। वह युवाओं को केंद्र में रखकर रणनीति में बनाने में दक्ष हैं और ऐसा करके दिखा भी चुके हैं।

आखिर क्या है कांग्रेस की प्राथमिकता, इसी आधार पर होगा सीएम का चयन
अशोक गहलोत और सचिन पायलट की खूबी और कमजोरी के साथ ही सबसे अहम बात यह है कि आखिर कांग्रेस की प्राथमिकता क्या है? पार्टी भविष्य के हिसाब से फैसला लेना चाहती है या तात्काालिक फायदे नुकसान के बारे में सोच रही है। कुछ महीने बाद 2019 लोकसभा चुनाव हैं। ऐसे में पार्टी के भीतर एक वर्ग अनुभव को तरजीह देने की बात कर रहा है। अगर पार्टी भविष्य के हिसाब से फैसला लेगी, तो निश्चित ही सचिन पायलट पहली पसंद होंगे।
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