Climate Change:पूरा भारत असुरक्षित, इन इलाकों को ज्यादा खतरा, IPCC रिपोर्ट में क्या है जानिए

नई दिल्ली, 1 मार्च: उत्सर्जन को कम करने के वादे पर सख्ती से काम करने का समय बीतता जा रहा है। जलवायु परिवर्तन पर बने एक पैनल ने जो अपनी ताजा रिपोर्ट दी है, उससे पूरे भारत के लिए एक भयावह तस्वीर दिखाई पड़ रही है। खासकर बड़े शहरी इलाकों से लेकर हिमलायी क्षेत्रों को बहुत ज्यादा जोखिम का अनुमान है। जलवायु परिवर्तन की वजह से आने वाले कुछ ही वर्षों में असामान्य गर्मी देखने को मिल सकती है और असामान्य रूप से भारी बारिश की परिस्थितियां भी पैदा हो सकती हैं। उत्तराखंड जैसे इलाकों में चमोली जैसी त्रासदी बढ़ सकती है। इसकी वजह से ना सिर्फ करोड़ों की आबादी के सामने संकट के हालात बनने वाले हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था भी चौपट हो सकती है।

भारत के लिए परिस्थितियां असहनीय हो जाएंगी-रिपोर्ट

भारत के लिए परिस्थितियां असहनीय हो जाएंगी-रिपोर्ट

इंटरगवर्मेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने सोमवार को अपने छठे आकलन रिपोर्ट का दूसरा हिस्सा जारी किया है, उससे साफ हो गया है कि जलवायु परिवर्तन के खतरे से देश का कोई भी हिस्सा नहीं बचा है। ताजा रिपोर्ट की अहमियत इसलिए बढ़ गई है, क्योंकि पहली बार पैनल ने क्षेत्रीय आकलन किया है, जिसमें बड़े शहरों से जुड़ी संभावित जोखिम जुटाई गई है। आईपीसीसी की रिपोर्ट के मुताबिक जलवायु परिवर्तन के मामले में आबादी के हिसाब से भारत दुनिया के सबसे अधिक खतरे वाले देशों में शामिल है, जो समुद्र के जल-स्तर बढ़ने से प्रभावित होगा। रिपोर्ट को इस तरह से चेतावनी के तौर पर लिया जा सकता है कि इसमें कहा गया है, 'अगर उत्सर्जन को तेजी से खत्म नहीं किया गया तो दुनिया भर में, गर्मी और नमी इंसान की सहनशीलता से बाहर चली जाएगी और भारत उन स्थानों में से है जो इन असहनीय परिस्थितियों का अनुभव करेगा।'

ज्यादा उत्सर्जन की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी

ज्यादा उत्सर्जन की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी

ज्यादा से ज्यादा दो दशक बाद से ही यानि इस शताब्दी के मध्य तक करीब साढ़े तीन करोड़ लोग सालाना तटीय इलाकों में बाढ़ के संकट का सामना करने को मजबूर होंगे। लेकिन, अगर जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार उत्सर्जन की स्थिति ज्यादा रही तो इस सदी के अंत तक इसकी चपेट में आने वाली तटीय आबादी की संख्या करीब 4.5 करोड़ से 5 करोड़ तक पहुंच जाएगी। रिपोर्ट के मुताबिक 'शहरों में हीट वेव समेत असामान्य गर्मी की घटनाएं बढ़ गई हैं, जिससे वायु प्रदूषण भी बढ़ गया है, जिससे प्रमुख बुनियादी कार्य सीमित हुए हैं। '

'जलवायु परिवर्तन देश के किसी भी भाग को नहीं छोड़ेगा'

'जलवायु परिवर्तन देश के किसी भी भाग को नहीं छोड़ेगा'

आईपीसीसी रिपोर्ट के एक लीड ऑथर अंजल प्रकाश ने टीओआई को दिए एक इंटरव्यू में कहा है, 'भारत असुरक्षित है और जलवायु परिवर्तन देश के किसी भी भाग को नहीं छोड़ेगा।' उन्होंने कहा है कि 'रिपोर्ट से पता चलता है कि 'शहरों को जलवायु-प्रेरित खतरों से जोखिम है, जैसे कि असामान्य बारिश, लगातार बारिश के बाद आने वाली बाढ़ और बेहद गर्म हवाएं। इस समय भारत की एक-चौथाई आबादी शहरी इलाकों में रहती है। अगले 15 वर्षों में यह 40% हो जाएगी और यह 60 करोड़ तक पहुंच जाएगी। मतलब अमेरिका की आज की आबादी की दो गुनी। '

देश के किन तटीय शहरों को है खतरा ?

देश के किन तटीय शहरों को है खतरा ?

अंजल प्रकाश का कहना है कि भारत की तटीय सीमा 7,500 किलो मीटर लंबी है, जिसमें मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, विशाखापट्टनम और पुरी के अलावा गोवा जैसे राज्य भी मौजूद हैं। समुद्र जल-स्तर वृद्धि के संकट के नजरिए से मुंबई अत्यधिक जोखिम वाला शहर है। जलवायु परिवर्तन के असर से भारत के शहरों को ज्यादा गर्मी झेलनी पड़ेगी, बाढ़ का सामना करना पड़ेगा, समुद्र जल-स्तर बढ़ने से जमीन में खारापन का प्रवेश होगा और साथ ही पर्यावरण से जुड़े अन्य खतरे जैसे कि चक्रवातों की संख्या बढ़ेगी।

अत्यधिक गर्मी और नमी के खतरे वाले शहर ?

अत्यधिक गर्मी और नमी के खतरे वाले शहर ?

रिपोर्ट में अहमदाबाद को गंभीर अर्बन हीट आइलैंड वाली श्रेणी में रखा गया है। इनके अलावा चेन्नई, भुवनेश्वर, पटना और लखनऊ जैसे शहरों भी गर्मी और नमी के मामले में खतरनाक स्तर पर पहुंचते जा रहे हैं। अंजल प्रकाश के मुताबिक 'भारत की शहरी आबादी को दूसरे इलाकों के मुकाबले ज्यादा जोखिम है, जिसके 2050 तक 87.7 करोड़ हो जाने का अनुमान है, यानि 2020 के 48 करोड़ के मुकाबले लगभग दो गुनी।'

जलवायु परिवर्तन का हिमालय और उसकी नदियों पर प्रभाव?

जलवायु परिवर्तन का हिमालय और उसकी नदियों पर प्रभाव?

अंजल प्रकाश का कहना है कि जलवायु परिवर्तन की वजह से हिमालय के क्षेत्रों में फरवरी, 2021 में हुई चमोली जैसी त्रासदी अधिक देखने को मिल सकती है। इसके तहत चरम जलवायु स्थितियां बार-बार देखने को मिल सकती हैं। जैसे कि लगातार भारी बारिश, भूस्खलन और इस इलाके में जल चक्र में बदलाव। इसका प्रभाव लोगों, बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था पर भी पड़ना तय है। इसकी वजह से खेती प्रभावित हो सकती है, जिसकी वजह से खाद्य असुरक्षा का खतरा बढ़ेगा।

नुकसान का अनुमान

नुकसान का अनुमान

वादे के मुताबिक भी उत्सर्जन में कमी की गई तो सीधा 2,400 करोड़ डॉलर के नुकसान का अनुमान है और यदि यह ज्यादा रहा और बर्फ पिघलते रहे और अस्थिरता बनी रही तो यह 3,600 करोड़ डॉलर तक जाएगा। आईपीसीसी ने चेतावनी दी है कि 2050 तक अकेले मुंबई में समुद्र जल-स्तर बढ़ने से 16,200 करोड़ डॉलर का नुकसान हो सकता है।

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