चीफ जस्टिस रमना बोले-चुनाव में शासक बदलने का हक तानाशाही के खिलाफ गारंटी नहीं
नई दिल्ली, जुलाई 01: देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमना ने बुधवार को कहा कि चुनावों के जरिए किसी को बदलने का अधिकार "निर्वाचितों के अत्याचार के खिलाफ गारंटी" नहीं है। उन्होंने कहा कि चुनाव, आलोचना और विरोध, ये सभी लोकतंत्र का अंग हैं लेकिन इससे उत्पीड़न से मुक्ति की गारंटी नहीं मिलती। उन्होंने साथ ही इस बात पर भी ज़ोर दिया कि कोरोना संकट काल में लोगों पर अधिक दबाव बना है।
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दिल्ली में जस्टिस पीडी देसाई मेमोरियल लेक्चर देते समय मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमना ने कहा कि, अब तक हुए 17 राष्ट्रीय आम चुनावों में, लोगों ने सत्ताधारी दल या पार्टियों के संयोजन को आठ बार बदला है। बड़े पैमाने पर असमानताओं, अशिक्षा, पिछड़ापन, गरीबी और कथित अज्ञानता के बावजूद, स्वतंत्र भारत के लोगों ने खुद को बुद्धिमान और कार्य के लिए साबित किया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा, लोगों के पास हर कुछ वर्ष के बाद शासक को बदलने का अधिकार रहता है, लेकिन ये अपने आप में अत्याचार के खिलाफ सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। उन्होंने कहा कि, जनता ने अपने कर्तव्यों का बखूबी निर्वहन किया है। अब, यह उन लोगों की बारी है जो राज्य के प्रमुख अंगों का प्रबंधन कर रहे हैं, वे इस पर विचार करें कि क्या वे संवैधानिक जनादेश पर खरे उतर रहे हैं।
मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने न्यायपालिका को कार्यपालिका, विधायिका और "जनता के दबाव" से स्वतंत्र होने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। न्यायिक स्वतंत्रता की आवश्यकता पर चर्चा करते हुए मुख्य न्यायाधीश रमना ने कहा कि, सोशल मीडिया पर इन दिनों काफी शोर देखा गया है। उन्होंने कहा, कार्यपालिका के दबाव में बहुत सारी बातें होती हैं लेकिन इस विषय पर भी चर्चा शुरू करना जरूरी है कि कैसे सोशल मीडिया के रुझान संस्थानों को प्रभावित करते हैं। नए मीडिया टूल्स के पास चीजों को बड़ा बना देने की क्षमता होती है, लेकिन इनमें सही-गलत, अच्छा-बुरा, सच-झूठ का अंतर समझने की क्षमता नहीं होती है।
न्यायाधीश जस्टिस एनवी रमना ने कहा है कि सोशल मीडिया पर किसी भी मुद्दे को बढ़ा-चढ़ाकर बताए जाने से जजों की राय किसी भी तरह से प्रभावित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि जजों को जनमत की भावनाओं से प्रभावित नहीं होना चाहिए, जिसे सोशल मीडिया पर बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने की कोशिश रहती है। जस्टिस रमना ने कहा कि जब आजादी के 70 से अधिक वर्षों के बाद पूरी दुनिया कोविड -19 के रूप में एक अभूतपूर्व संकट का सामना कर रही है। तो हमें जरूरी रूप से रुककर खुद से पूछना होगा कि हमने हमारे सभी लोगों की सुरक्षा और कल्याण सुनिश्चित करने के लिए कानून के शासन का किस हद तक उपयोग किया है।












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