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छत्‍तीसगढ़ प्रथम चरण- सीटें 18, भाजपा 5, कांग्रेस 3!

Naxal hit area
[अजय मोहन] ऊपर तस्वीर में देखिये गरीब किसानों के टूटे-फूटे घर। घर में बंधे गाय-बैल और घर के चारों तरफ सीआरपीएफ के जवान। ऐसा ही नजारा छत्तीसगढ़ के बस्तर व दंतेवाड़ा के क्षेत्रों में आये दिन देखने को मिलता है। गांव वाले अपने बच्चों को स्कूल तो भेजते हैं, लेकिन सरकारी टीचर वहां आकर पढ़ाने से घबराता है। इलाके के विकास की योजनाएं तो बनती हैं, लेकिन एसडीएम इलाके का दौरा करने से कतराता है और ऐसे में सिर्फ हमारे बहादुर जवान और पुलिसकर्मी ही हैं, जो इन इलाकों की शांति व्यवस्था के लिये जिंदगी दांव पर लगा देते हैं।

आज छत्तीसगढ़ के इसी मंडल की 18 विधानसभा सीटों पर मतदान चल रहा है। राज्य में भाजपा की सरकार को 5 साल पूरे हो चुके हैं और कांग्रेस नेतृत्व वाली केंद्र सरकार के वादे को 3 साल हो गये, लेकिन कोई पहल नहीं हुई।

नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में मतदान सुबह सात बजे शुरू हुआ था और तीन बजे तक संपन्न हो जायेगा। वो भी सिर्फ इसलिये ताकि गांव वाले सुरक्षित अपने घर वापस जा सकें, क्योंकि अगर घर पहुंचने में देर हुई, तो उनकी मौत की खबर घर पहुंचेगी। वैसे सच पूछिए तो आज का दिन बस्तर और दंतेवाड़ा जैसे जिलों की किसमत बदलने का काम कर सकता है।

क्‍या केंद्र को है राज्‍य में कांग्रेस शासित सरकार का इंतजार?

आज चाहे 50 फीसदी मतदान हो या 65 फीसदी, बस नेता ऐसा चुना जाना चाहिये, जो विधानसभा से ऐसी हुंकार भरे कि लोकसभा तक हिल जाये। मैं यहां लोकसभा की बात इसलिये कर रहा हूं क्योंकि दंतेवाड़ा नरसंहार के बाद उसी सभा में पूर्व गृहमंत्री पी चिदंबरम ने खड़े होकर बयान दिया था कि केंद्रीय गृह मंत्रालय नक्सली हिंसा से निबटने के लिये एक बड़ी योजना लेकर आने वाला है। आज तीन साल बीत चुके हैं उस बयान को, न तो केंद्र की कोई पुख्ता रणनीति दिखाई दी और न ही कोई पहल। न ही नक्सलप्रभावित इलाकों के विकास की बात की गई और न हीं हिंसा को समाप्त करने व नक्सलियों से वार्ता की कोई प्रभावी पहल हुई।

वैसे फैसला तो जनता के हाथ में है, लेकिन ऐसी परिस्थितियों को देखते हुए यह अंदाजा जरूर लगाया जा सकता है कि कांग्रेस पार्टी की सरकार बनने पर अगले पांच साल के लिये छत्तीसगढ़ का यह इलाका फिर थम जायेगा। जैसे आज नक्सली हिंसा के साय में लोग जी रहे हैं, वैसे ही पांच साल बाद भी जीते रहेंगे। हां अगर केंद्र ने पिछले तीन साल में कोई प्रभावी कदम उठाया होता, तो शायद आज लोग पंजे का ही बटन दबा रहे होते।

अब अगर भारतीय जनता पार्टी की बात करें, तो वो यहां सत्ताधारी पार्टी है और पिछले पांच साल में नक्सली हिंसा को खत्म भले ही नहीं कर पायी, लेकिन लगाम कसने में कामयाब जरूर हई है। यहां पर हम राहुल गांधी के उस बयान का जिक्र करना चाहेंगे, जो उन्होंने यूपी में दिया- केंद्र पैसा भेजता है, योजनाएं बनाता है, लेकिन राज्य सरकारें उस पर हमल नहीं करतीं। हम पूछना चाहेंगे कि नक्सली हिंसा की रोकथाम करने और छत्तीसगढ़ के इस इलाके के लिये आपने क्या कदम उठाये। अगर उठाये तो राज्य सरकार को उस पर अमल करने के लिये दबाव क्यों नहीं डाला।

कुल मिलाकर देखा जाये तो आज के मतदान के परिणाम जो भी हों, भाजपा या कांग्रेस, दोनों ही छत्तीसगढ़ के बस्तर रीजन की कितमत तभी बदलने में कामयाब हो पायेंगी, केंद्रीय गृह मंत्रालय एक कारगर योजना के साथ आगे आयेगा, अन्यथा छत्‍तीसगढ़ की तस्वीर अगले पांच साल तक फिर नहीं बदलने वाली।

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