नरेंद्र मोदी बने पीएम तो भारत बन जाएगा अमेरिका !

Narendra Modi-US
वाशिंगटन। गिरती जीडीपी, बढ़ती महंगाई और इन सबकी वजहों से परेशान जनता का निशाना बनती है सरकार। सरकार देश के केंन्द्रिय बैंक के लिए नए गर्वनर की नियुक्ति करती है और फिर गर्वनर पर देश की अर्थव्‍यवस्‍था की जिम्‍मेदारी आ जाती है। लेकिन गर्वनर की नियुक्ति तक बहुत देर हो चुकी होती है और देश की अर्थव्‍यवस्‍था बुरी हालत में पहुंच जाती है।

पढ़ें-अमेरिका को मोदी में नजर आए रीगन

कुछ माह बाद हुए चुनावों में देश की जनता एक ऐसे नेता को चुनती है जो ए‍क विवादित गर्वनर रह चुका है। इस नेता का बिजनेस फ्रेंडली फॉर्मूला सफल होता है और एक बार फिर देश अर्थव्‍यवस्‍था के रास्‍ते पर वापस लौटता है।

कुछ दशक पहले जो हालात अमेरिका में थे, वही आज भारत में हैं। नौ माह पहले रघुराम राजन को रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया का गर्वनर नियुक्‍त किया गया है और अब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बनने की राह पर आगे बढ़ रहे हैं। आज अमेरिका दुनिया की आर्थिक महाशक्ति बना हुआ है।

1980 के दशक में पॉल वोलकर को फेडरल रिजर्व बैंक का प्रमुख नियु‍क्‍त किया गया था और कुछ ही माह बाद रोनाल्‍ड रीगन वहां के राष्‍ट्रपति के तौर पर जनता के बीच आए।

रीगन जब अमेरिका के राष्‍ट्रपति के तौर पर आए तो उन्‍होंने किए हुए वादों से ज्‍यादा जनता को दिया और इसकी वजह से वहां की अर्थव्‍यवस्‍था को खासा फायदा पहुंचा।

चुनावों के समय रीगन ने कहा था कि वह टैक्‍स में कटौती करेंगे और लालफीताशाही से लोगों को आजादी दिलाएंगे। ज्‍यादातर लोग जहां आज उनकी काम करने की शैली पर सवाल उठाते हैं तो वही लोग इस बात से भी इंकार नहीं करते हैं कि रीगन अमेरिका के एक ऐसे नेता के तौर पर थे जिनकी वजह से अमेरिका में कई तरह के बदलाव आए और अर्थव्‍यवस्‍था की हालत बेहतर हो सकी।

अमेरिका के अग्रणी समाचार पत्र वॉल स्‍ट्रीट जनरल के मुताबिक‍ अगर नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बन गए तो भारत आज अमेरिका के उसी दौर के रीगन-वोल्‍कर पल का हिस्‍सा बनने जा रहा है।

नरेंद्र मोदी का पहला कदम रघुराम राजन को उनके पद पर बरकरार रखना होगा बिल्‍कुल उसी तरह से जिस तरह से रीगन ने वोल्‍कर का समर्थन किया था।

अमेरिका में अर्थशास्त्रियों ने वोल्‍कर को चेतावनी दी थी कि अगर उन्‍होंने ब्‍याज दरें बढ़ाई तो फिर उन्‍हें गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। उस समय रीगन वोल्‍कर के बचाव में आगे आए थे। रीगन ने उस समय जवाब दिया कि अगर अब नहीं तो कब, हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा? अमेरिका में उस समय बेरोजगारी 10 प्रतिशत की दर से बढ़ती जा रही थी।

ब्‍याज दर भी बहुत कम थीं। रीगन हर पल वोल्‍कर को अपना समर्थन देते रहे और हर पल महंगाई के खिलाफ उनकी लड़ाई में साथ लड़ते रहे। नतीजा रीगन 1984 में दोबारा चुनावों में फिर से राष्‍ट्रपति के तौर पर सामने आए।

हालांकि भारत में, जहां रिजर्व बैंक कम स्‍वतंत्र है, नरेंद्र मोदी के लिए रीगन की तरह कदम उठा पाना संभव नहीं हो सकेगा। लेकिन फिर भी उन्‍हें ऐसा करना पड़ेगा। पिछले पांच वर्षों में देश की महंगाई दर दोहरी संख्‍या तक पहुंच गई है और वर्तमान सत्‍ताधार यूपीए की नीतियों की वजह से यह 10 प्रतिशत तक पहुंच गई है।

इसके साथ ही सरकार के काम करने के तरीकों की वजह से देश में निवेश का जो माहौल था वह बिगड़ता गया और देश का विदेशी निवेश भी कम हो गया।

वॉल स्‍ट्रीट जनरल के मुताबिक रीगन की ही तरह नरेंद्र मोदी को भी डिरेगुलेशन जैसी बड़ी चुनौती से जूझना पड़ेगा। रीगन सिर्फ कुछ उत्‍पादक कदमों जैसे गैस की कीमतों पर नियंत्रण लगाकर इसका सामना कर सके थे। नरेंद्र मोदी को कटौती को लागू करना होगा और साथ ही उस ब्‍यूरोक्रेसी के लिए भी कड़ा नियम बनाना होगा जो अक्‍सर पक्षपातपूर्ण फैसलों के लिए जिम्‍मेदार हैं।

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