आखिर संसद क्यों पहुंचे सचिन और रेखा जब कुछ करना ही नहीं था?

वहीं रेखा ने सात बार सत्र में हिस्सा लिया है। अगर इनकी तुलना अकादमिक, सिविल सेवा, पत्रकारिता और विज्ञान जैसे क्षेत्रों से मनोनीत किए सांसदों से की जाए, तो इनका रिकॉर्ड बेहद खराब है। ऐसे में अब ये मुद्दा गंभीर हो रहा है और समय समय पर सदन में उठने लगा है। हाल ही में आरजेडी सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री प्रेमचंद गुप्ता ने ऐसे सांसदों के नॉमिनेशन को लेकर सवाल खड़ा किया। जब सचिन को राज्यसभा में लाया गया तो ऐसा माना जा रहा था कि क्रिकेट को अलविदा कहने के बाद सचिन तेंदुलकर संसद में अधिक समय देंगे।
मगर हुआ इसके ठीक विपरीत। सचिन पिछले साल नवंबर में एक बार ही संसद में उपस्थित हुए। हैरानी की बात तो यह है कि सचिन और रेखा ने नई सरकार बनने के बाद एक बार भी संसद की कार्रवाई में हिस्सा नहीं लिया। गौर करने वाली बात ये है कि तेंदुलकर और रेखा ने राज्यसभा में दो साल बिताने के बाद भी सांसद निधि से एक रूपया नहीं खर्चा। इसी साल फरवरी में सांख्यिकी मंत्रालय की वेबसाइट पर जारी की गई रिपोर्ट से इस बात का खुलासा हुआ था। राज्यसभा के सांसदों को अपनी पसंद का कोई जिला चुनने का अधिकार होता है। वे उस जिले में वे कई तरह के विकास कार्य करवा सकते हैं। इसके लिए राज्यसभा सांसदों को प्रति वर्ष पांच करोड़ रूपए की राशि मिलती है। सचिन तेंडुलकर ने मुंबई (सब-अर्बन) जिला चुना, लेकिन काम कुछ नहीं करवाया। रेखा ने तो जिला चुनने तक की जहमत नहीं उठाई।












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