नौकरशाहों को मंत्री पद, क्या मोदी के नेता योग्य नहीं?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिमंडल में नौ नए मंत्रियों को शामिल किया है. इन नौ नए मंत्रियों में चार पूर्व नौकरशाह हैं.
ये हैं- पूर्व गृह सचिव आरके सिंह, पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर सतपाल सिंह, रिटायर्ड डिप्लोमैट हरदीप सिहं पुरी और रिटायर्ड आईएएस केजे अल्फोंस. इनमें से केजे अल्फोंस और हरदीप सिंह पूरी तो सांसद भी नहीं है. यहां तक कि केजे अल्फोंस का रुझान कम्युनिस्ट राजनीति की तरफ़ रहा है. दूसरी तरफ़ आरके सिंह इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में अपराधियों को पैसे पर टिकट बेचने का आरोप लगा चुके हैं.
मोदी सरकार के गठन के बाद से ही सवाल उठता रहा है कि उनके मंत्रिमंडल में योग्य और अनुभवी लोगों की कमी है. जब भी मोदी मंत्रिमंडल का विस्तार होता है तब यह सवाल फिर से दोबारा उठ खड़ा होता है.
इस बार भी कहा जा रहा है कि नौ नए मंत्रियों में से चार पूर्व ब्यूरोक्रेट का होना दर्शाता है कि भारतीय जनता पार्टी के पास योग्य लोगों की कमी है इसलिए ब्यूरोक्रेट्स की शरण में जाना पड़ता है.
वरिष्ठ पत्रकार वीर सांघवी ने ट्वीट कर कहा, ''बीजेपी अब भी मंत्री पद के लिए ब्यूरोक्रेट्स की तरफ़ ही देखती है. इससे साफ़ है कि पार्टी के पास प्रतिभा की कमी है.'' दिसंबर 2015 में बीजेपी उपाध्यक्ष विनय सहस्रबुद्धे ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दिए इंटरव्यू में कहा था, ''कांग्रेस की तुलना में हमलोग के पास छोटी संख्या में अनुभवी और प्रतिभाशाली लोग हैं.''
उन्होंने कहा था कि इसी वजह से उन योग्य लोगों को चुनने में दिक़्क़त हो रही है जो तेज़ी से आर्थिक सुधार को गति दे सकते हैं. जब उनका यह बयान सुर्खियों में आया तो सहस्रबुद्धे ने कहा उनके इंटरव्यू को ग़लत तरीक़े से कोट किया गया.
मोदी सरकार में शामिल नए मंत्रियों की शख़्सियत
'कमी या पूछ नहीं'
कई लोग यह भी मानते हैं कि बीजेपी में योग्य लोगों की कमी नहीं बल्कि योग्य लोगों को ये बर्दाश्त नहीं करते हैं.
पटना में अनुग्रह नारायण इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंस के पूर्व निदेशक और अर्थशास्त्र के प्रोफ़ेसर डीएम दिवाकर कहते हैं, ''मोदी सरकार में औसत दर्जे के लोगों की पूछ है. ये प्रतिभाशाली लोगों को बर्दाश्त नहीं करते हैं. नीति आयोग के चेयरमैन अरविंद पनगड़िया, पूर्व अटॉर्नी जनरल मुकुल रोहतगी और रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन को मिसाल के तौर पर देखा जा सकता है. आख़िर इन्होंने अपने-अपने पदों की बजाय अपने मूल पेशे में जाना क्यों पसंद किया?''
दिवाकर कहते हैं कि ये तीनों अपने-अपने क्षेत्र की जाने-माने हस्ती थे इन्होंने खामोशी से ख़ुद को अलग कर लिया. दिवाकर ने कहा, ''पीएम मोदी का ग्राफ़ लगातार नीचे जा रहा है. अब इनके पास रिस्क लेने का समय नहीं है. अब तो केंद्र का चुनाव होने वाला है. मोदी सरकार के कई फ़ैसले औंधे मुंह गिरे हैं जिनमें नोटबंदी की सबसे बड़ी नाकामी है.''
जब मोदी सरकार का गठन हुआ तो उसमें मानव संसाधन विकास मंत्रालाय की ज़िम्मेदारी लंबे समय तक टीवी कलाकार रहीं स्मृति ईरानी को दिया गया था. कई लोगों ने पीएम मोदी के इस फ़ैसले पर सवाल उठाया कि एक अत्यंत महत्वपूर्ण मंत्रालय को योग्य हाथ में नहीं सौंपा गया. हालांकि कई विवादों को बाद स्मृति इरानी से मानव संसाधन मंत्रालय ले लिया गया.
इसी तरह रक्षा मंत्रालय की ज़िम्मेदारी सौंपने के लिए मनोहर पर्रिकर को गोवा से मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दिलवाकर दिल्ली बुलाया गया. उस वक़्त भी सवाल उठा कि मोदी या तो अपने विश्वासपात्रों को मंत्री बनाना चाहते हैं या योग्य लोग नहीं हैं.
वरिष्ठ पत्रकार एमके वेणु भी इस बात को मानते हैं कि मोदी सरकार में प्रतिभा की कमी से ज़्यादा प्रतिभा को तवज्जो नहीं दी जाती है. उन्होंने कहा कि वित्त मंत्रालय में यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा को लाना एक अच्छा फ़ैसला था, लेकिन उन्हें वहां से हटा दिया गया.
वेणु कहते हैं कि जयंत सिन्हा में वैश्विक अर्थशास्त्र की अच्छी समझ है और उनके पास पेशेवर अनुभव भी है, लेकिन उनकी जगह वित्त मंत्रालय में संतोष गंगवार और अर्जुन मेघवाल को लाया गया. रेल मंत्री बनाने के लिए भी सुरेश प्रभु को शिव सेना से लाया गया था (बाद में वो बीजेपी में शामिल हो गए). मनोहर पर्रिकर के फिर से गोवा जाने के बाद मोदी सरकार को अभी कोई पूर्णकालिक रक्षा मंत्री नहीं मिल पाया है.
सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील और स्वराज अभियान से जुड़े प्रशांत भूषण का कहना है, ''मोदी सरकार की यही तो समस्या है कि उनके पास अच्छे लोग नहीं हैं. उन्होंने कहा जो अच्छे लोग हैं, उन्हें आरएसएस के दवाब में जाना पड़ता है. प्रशांत भूषण ने कहा कि रघुराम राजन को इन्होंने बर्दाश्त नहीं किया और पनगड़िया को स्वदेशी जागरण मंच के दबाव में जाना पड़ा.''
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में जो अनुभवी लोग थे उन्हें मोदी कैबिनेट में उम्र का हवाला देकर जगह नहीं दी गई. इसे लेकर वाजेपयी सरकार में वित्त मंत्री रहे यशवंत सिन्हा ने कहा कि था कि मोदी सरकार ने उन्हें मानसिक रूप से मृत घोषित कर दिया है. उन्होंने कहा था, ''प्रधानमंत्री ने 26 मई, 2014 के बाद 75 साल से ऊपर वाले लोगों को मानसिक रूप से मृत घोषित कर दिया है.''
इसी तरह विपक्षी नेता राहुल गांधी भी इसी तरह का आरोप मोदी सरकार पर लगाते रहे हैं. राहुल गांधी कई बार कह चुके हैं कि मोदी सरकार में औसत दर्जे के लोगों को अहम ज़िम्मेदारियां दी गई हैं.
कई लोगों का कहना है कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के पास भी पूर्ण बहुमत था, लेकिन वो हमेशा विशेषज्ञों को तवज्जो देते थे. यहां तक कि अटल बिहारी वाजेपेयी और मनमोहन सिंह की भी इस मामले में तारीफ़ की जाती है, लेकिन मोदी के बारे में कहा जाता है कि उनकी टीम में योग्य लोगों की भारी कमी है.
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