यौन उत्पीड़न पर बॉम्बे हाई कोर्ट के फ़ैसले की क्यों हो रही निंदा

सांकेतिक तस्वीर
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बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने अपने हालिया फै़सले में यौन उत्पीड़न को परिभाषित करते हुए कहा है कि वक्षस्थल को जबरन छू लेने मात्र को यौन उत्पीड़न की संज्ञा नहीं दी जा सकती. अदालत ने ये फ़ैसला सुनाते हुए एक नाबालिग़ बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न के मामले में दोषी ठहराए गए शख़्स की सज़ा में बदलाव कर दिया है।

इससे पहले नागपुर सत्र न्यायालय ने आईपीसी सेक्शन 354 के तहत व्यक्ति को एक साल की और पोक्सो के तहत तीन साल की सज़ा सुनाई थी. ये दोनों सजद़ाए एक साथ दी जानी थीं. लेकिन बॉम्बे हाईकोर्ट के फ़ैसले के बाद तीन साल की सजा वाला फ़ैसला अब निष्क्रिय हो गया है. कोर्ट के इस फ़ैसले के बाद से सोशल मीडिया से लेकर क़ानून को जानने वालों के बीच फ़ैसले का विरोध जारी है।

आख़िर जज ने अपने फ़ैसले में क्या लिखा?

बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच की न्यायमूर्ति पुष्पा गनेडीवाला ने अपने फ़ैसले में लिखा है, "सिर्फ वक्षस्थल को जबरन छूना मात्र यौन उत्पीड़न नहीं माना जाएगा, इसके लिए यौन मंशा के साथ स्किन टू स्किन कॉन्टेक्ट होना ज़रूरी है." बेंच ने कहा है कि "सिर्फ वक्षस्थल को जबरन छूना (ग्रोपिंग) यौन उत्पीड़न के तहत नहीं माना जाएगा."

क़ानूनी मामलों को कवर करने वाले वरिष्ठ पत्रकार सुचित्र मोहंती ने बीबीसी हिंदी को बताया है कि व्यक्ति ने नागपुर के अतिरिक्त संयुक्त सहायक सत्र न्यायाधीश के उस फ़ैसले को बॉम्बे हाई कोर्ट में चुनौती दी थी जिसमें उन्हें भारतीय दंड संहिता की तमाम धाराओं और सेक्शन 354 के तहत उन्हें दोषी ठहराया गया था.

समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक़, दोषी पाए गए व्यक्ति ने लालच देकर 12 साल की एक लड़की को अपने घर बुलाया और जबरन उसके वक्षस्थल को छूने और उसके कपड़े उतारने की कोशिश की.

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क़ानून के जानकारों को फ़ैसला लगा अतार्किक

महाराष्ट्र सरकार के पूर्व स्टैंडिंग काउंसिल निशांत कत्नेसवरकर मानते हैं कि इस संदर्भ और केस में हाई कोर्ट का यह आदेश ग़लत और अस्वीकार्य है. इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जानी चाहिए.

वह कहते हैं, "बॉम्बे हाईकोर्ट ने जो तर्क दिया है, उसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है. पोक्सो क़ानून के प्रावधान कहीं भी निर्वस्त्र करने की बात नहीं करते हैं. लेकिन हाई कोर्ट ने ये तर्क दे दिया है जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता है." उन्होंने यहां तक कहा कि महाराष्ट्र सरकार को इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट जाना चाहिए.

वहीं, सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व एडीशनल सॉलिसिटर जनरल के सी कौशिक कहते हैं कि ये फ़ैसला ग़लत लग रहा है और इसे उच्च न्यायालय में चुनौती दी जानी चाहिए. सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व एडीशनल सॉलिसिटर जनरल विकास सिंह मानते हैं कि हाई कोर्ट ने जो तर्क दिया है, उसमें दम नहीं है।

वे कहते हैं, "मैं जज की तार्किकता से सहमत नहीं हूं. इस सेक्शन की मंशा यौन अंगों को जानबूझकर छूने से है. इस तथ्य का कोई मतलब नहीं है कि कपड़े उतारे गए थे या नहीं." इसके साथ ही पूर्व सॉलिसिटर जनरल और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता मोहन पाराशरन का कहना है कि ये फ़ैसला मूल रूप से ग़लत लगता है। वे कहते हैं, "ये फ़ैसला मूल रूप से ग़लत लगता है कि अपराध सिद्ध करने के लिए यौन मंशा के साथ त्वचा से त्वचा के बीच संपर्क होना ज़रूरी है. यौन अपराधों के मामले में क़ानून बिलकुल स्पष्ट हैं."

सोशल मीडिया पर हो रहा विरोध

जस्टिस गनेडीवाला ने ये फ़ैसला 19 जनवरी को सुनाया था लेकिन रविवार शाम को इस फ़ैसले की ख़बर फैलने के बाद से सोशल मीडिया पर इसका विरोध जारी है. ट्विटर यूज़र अर्पिता भार्गव लिखती हैं, "मुंबई कोर्ट का आज जो फरमान आया है उससे तो यही साबित हो रहा है कि आज भी भारत में पुरुषवादी मानसिकता वाले लोग हैं और महिलाओं की बराबरी और आज़ादी सिर्फ कागज़ों तक ही रह गई हैं. भारतीय न्याय व्यवस्था पर शर्म है."

https://twitter.com/Arpitabhargavb1/status/1353400904318246912

प्राप्ति चौधरी लिखती हैं, "अगर आरोपी एक नाबालिग़ के वक्षस्थल को छू रहा है, तो ये यौन मंशा के बिना नहीं होगा तो क्या होगा? बॉम्बे हाईकोर्ट में जस्टिस ने हमें निराश किया है."

https://twitter.com/PCprapti/status/1353447298043236352

ट्विटर यूज़र वैष्णवी लिखती हैं, "मैं बॉम्बे हाई कोर्ट से पूछना चाहती हूं कि अगर मैं किसी को ग्लव्स पहनकर या जूते से मारूं तो वह यौन उत्पीड़न के तहत नहीं आएगा? शर्मनाक."

https://twitter.com/Vaishna88127008/status/1353423890656104449

उथरा अय्यर लिखती हैं, "क्या भारत में क्या लोगों की सोच ख़त्म हो गई है. हे भगवान, किस तरह का देश है ये, एक और शर्मनाक बात. #BombayHighCourt #BombayHC @PMOIndia क्या आप सच में जानते हैं कि इस समाज में क्या हो रहा है. या आप अपनी विदेश यात्रा पर हैं."

https://twitter.com/uthra34/status/1353418377826623492

वहीं, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस फ़ैसले को तार्किक ठहरा रहे हैं. ट्विटर यूज़र अभय गुप्ता लिखते हैं, "इस फ़ैसले के लिए जज का सम्मान करें. ये फ़ैसला कई बेगुनाह लोगों को झूठे यौन उत्पीड़न के मामलों से बचा लेगा. हाँ, नारीवाद पर मानवता की जीत हुई है. और जज भी एक महिला हैं."

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