ब्लॉग: जब ‘भारत माता’ हुईं 18 बरस की

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हमारे देश में औरतों को चाहे हमेशा दूसरे दर्जे की नागरिक की तरह रखा गया हो, जब देश को मानव स्वरूप में देखा जाता है तो 'भारत' के साथ 'माता' ही जुड़ता है.

उम्र और इज़्ज़त दोनों में ऊंचा स्थान देता, कर्तव्य और ज़िम्मेदारी की नीयत जगाता और देश को पूजनीय बनाने वाला संबोधन.

साल 2018 की वो पहली सुबह थी, जब मुझे पहली बार इस संबोधन से उलझन हुई.

बड़ी वजह तो ये थी कि 2018 में '18' है जो बालिग़ होने, वोट डालने, शादी करने, ड्राइविंग लाइसेंस लेने और क़ानूनन शराब पीने जैसी तमाम जवान चीज़ों की ओर ध्यान ले जाता है.

दूसरी बात ये भी कि भारत का हर तीसरा व्यक्ति इस व़क्त जवान है.

'यूथ इन इंडिया' नाम की सरकार की 2017 में आई इस रिपोर्ट के मुताबिक, आबादी के 34.8 फ़ीसदी लोगों की उम्र 15 से 29 साल के बीच है.

अब 'मां' के मुकाबले जवान व्यक्ति की छवि कुछ अलग हो जाती है.

कैसा है जवान भारत का युवा

जवान व्यक्ति जल्दी में होता है. जल्दी नाराज़, जल्दी ख़ुश, फ़टाफट दोस्ती, सटासट प्यार, दनादन नौकरी वगैरह वगैरह.

सांस लेने की फ़ुर्सत नहीं होती. व़क्त मिलता है तो सोशल मीडिया में झटपट कुछ पढ़ लेता है और उसे ही गूढ़ सत्य मान लेता है.

अक़्सर दिमाग से ज़्यादा दिल हावी होता है. दिल के खिड़की-दरवाज़े खुले होते हैं तो बेझिझक प्यार हो जाता है, बंद हों तो बेबात नफ़रत भी.

'एंटी-रोमियो स्क्वॉड', 'बेरोज़गारी', 'स्किल इंडिया', 'फ़ेक-न्यूज़' और 'भीड़-तंत्र' के बीच औसतन कुछ हड़बड़ाया, कुछ बौख़लाया हुआ है हमारा ये जवान व्यक्ति.

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लड़कों के मुकाबले लड़कियां कम

हमारे इस जवान भारत में लड़कों के मुकाबले लड़कियों की तादाद कम है और आनेवाले दशक में और कम होगी.

इसलिए मेरे ज़हन में जब 'माता' की छवि बदली तो वो जवान लड़की नहीं, लड़का ही बनी.

वैसे लड़कियों की साक्षरता दर बढ़ी है और ज़्यादा लड़कियां ख़ुद कमा रही हैं. पर जैसे ही लड़कों के मुक़ाबले देखें तो तस्वीर के रंग फ़ीके पड़ जाते हैं.

2011 की जनगणना के मुताबिक लड़कियों की साक्षरता दर 64.6 फ़ीसदी है तो लड़कों की 80.9 फ़ीसदी. पढ़ भी जाएं तो एक-तिहाई भी बाहर काम नहीं करतीं.

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कम उम्र में शादी करनेवाली लड़कियों की तादाद घटी

2011-12 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक पुरुषों का 55 फ़ीसदी और औरतों का 18 फ़ीसदी 'लेबर फ़ोर्स' यानी कामकाजी वर्ग का हिस्सा बनते हैं.

ये आंकड़े ग्रामीण इलाकों के हैं. ज़्यादा पढ़े-लिखे, विकसित शहरी इलाकों में तो औरतों की दर गिरकर 13 फ़ीसदी हो जाती है.

औरतें ख़ुद कमा ना भी रही हों पर कम से कम जल्दी शादी करने से बच रही हैं. कम उम्र में शादी करनेवाली औरतों की तादाद लगातार कम हुई है.

आज़ाद भारत में कुल शादीशुदा औरतों में से क़रीब 70 फ़ीसदी की उम्र 15 से 19 साल के बीच थी.

जब 2011 की जनगणना हुई तो कम उम्र में शादी करनेवाली औरतों की ये दर गिरकर क़रीब 20 फ़ीसदी हो गई थी.

लड़कियों की शादी करने की औसत उम्र अब 22.3 साल हो गई है.

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जब 60 लाख मर्दों की गई नसबंदी

बच्चे पैदा करने की उम्र में औरत औसतन कितने बच्चे पैदा करेगी, यानी 'टोटल फ़र्टिलिटी रेट' ('टीएफ़आर') भी कम हुआ है.

1971 में ये 5.2 था. साधारण शब्दों में हर औरत को पांच बच्चे पैदा होते थे.

1970 के दशक में प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने जनसंख्या नियंत्रण पर बहुत ज़ोर दिया और देशभर में 'स्टेरेलाइज़ेशन' यानी वंध्यीकरण की विवादास्पद मुहिम चलाई.

फिर इमरजेंसी के दौरान एक साल में 60 लाख मर्दों की नसबंदी की गई.

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मन से 18 का महसूस करना चाहता हूं

छोटे परिवार का चलन बढ़ा और साल 2014 में टीएफ़आर गिरकर 2.3 हो गया है.

पर इसी दर के गिरने और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं की बदौलत मृत्यु दर के भी गिरने का नतीजा ये है कि जवान भारत का ये रूप आनेवाले समय में बदलेगा.

विश्व बैंक के अनुमान के मुताबिक आनेवाले दशकों में भारत की आबादी का इतना बड़ा हिस्सा जवान लोगों का नहीं रहेगा. ये घटेगा.

अंग्रेज़ी का एक लोकप्रिय गाना है '18 टिल आई डाई' यानी 'मरने तक 18 का रहूंगा'.

ब्रायन ऐडम्स ने अपने इस गीत में कहा कि वो इतिहास में नहीं आज के पल को जीना चाहते हैं, 55 के हों जाएं और बूढ़े दिखने लगें तो भी मन से 18 का महसूस करना चाहते हैं.

वैसे 2018 की सुबह के इस चिंतन की वजह ये नहीं है कि भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा उम्र से या मन से जवान नहीं रहेगा.

बल्कि ख़्वाहिश तो है कि सूरत सचमुच बदलनी चाहिए.

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