वुसत का ब्लॉगः भारत में मोदी तो पाकिस्तान में कौन है सेल्फ़ी का दीवाना

मोदी
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मुझे भी बहुत खुशी हुई जब पश्चिमी बंगाल के जलपाईगुड़ी के एंबुलेंस दादा पद्मश्री करीमुल हक़ को प्रधानमंत्री मोदी जी ने सेल्फ़ी लेना सिखाया.

उम्मीद है कि किसी दिन मोदी जी भी करीमुल हक़ के गांव जाके उनसे मोटर साइकिल एंबुलेंस चलाना सीख लेंगे ताकि वो भी एंबुलेंस दादा करीमुल हक़ की तरह किसी भी भेदभाव को ख़ातिर में न लाते हुए वक्त पड़ने पे हर बीमार और ज़ख्मी की जान बचाने के लिए उसे अस्पताल पहुंचा सकें.

सोचिए ऐसी सेल्फ़ी खुद मोदीजी के लिए कितनी कीमती होगी और देखने वालों के लिए तो इससे भी ज़्यादा. वैसे भी हमारे देशों में राजनेता कैमरे से सेल्फ़ी लेने का अलावा और कर भी क्या रहे हैं.

बल्कि मैं तो फ़ैज अहमद फ़ैज की आत्मा से दोनों हाथ जोड़कर माफ़ी मांगते हुए कहूंगा 'मेरी सेल्फ़ी के सिवा दुनिया में रखा क्या है'

मोदी ने 'एंबुलेंस दादा' को सिखाया सेल्फ़ी लेना

इमरान ख़ान का आना

आपके यहां अपने आप में डूबे मोदी जी सेल्फ़ी वाले मशहूर हैं तो हमारे यहां इमरान ख़ान के बारे में उनके कुछ 'अ'शुभचिंतक कहते हैं कि खान साहब का बस एक ही सलाहकार है और वो है उनका आईना, जिसके आगे वो वर्जिश करने के बाद कुछ देर खड़े रहते हैं और आईने में खड़े शख्स की सुनते भी हैं.

इसी तरह पंजाब के वज़ीर-ए-आला मियां शहबाज़ शरीफ़ काम तो बहुत करते हैं मगर उनके कामों से जलने वाले यह भी कहते हैं कि मियां साहब तो खुद इंसानी शक्ल में एक सेल्फ़ी हैं.

अगर किसी पुलिस मुकाबले में दो गुनाहगार या बेगुनाह अपराधी मर भी जाएं तो उसकी बधाई भी अफ़सर लोग सबसे पहले मियां शहबाज़ शरीफ़ को देते हैं, 'वाह-वाह सर क्या पुलिस मुकाबला हुआ है आपके दौर में'.

बेवा को सिलाई मशीन भी दें तो उनका बस नहीं चलता कि इस मशीन पर अपनी तस्वीर जड़ दें, बल्कि हो सके तो यह सिलाई मशीन भी अपने हाथों खुद को देके बेवा को सेल्फ़ी दे दें.

इमरान ख़ान
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इमरान ख़ान

मोबाइल बन गया लोकतंत्र

ये जो बड़े-बड़े मंसूबे हैं कि जिनका जनता की मुसीबतें कम करने से दूर का भी लेना-देना नहीं, ये भी सरकारों की सेल्फ़ियां ही तो हैं.

जैसे आपके यहां बुलेट ट्रेन और सरदार पटेल का स्टैच्यू बनाने की योजना या हमारे यहां 'बेनज़ीर इनकम सपोर्ट प्रोग्राम' के तहत करोड़ों में से चंद लाख औरतों को दो हज़ार रुपल्ली महीना देना.

साढ़े तीन करोड़ से अधिक अनपढ़ रह जाने वाले बच्चों की मौजूदगी में 20-25 दानिश स्कूल बना देने की योजना या अस्पतालों के कॉरीडोर में पड़े मरीजों की देखरेख बेहतर बनाने पे खर्च करने की बजाय दो तीन ट्रॉमा सेंटर और तीन चार बर्न वार्ड बना देने की योजना.

अस्पताल
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अस्पताल

अब तो मुझे लोकतंत्र भी वो मोबाइल लगने लगा कि जिससे नेता लोग अपने पीछे हुजूम खड़ा करके सेल्फ़ी बनाते हैं और फ़िर बताते हैं कि हमें कितना समर्थन है और इस समर्थन के आधार पे अगले पांच वर्ष में और कितनी सेल्फ़ियां लेने का अधिकार मिल गया है.

जहां सेल्फ़लेस होने की ज़रूरत है वहां सेल्फ़ी से काम निकाला जा रहा है.

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