कैसे कर्नाटक के झटके से उबरने के लिए रणनीति बदलेगी बीजेपी? विधानसभा चुनावों में दिखेगा असर

कर्नाटक में भाजपा को जो करारी हार मिली है, उससे पार्टी को लगता है कि सीख मिल गई है। इसका प्रभाव इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों में दिख सकता है। स्थानीय मुद्दों पर फोकस बढ़ेगा।

इस साल पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। पिछले महीने हुए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को जैसा झटका लगा है, वह पिछले काफी समय में सबसे बड़ा है। इसलिए पार्टी आने वाले विधानसभा चुनावों में अपनी रणनीति में बदलाव लाना चाहती है।

कर्नाटक में बीजेपी ने केंद्र सरकार की योजना को आगे रखकर चुनावी रणनीतियां बनाई थीं। लेकिन, एचटी की एक रिपोर्ट के मुताबिक भाजपा के रणनीति में बदलाव की जानकारी रखने वाले पदाधिकारियों का कहना है कि अब पार्टी राज्य सरकार के कार्यों को आगे रखकर वोटरों के पास पहुंचेगी।

BJP changed strategy

5 में 3 राज्य में विपक्ष की सरकार
इस साल जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे, उनमें से भारतीय जनता पार्टी के लिए महत्वपूर्ण बात ये है कि सिर्फ एक ही राज्य (मध्य प्रदेश) में उसकी अपनी सरकार है। एक राज्य (मिजोरम) में वह सरकार में सहयोगी है। बाकी तीन राज्यों में दो में कांग्रेस (राजस्थान और छत्तीसगढ़) और एक (तेलंगाना) में भारत राष्ट्र समिति की सरकार है। मिजोरम में भाजपा की सहयोगी मिजो नेशनल फ्रंट की सरकार है।

कर्नाटक में कहां हुई चूक?
बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता ने नाम नहीं जाहिर होने देने के अनुरोध कर कहा कि कर्नाटक में केंद्र सरकार की योजनाओं पर 'अत्यधिक निर्भरता' और राज्य सरकार के कार्यों को पीछे रखने से 'डबल इंजन' वाली सरकार का जो लाभ मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला।

'कर्नाटक का परिणाम बहुत ही निराशाजनक है'
भाजपा के उस वरिष्ठ नेता के मुताबिक, 'हाल के समय में कर्नाटक का परिणाम बहुत ही निराशाजनक है। दिसंबर में जब हम हिमाचल प्रदेश हारे थे, तो अंतर बहुत ही कम था। लेकिन, कर्नाटक ने हमारे चुनाव अभियान की कमियों को उजागर किया है, जिससे कांग्रेस को न सिर्फ काफी ज्यादा सीटें ही मिली हैं, बल्कि वोट शेयर भी बढ़ा है।'

कर्नाटक में 224 सीटों वाली विधानसभा में भाजपा को 66 सीटें मिली हैं और वोट शेयर करीब 36% के पास रहा है, जबकि कांग्रेस 42.9% वोट के साथ 135 सीटें जीती है। इस समय भाजपा में आगे के चुनावों की तैयारियों को लेकर लगातार मंथन चल रहा है, जिसमें भाजपा-शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों और उपमुख्यमंत्रियों की बैठकें भी शामिल हैं।

प्रदेश के नेताओं को राज्य के मसलों पर फोकस करने को कहा
पार्टी के एक और नेता ने भी नाम नहीं बताने का आग्रह कर कहा, 'प्रदेश के नेताओं तक यह बात पहुंचा दी गई है कि केंद्रीय नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों को केंद्रीय योजनाओं के बारे में बोलने दें, और विधायकों, कॉर्पोरेटरों और प्रदेश-स्तरीय नेताओं को विधानसभा स्तर पर राज्य सरकार की ओर से किए गए कार्यों पर फोकस करना चाहिए।'

'राज्य के मसलों को प्राथमिकता दें'
पार्टी के दूसरे पदाधिकारी ने एक चुनावी राज्य में हाल ही में हुए जनसंपर्क अभियान के बारे में कहा, 'एक चुनाव क्षेत्र के कुछ लोगों से बात हो रही थी और स्थानीय स्तर पर एमएलए फंड से हुए कार्यों पर खर्च का ब्योरा देने की जगह एमएलए केंद्र की बड़ी योजनाओं के बारे में बात करते रहे, जिसका स्थानीय स्तर पर लोगों को फायदा मिला होगा, लेकिन आवश्यक नहीं है कि यह उनकी प्राथमिकता हो। '

'लोकलुभावन वादों में वोटरों को खींचने की क्षमता'
वैसे पार्टी विपक्ष की मुफ्त बिजली, महिलाओं के लिए फ्री की योजनाएं और पुरानी पेंशन स्कीम बहाल करने के लोकलुभावन योजनाओं की काट के लिए केंद्र सरकार की योजनाओं से लाभार्थियों को मिले फायदे को लोगों तक पहुंचाएगी। भाजपा नेता कहा, 'हालांकि बीजेपी लोगों को सशक्तिकरण और रेवड़ियों में अंतर बताने के लिए बहुत मुश्किल कोशिश कर रही है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि विपक्ष की ओर से किए जाने वाले वादों में वोटरों को खींचने की क्षमता है।'

उन्होंने कहा, 'इसलिए, लोगों को यह बताना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि कैसे हर घर नल या पीएम आवास योजना जैसी केंद्रीय और राज्य सरकार की योजनाओं ने लोगों को रेवड़ी देने के बजाय सशक्त बनाया है, क्योंकि वे आखिरकार सरकारी खजाने और लोगों पर बोझ बनेंगे।'

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