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BJP President: पहली महिला अध्यक्ष के नाम पर कहां फंस गया पेंच? जानें संघ ने किन बातों पर जताई थी आपत्ति

BJP President: बीजेपी के नए अध्यक्ष को लेकर अटकलों का दौर अभी खत्म नहीं हो रहा है। हालांकि, सूत्रों के मुताबिक नाम पर सहमति बन गई है और मानसून सत्र से पहले इसका ऐलान कर दिया जाएगा। बीजेपी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि हरियाणा के पूर्व सीएम और अभी मोदी कैबिनेट में शहरी विकास मंत्रालय संभाल रहे मनोहर लाल खट्टर पार्टी के अगले अध्यक्ष हो सकते हैं।

अध्यक्ष पद के लिए कई नामों की चर्चा हुई थी। इसमें पहली महिला अध्यक्ष के नाम की भी चर्चा हुई थी। हालांकि, संघ और पार्टी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि इस पर सहमति नहीं बनी और शुरुआती चर्चा से आगे बात नहीं बढ़ सकी।

BJP President

शुरुआती चर्चा से आगे नहीं बढ़ी बात

संघ से जुड़े सूत्रों का कहना है कि वरिष्ठ पदाधिकारियों ने भी इच्छा थी कि महिला आरक्षण और नारी शक्ति जैसे मुद्दों को देखते हुए पार्टी को पहली महिला अध्यक्ष मिलने पर सहमति जताई थी। हालांकि, जिन नामों को आगे बढ़ाया उस पर सहमति नहीं बनी। सूत्रों का कहना है कि संगठन बनाने की क्षमता, हिंदी भाषी क्षेत्रों में पकड़ जैसे कई मुद्दों को देखते हुए महिला अध्यक्ष को लेकर बात शुरुआती चर्चा से आगे नहीं बढ़ सकी।

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BJP President: इन वजहों से महिला अध्यक्ष के नाम पर नहीं बनी सहमति

⦁ बीजेपी से जुड़े सूत्रों का कहना है कि महिला अध्यक्ष के लिए जिन तीन नामों की चर्चा हुई थी उसमें निर्मला सीतारमण, आंध्र प्रदेश भाजपा की पूर्व अध्यक्ष डी. पुरंदेश्वरी और कोयटंबूर दक्षिणी सीट से बीजेपी विधायक वनाथी श्रीनिवायसन के नामों की चर्चा हुई थी। हालांकि, शुरुआती चर्चा के बाद आगे की बात नहीं बढ़ी।

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⦁ महिला अध्यक्ष के नाम पर सहमति नहीं बन सकने की वजह थी कि संघ का मानना है कि पार्टी अध्यक्ष का पद उसी नेता को मिलना चाहिए जिसमें संगठन क्षमता और संगठन में काम करने का अनुभव हो। तीनों महिला नेताओं के पास राष्ट्रीय स्तर पर संगठन में काम करने और बड़ी जिम्मेदारी निभाने का अनुभव नहीं था।

⦁ साथ ही, हिंदी पट्टी के क्षेत्रों में पार्टी की पकड़ मजबूत करने के तथ्य को ध्यान में रखते हुए भी महिला अध्यक्ष के नाम पर बात आगे नहीं बढ़ सकी। जिन तीन नामों की चर्चा हुई वो तीनों महिला नेता दक्षिण भारतीय प्रदेशों से आती हैं।

⦁ अध्यक्ष का चुनाव करते हुए संघ ने सुझाव दिया था कि चुनावी गणित और जातिगत समीकरणों के बजाय संगठन और प्रशासनिक क्षमता, कार्यकर्ताओं से संवाद और चुनावी रणनीति बनाने में महारथ जैसे तथ्यों को ध्यान रखा जाना चाहिए।

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