चुनाव से पहले BJP चार राज्यों में बदल चुकी है मुख्यमंत्री, सिर्फ एक में हारी, हरियाणा में क्या होगा?

लोकसभा चुनावों और इसी साल अक्टूबर-नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले बीजेपी ने हरियाणा में मुख्यमंत्री बदलने का जो दांव चला है, उसे बीजेपी पिछले कुछ वर्षों में चार राज्यों में आजमा चुकी है। पार्टी के लिए इसकी सफलता की दर 75% है।

हरियाणा से पहले भारतीय जनता पार्टी चार राज्यों- त्रिपुरा, गुजरात, उत्तराखंड और कर्नाटक में विधानसभा चुनावों से ठीक पहले मुख्यमंत्री बदलने वाला प्रयोग कर चुकी है और सिर्फ कर्नाटक में ही उसकी दाल नहीं गल पायी थी। वहां चुनावों के बाद वह सत्ता में वापस नहीं लौट सकी।

bjp and cm change

त्रिपुरा में सत्ता में रही काबिज
2018 में त्रिपुरा में भाजपा ने प्रचंड जीत दर्ज करके लेफ्ट का वर्षों का साम्राज्य ध्वस्त कर दिया था। बिपल्ब देब को राज्य में भाजपा का पहला मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला। लेकिन, विधानसभा चुनाव से कुछ महीने पहले पार्टी ने कांग्रेस से आए डॉ माणिक साहा को सीएम बना दिया।

2023 में भाजपा ने साहा की अगुवाई में फिर से सरकार बना ली। बिपल्ब देब तब से पार्टी संगठन से जुड़े हुए हैं और अभी हरियाणा के प्रभारी महासचिव हैं।

गुजरात में तो तोड़ दिए सारे रिकॉर्ड
2017 के विधानसभा चुनाव में जब गुजरात में भाजपा की जीत का सिलसिला बरकरार रहा तो पार्टी ने विजय रुपानी को सीएम बनाया। लेकिन, राज्य से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के होने के बावजूद भी जब पार्टी को विधानसभा चुनावों में प्रदर्शन को लेकर संदेह हुआ तो 2021 के सितंबर में रुपानी की जगह भूपेंद्र पटेल को मुख्यमंत्री बना दिया गया।

गुजरात में भाजपा की जीत के लिए पीएम मोदी का चेहरा ही काफी रहा है। लेकिन, फिर भी पार्टी ने कोई जोखिम नहीं लिया। क्योंकि, पार्टी को पता था कि गुजरात में चूक का देशव्यापी मतलब क्या है! दिसंबर 2022 में विधानसभा चुनाव हुए तो भाजपा ने राज्य में जीत के सारे रिकॉर्ड तोड़ डाले।

उत्तराखंड में भी चल गया दांव
सीएम का चेहरा बदलने वाला दांव भाजपा के लिए उत्तराखंड में सबसे ज्यादा सफल माना जा सकता है। 2017 के चुनाव के बाद पार्टी ने त्रिवेंद्र सिंह रावत को मुख्यमंत्री बनाया। करीब चार साल बीतते-बीतते पार्टी को भारी एंटी-इंकंबेंसी का डर सताने लगा। विधायकों में भी नेतृत्व को लेकर असंतोष बढ़ रहा था।

10 मार्च, 2021 को तीरथ सिंह रावत को सीएम की कुर्सी सौंपी गई। लेकिन, पार्टी को चार महीने में ही लग गया कि उनकी बदौलत शायद चुनाव के बाद सरकार बचाना संभव नहीं है।

4 जुलाई, 2021 को पुष्कर सिंह धामी को बागडोर सौंपी गई। शायद ही किसी को अंदाजा था कि धामी हवा का रुख बदलने में सफल होंगे। मार्च 2022 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा बड़ी जीत के साथ सत्ता पर काबिज रही। त्रिवेंद्र सिंह रावत इस बार हरिद्वार से लोकसभा उम्मीदवार बनाए गए हैं।

कर्नाटक में साबित हुआ फ्लॉप शो
दक्षिण भारत में सिर्फ कर्नाटक को ही अब बीजेपी का गढ़ माना जाने लगा है। यहां पार्टी ने विधानसभा चुनाव से करीब एक साल चार महीने पहले वरिष्ठ नेता बीएस येदियुरप्पा की जगह बसवराज बोम्मई को सीएम की कुर्सी पर बिठा दिया।

2023 के मई में विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस ने भाजपा को कुर्सी से बेदखल करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी। बोम्मई सरकार पर भ्रष्टाचार के जबर्दस्त आरोप लगाए गए। चुनावी रेवड़ियों का एलान किया गया।

उधर भाजपा एंटी-इंकंबेंसी की काट ही तलाशती रह गई और पार्टी में नाराज नेताओं की लिस्ट लंबी होती चली गई। कई दिग्गज तो आखिरी वक्त में टिकट के चक्कर में पाला बदलकर निकल लिए। कांग्रेस को जबर्दस्त जीत मिली और मुख्यमंत्री बदलने वाला भाजपा का प्रयोग कर्नाटक में बुरी तरह फ्लॉप साबित हुआ।

हरियाणा में क्या होगा?
हरियाणा में तो बीजेपी ने लोकसभा चुनावों के एलान से कुछ ही हफ्ते पहले मनोहर लाल खट्टर को हटाकर नायब सिंह सैनी को सीएम बनाया है।

खट्टर 9 साल से ज्यादा समय से मुख्यमंत्री थे और एक दिन पहले ही द्वारका एक्सप्रेसवे के उद्घाटन के मौके पर पीएम मोदी ने उनकी जमकर तारीफ की थी।

सैनी के माध्यम से बीजेपी ने एक तो खट्टर सरकार के खिलाफ करीब 10 वर्षों की एंटी-इंकंबेंसी को काटने की कोशिश की है, वहीं ओबीसी सीएम बनाकर जातीय समीकरण मजबूत करने की चाल भी चली है। उनकी पहली अग्निपरीक्षा लोकसभा चुनाव में ही नजर आने वाला है।

खट्टर अब करनाल से लोकसभा चुनाव में भाग्य आजमाते नजर आएंगे। 2014 में वे पहली बार एमएलए बनकर ही मुख्यमंत्री बन गए थे।

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