बिहार: कब होगी परीक्षा और कब आएगा रिज़ल्ट, हज़ारों छात्रों का भविष्य अधर में

ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी की छात्रा अम्बिका रश्मि
VISHNU NARAYAN/ BBC
ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी की छात्रा अम्बिका रश्मि

"मेरा चयन एयरफोर्स में हो रहा था लेकिन बीए के अंतिम वर्ष की परीक्षा देर से होने से मेरा सपना भी पूरा नहीं हुआ और मेरी मेहनत का भी कोई मतलब नहीं रह गया."

बिहार की अम्बिका रश्मि ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी, दरभंगा की छात्रा हैं. इस वर्ष उन्होंने बीए (ऑनर्स) अंतिम साल की परीक्षा दी है.

लेकिन रश्मि निराश हैं. उनका कहना है कि उनका चयन एयरफोर्स में हो रहा था और डॉक्यूमेंट जमा करने की तारीख़ 30 मई, 2022 दी गई थी. लेकिन जब उन्होंने परीक्षा की स्थिति के बारे में बताया तो उनसे एक अंडरटेकिंग मांगा गया (जो विश्वविद्यालय ने दिया भी). इसके अनुसार परीक्षा जून के आख़िरी हफ़्ते में ख़त्म होनी थी, वहीं परिणाम जुलाई में आने थे.

लेकिन अंडरटेकिंग के हिसाब से जिस परीक्षा का रिज़ल्ट जुलाई तक आ जाना था, वो सितंबर में शुरू ही हुई. रिज़ल्ट का तो अभी तक अता-पता नहीं है. रश्मि कहती हैं कि इस कारण उनकी मेहनत बर्बाद चली गई है.

परीक्षा में देरी की कुछ इसी तरह की शिकायत मगध विश्वविद्यालय, बोधगया के छात्र कुणाल किशोर करते हैं.

उनका कहना है कि मौजूदा स्थिति इतनी भयावह है कि परीक्षा कब होगी, कॉपी कब जांची जाएगी, इसकी जानकारी किसी के पास नहीं है. ऐसे में स्टूडेंट्स के पास आंदोलन के अलावा कोई और विकल्प नहीं है.

बिहार के अलग-अलग विश्वविद्यालयों में पढ़ाई कर रहे सैकड़ों छात्रों की ये कहानी है.

कहा जाता है कि छात्रों पर प्रदेश और देश का भविष्य टिका होता है. लेकिन बीबीसी ने बिहार की राजधानी पटना से, मुज़फ़्फ़रपुर, गया और दरभंगा तक की यात्रा की और ये पाया कि विश्वविद्यालयों में सेशन लेट होने की समस्या दशकों से चली आ रही है और ये बदस्तूर अब भी जारी है.

इस समस्या की वजह से सूबे के कई विश्वविद्यालयों के स्टूडेंट्स का कहना है कि वे अपने लिए आगे की योजना बना ही नहीं पाते. ग़ौरतलब है कि कि बिहार में अगस्त महीने में ही नई सरकार का गठन हुआ है.

शिक्षा मंत्रालय का क्या कहना है?


बीबीसी ने जब इस बारे में शिक्षा मंत्री चंद्रशेखर से बात की तो उन्होंने कहा, "देखिए सरकार का काम है शिक्षकों की कमी को पूरा करना. उस दिशा में सरकार काम कर रही है. सरकार लगभग 4,000 खाली पदों की भर्ती पर काम कर रही है. इसके लिए इंटरव्यू लगातार जारी हैं."

वो कहते हैं, "मेरा यह कहना है कि सरकार ने यूनिवर्सिटी का अब तक कोई पैसा नहीं रोका है. वहां वेतन का कोई मामला भी नहीं है. प्रशासनिक स्तर पर गड़बड़ियां हैं."

"चूंकि चांसलर ऑफ़िस ऑटोनोमस बॉडी है तो वहां सरकार का हस्तक्षेप न के बराबर है. उस स्थिति में सरकार कोई स्पष्ट बात नहीं कह सकती. मेरा यह कहना है कि विश्वविद्यालय स्तर पर होने वाली गड़बड़ियों के लिए हम पत्राचार करेंगे. वाइस चांसलर से रिक्वेस्ट करेंगे, उनमें कोई नैतिकता होगी तो वे हमारा काम करेंगे."

रिपोर्ट करने के दौरान विश्वविद्यालय से देरी के बारे में कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिलने के बारे में हमने जब शिक्षा मंत्री से सवाल किया तो उनका कहना था, "देखिए एक अभियान चल रहा है. हमारी ऐसी कोशिश है कि कैसे सेशन को अपडेट किया जाए. सबको टार्गेट दिया गया है. सरकार की तरफ़ से भी रिक्वेस्ट किया गया है. मीटिंग ली गई है. पिछली सरकार के शिक्षा मंत्री ने भी मीटिंग ली थी. हम भी लेंगे, लेकिन वे ऑटोनोमस बॉडी हैं. सरकार का उन पर कोई क़ानूनी दबाव नहीं है."

सत्र देरी को लेकर पटना हाई कोर्ट में जनहित याचिका

बिहार के तमाम विश्वविद्यालयों में सेशन देरी से होना वैसे तो कोई हाल-फिलहाल की बात नहीं है लेकिन इस मसले पर पटना हाई कोर्ट में जनहित याचिका डालने वाले दिल्ली विश्वविद्यालय पूर्व छात्र विवेक राज कहते हैं, "बिहार एकमात्र ऐसा राज्य है जहां तीन साल का ग्रेजुएशन चार से पांच साल में और कई बार तो छह साल में पूरा होता है. यहां पोस्ट ग्रेजुएशन करने में आपको तीन से चार साल लग जाएंगे."

वो कहते हैं, "यह सिलसिला लगभग 30 सालों से चलता आ रहा है. सरकारें बदल जाती हैं. मुख्यमंत्री फिर से पदभार ग्रहण कर लेते हैं. मंत्रालय बदल जाते हैं लेकिन सत्र नियमित नहीं हो पाते."

विवेक राज ने कहा, "मेरे संज्ञान में यह मामला साल 2019 में आया. तब मेरे विश्वविद्यालय में कई प्रतिभावान स्टूडेंट्स को डिग्री न मिल पाने की वजह से दाखिला नहीं मिल पाया. उन्हें अगले साल फिर से प्रवेश परीक्षा देनी पड़ी और फिर उन्हें दाखिला मिला."

उन्होंने कहा, "मैंने इन्हीं सारी चीज़ों को देखते हुए पटना हाई कोर्ट में जनहित याचिका दाखिल की. इसमें तीन लोग याचिकाकर्ता हैं. इस मामले की पहली सुनवाई 29 अगस्त को हुई थी. हाई कोर्ट ने हमारी याचिका स्वीकार कर ली. हमने अपनी जनहित याचिका में 11 विश्वविद्यालयों के साथ ही बिहार सरकार और यूजीसी को पार्टी बनाया है."

सेशन में देरी पर एलएनएमयू के वाइस चांसलर सुरेन्द्र प्रताप सिंह कहते हैं, "जहां तक पूरे बिहार की बात है तो वह अलग मुद्दा है लेकिन एलएनएमयू का सेशन समय पर है. हम तीन महीने से पीछे हैं केवल. जो काम हमें जून में पूरा करना था, वह सितंबर तक पूरे हो जाएंगे. और आगे वाले सत्र को समय पर संचालित कर लेंगे."

मगध विश्वविद्यालय में सेशन देरी को लेकर रह-रहकर प्रदर्शन भी होते हैं.

जब हमने सेशन कितना लेट चल रहा है, इसकी जानकारी लेने के लिए विश्वविद्यालय के जन संपर्क अधिकारी गोपाल सिंह सेंगर से बात की तो उन्होंने कहा, "2018-21 सत्र का सेकेंड ईयर की परीक्षा हुई है. अभी रिज़ल्ट नहीं आया है. 2019-22 वाले अभी फर्स्ट ईयर में हैं."

मगध विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर सत्य रत्न प्रसाद सिंह (मनोविज्ञान) ने कहा, "यह बिहार के सबसे बड़े विश्वविद्यालयों में से एक है. कुछ समय से प्रशासनिक महकमे में भ्रष्टाचार का मामला भी आया. विश्वविद्यालय में उर्वरक स्थान परीक्षा विभाग ही है. यहीं पर छात्र का भविष्य भी है और प्रशासनिक चारागाह भी है."

"जो भी वाइस चांसलर आते हैं, अपने साथ परीक्षा एजेंसी लेकर आते हैं. इसी वजह से रजिस्ट्रेशन बाधित होता है. यह समझ नहीं आता है कि विश्व में कंप्यूटर सफल होता है और यहां अशुद्धियों की भरमार लेकर आता है. इससे स्टूडेंट्स परेशान होते हैं."

नेशनल इंस्टीट्यूशन रैंकिंग फ्रेमवर्क में कहां है बिहार?


यहां हम आपको बताते चलें कि केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय हर साल देश के 100 सर्वश्रेष्ठ शिक्षण संस्थानों के लिहाज़ से एक लिस्ट जारी करता है.

साल 2022 के जुलाई माह में भी मंत्रालय ने एनआईआरएफ़ के हवाले से एक ऐसी ही लिस्ट जारी की, लेकिन उस लिस्ट में बिहार का एक भी विश्वविद्यालय या संस्थान जगह नहीं बना पाया.

आपको इस बात पर आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि क्रेंद्रीय विश्वविद्यालय बनने की चाहत रखने वाले पटना विश्वविद्यालय ने इसके लिए आवेदन तक नहीं किया.

जब इस संदर्भ में हमने पटना विश्वविद्यालय डीन ऑफ़ स्टूडेंट्स वेलफ़ेयर प्रोफ़ेसर अनिल कुमार से बात की तो उन्होंने कहा, "इस रैंकिंग के लिए निश्चित रूप से हमने पहले कभी नहीं अप्लाई किया, लेकिन इस बार किया है."

वहीं जब हमने उनसे पटना यूनिवर्सिटी के अलग-अलग कोर्सेस के सेशन में होने वाली देरी को लेकर सवाल किए तो उन्होंने कहा, "पटना यूनिवर्सिटी में सेशन लेट होने की वैसी कोई समस्या नहीं है. जो थोड़ी-बहुत देरी है भी वो कोविड की वजह से हुई, लेकिन ऐसा तो पूरे देश में हुआ. दिल्ली विश्वविद्यालय तक में सेशन लेट हुए. हमारे यहां आम तौर पर सत्र देर से नहीं चलते. हम इस मामले में अप-टू-डेट रहते हैं."

वो कहते हैं, "कुछ वोकेशनल कोर्सेस जैसे मास कम्युनिकेशन में सत्र ज़रूर लेट हैं, लेकिन हम उसे भी जल्द ही नियमित कर लेंगे. हमने उसे काफी हद तक सुधार भी लिया है. हम दिसंबर 2022 तक सारे कोर्सेस पटरी पर ले आएंगे."

राज भवन में होती बैठकें, लेकिन हासिल क्या हुआ?


सूबे के राज्यपाल सह कुलाधिपति फागू चौहान के निर्देश पर जुलाई महीने में सभी परंपरागत विश्वविद्यालयों के कुलसचिवों एवं परीक्षा नियंत्रकों की बैठक आयोजित हुई.

इस बैठक में विश्वविद्यालय की लंबित परीक्षाओं, डिग्री का वितरण, सत्र नियमित करने, विश्वविद्यालय एवं उनके अंतर्गत आनेवाले महाविद्यालयों की समीक्षा की गई.

बैठक के दौरान ऐसे निर्देश जारी किए गए कि "सभी परीक्षाएं समय पर ली जाएं और उनका परिणाम समय से घोषित किया जाए."

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