पटना में बाढ़ : बरसात की बेरहम रात और खौफ के वो 96 घंटे
नई दिल्ली। बिहार की राजधानी पटना। बारिश का ऐसा विकराल रूप पहले कभी न देखा। खौफ के उन 96 घंटों को भूलना नामुमकिन है। किसी डरावने राक्षस की गर्जना थी वो बरसात। पिछले चार दिनों से बारिश थमी हुई है। लेकिन जिंदगी अभी भी नर्क है। पटना के कई इलाकों में हजारों लोग अभी भी चार से पांच फीट पानी में फंसे हुए हैं। पानी निकल रहा है लेकिन बहुत धीरे-धीरे। जरूरत के हिसाब से खाना-पानी मुहाल है। लोग परेशान हैं। जल जमाव वाले इलाकों में एहतियात के तौर पर बिजली काट दी गयी है। जिसकी वजह से हजारों लोगों की रात अंधेरी हो गयी है। जमा हुआ पानी सड़ कर काला हो गया है। दुर्गंध से जीना मुहाल है। त्राहिमाम कर रहे पटना को देखने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार मंगलवार को खुद पानी में उतरे। घुटनों तक पाजामा मोड़ा और पहुंच गये सैदपुर संप हाउस। उन्होंने वहां पानी निकालने की कोशिशों का जायजा लिया। अफसरों को ये कहा, वो कहा, वगैरह, वगैरह।
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हजारों लोग पानी में फंसे
मंगलवार से पहले कभी पटना में हेलीकॉप्टर से बाढ़ राहत सामग्री गिरते नहीं देखा था। वो मंजर भी देख लिया। दोपहर में हेलीकॉप्टर की गड़गड़ाहट से इस बात की तस्दीक हो गयी कि सरकार पानी में फंसे लोगों का ख्याल रखने आ गयी। जिला प्रशासन के मुताबिक 6 हजार 270 फुड पैकेट पानी में फंसे लोगों के बीच गिराया गया। सोमवार को भी भी करीब एक-डेढ़ हजार फूड पैकेट गिराये गये थे। सोमवार को लोगों ने शिकायत की थी कि सड़ा हुआ आलू दिया गया था। इस शिकायत के बाद मुख्यमंत्री ने मंगलवार को अपनी निगरानी में खाद्य सामग्री बंटवायी। पटना के राजेन्द्र नगर, सैदपुर, बहादुरपुर, कांकड़बाग में मंगलवार की शाम तक चार फीट पानी जमा था। पाटलिपुत्र कालोनी, राजीव नगर, पटेल नगर, सचिवालय कालोनी, यारपुर, इंदिरा नगर, संजय नगर, अशोक नगर, रामकृष्ण नगर की स्थिति भी कमोबेश यही है। पटना से सटे दानापुर के चित्रकूट नगर में कमर तक पानी है। इस बार पटना के लगभग सभी मुहल्ले बाढ़ की चपेट में हैं। क्या वीआइपी एरिया और क्या स्लम एरिया, बाढ़ ने किसी को नहीं बख्शा।

सरकार की लापरवाही
इस बार पटना में आसमान से आफत तो आयी ही, मानव निर्मित गलतियों ने स्थिति को और भयंकर बना दिया। पूरे पटना में बाढ़ की अलग-अलग वजह रही। राजेन्द्र नगर और कदमकुआं में पंप हाउस नहीं चलने से जलजमाव हुआ। यहां पंप का मोटर पानी में डूब गया था जिससे वह स्टार्ट नहीं हुआ। कंकड़बाग और पाटलिपुत्र कालोनी में नाला उड़ाही का काम ठीक से नहीं हुआ। कई मेनहोल जाम थे। पटेल नगर और इंद्रपुरी मुहल्ले में सड़क बनाने के लिए पुराना नाला भर दिया गया था। योगीपुर और कंकड़बाग के संप हाउस के मोटर कम क्षमता के थे जिससे जल निकाली का काम बहुत धीमा हुआ। ठीक से उड़ाही नहीं होने के कारण पाटलिपुत्र और कंकड़बाग का नाला जाम हो गया था। इस इलाके में ड्रेनेज सिस्टम पूरी तरह फेल था। इतना ही नहीं मौसम विभाग के अलर्ट के बाद भी आपदा प्रबंधन विभाग और नगर विकास विभाग ने समय रहते तैयारी नहीं की थी। इन विभागों के बड़े अफसरों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को गलत सूचनाएं दी थीं। इसलिए सरकार की आधी-अधूरी तैयारी और लापरवाही भी इस त्रासदी के लिए जिम्मेवार है।

1975 में भी ऐसी न थी बाढ़
पिछले 30-35 साल से पटना में बरसात के समय शहर की सूरत बिगड़ जाया करती है। जलजमाव यहां की स्थायी समस्या है। कभी कम, कभी ज्यादा। हर साल नाला उड़ाही के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, लेकिन ये बीमारी आज तक ठीक नहीं हुई। पिछले दो-तीन साल से पटना की इज्जत इसलिए बची हुई थी क्यों कि बारिश कम हो रही थी। लेकिन इस बार 45 साल बाद बरसात ने अपना रौद्र रूप दिखाया। बेशक ये प्रकृति का कहर था। लेकिन अगर तैयारी रहती तो इसकी तबाही कम हो सकती थी। अब तक यही माना जाता है कि 1975 की बाढ़ पटना में सबसे भयावह थी। लेकिन तब और अब के दौर देख चुके लोगों का कहना है 2019 की बाढ़ ने पिछले रिकॉर्ड को तोड़ दिया है। 1975 में पटना के लंगरटोली, मछुआ टोली और काजीपुर में पानी नहीं चढ़ा था। लेकिन इस बार ये सारे मुहल्ले पानी से घिरे हुए हैं।












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