चीन ऐसे निपटा था प्रदूषण से, दिल्ली भी पा सकता है निजात
नई दिल्ली को भी बीजिंग से सीखने की जरूरत है। बीजिंग में पीएम 2.5 के लेवल में 2013-2015 के बीच करीब 30 फीसदी की गिरावट आई है।
नई दिल्ली। इन दिनों दिल्ली में प्रदूषण एक खतरा बन गया है। एक वक्त था जब चीन की राजधानी बीजिंग का भी ऐसा ही हाल हो गया था, लेकिन पिछले कुछ सालों में वहां का प्रदूषण बहुत तेजी से कम हुआ है।

नई दिल्ली को भी बीजिंग से सीखने की जरूरत है। बीजिंग में पीएम 2.5 के लेवल में 2013-2015 के बीच करीब 30 फीसदी की गिरावट आई है। 2016 में यह आंकड़े कुछ मिक्स हैं, लेकिन अगले साल चीन का सही आंकड़ा सामने आएगा। आपको बता दें कि 2017 को टारगेट करके ही चीन ने प्रदूषण कंट्रोल करने का प्लान बनाया था।
बीजिंग म्यूनिसिपल एनवायरमेंट मॉनिटरिंग सेंटर के डेटा के हिसाब से पीएम 2.5 में इस साल अगस्त तक 12.5 प्रतिशत की कमी आ चुकी है। भारत के प्रदूषण में ऐसी कटौती अभी नामुमकिन लगती है, लेकिन अगर बीजिंग ऐसा कर सकता है, तो दिल्ली भी ऐसा कर सकता है।
ग्रीनपीस के प्रदूषण एक्सपर्ट लौरी मिल्लिविरता के अनुसार आप भले ही आप इंडस्ट्रियल प्रदूषण की बात करें, फसल जलाने की बात करें या गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण की बात की जाए, हर मामले में दिल्ली बीजिंग के जैसा ही है। इन शहरों में अधिकतर प्रदूषण बाहर से आता है। आईआईटी दिल्ली की एक स्टडी के अनुसार करीब 60 से 90 फीसदी प्रदूषण बाहर से आता है। दोनों ही शहरों में प्रदूषण का स्रोत लगभग एक ही है।
मिल्लिविरता के अनुसार चीन के प्रदूषण का मुख्य कारण हैवी इंडस्ट्री और पावर थे। भारत में थर्मल पावर प्लांट फिलहाल के प्रदूषण में अपनी कोई बड़ी भूमिका नहीं निभा रहे हैं, लेकिन हाल ही के कुछ सालों बढ़ते प्रदूषण में इसने अपनी जगह बनाना शुरू कर दिया है।
मिल्लिविरता ने एक उदाहरण देते हुए कहा हाल ही में बताए गए वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन अम्बिएंट एयर पॉल्यूशन डेटाबेस के हिसाब से 2012 में दिल्ली में पीएम 2.5 का स्तर 122ug/m3 था, जबकि बीजिंग में 2014 में यह स्तर 85ug/m3 था। जैसा कि बताया गया है, बीजिंग में प्रदूषण में लगातार कमी आई है, जबकि दिल्ली का प्रदूषण बढ़ा है।
बीजिंग ने प्रदूषण से लड़ने के लिए क्या किया?
2013 से लेकर अब तक वायु प्रदूषण को कंट्रोल करने के लिए चीन ने बिजली पर काफी फोकस किया है। कोयले के इस्तेमाल को बहुत अधिक कम कर दिया है और बिजली के लिए गैर जीवाश्म ऊर्जा का इस्तेमाल किया जा रहा है।
जिन उद्योगों में कोयले का इस्तेमाल होता है, उसके लिए सख्त कानून बने हैं, जिसको सख्ती से लागू भी किया गया है और लगातार नजर रखी जाती है।
कंस्ट्रक्शन साइट से उड़ने वाली धूल को कंट्रोल करने के लिए कड़े नियम बनाए गए हैं। साथ ही सड़कों पर कारों की संख्या को भी सीमित करने पर जोर दिया।












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