बढ़ा के प्‍यास मेरी ...... गजल सम्राट जगजीत सिंह ने शो में सुनाए थे ये जीवन के दिलचस्‍प किस्‍से

Today is the birthday of Ghazal Samrat, know the unseen songs related to his life which he narrated during the Ghazal show. Jagjit Singh's struggle related to life, गजल सम्राट का आज बर्थडे हैं जानें उनके जीवन से जुड़े अनसुने किस्‍सें जो उन्‍होंने गजल शो के दौरान सुनाए थे। जगजीत सिंह का जीवन से जुड़

बेंगलुरु। अपनी जादुई आवाज और अंदाज से सारे जग को जीत लेने वाले हर दिल अजीज ग़ज़ल सम्राट जगजीत सिंह हम सभी के दिल में बसते हैं। आज उनका 79वां जन्मदिवस हैं वो भले ही हमारे बीच नहीं हैं लेकिन वो अपनी गजलों से आज भी हम सबके बीच मौजूद हैं। चिट्टी न कोई संदेश जाने वो कौन सा देश जहां तुम चले गए.... गाने में जगजीत सिंह की आवाज सुनकर हर किसी की आंखें, किसी अपने को याद कर सदा नम हो जाती है। दरअसल जगजीत सिंह ने ये गीत अपने जवान बेटे की आकस्मिक मौत के बाद गाया था। इस गाने में जो दर्द है था वो उनके एकलौते बेटे का अचानक खो देने का गम था।

jageetsingh

प्‍यार की गिरफ्त में हो या लॉग ड्राइव पर कभी आप अकेले निकले हो, वो जगजीत सिंह के गाने और गजलें ही तो थी जिन्‍होंने घंटों आपकी तन्‍हाई बांटी होगी और बांटते रहेंगे। उनके फैन उन्‍हें याद कर ये ही गुनगुनाते हैं बढ़ा के प्यास मेरी उसने हाथ छोड़ दिया'। जगजीत सिंह ऐसी ही मखमली आवाज के जादूगर थे जिसको सुनते हुए श्रोता डूब सा जाता है। आज उनका गाया चिट्टी न कोई संदेश....गाने की पक्तियां उन्‍हें एक श्रद्धांजलि की तरह ही हैं।

गजलों को ऐसे अंदाज से पेश किया जो लोगों के दिलों में उतर गयी

गजलों को ऐसे अंदाज से पेश किया जो लोगों के दिलों में उतर गयी

गजल किंग की उपाधि उन्‍हें ऐसे ही नहीं मिली उन्‍हें ये इस वजह से मिली थी कि क्‍योंकि उनकी ही बदौलत गजल आम आदमी तक पहुंच सकी। उससे पहले गजल उर्दू जानने वालों तक ही सीमित थी। उन्‍होंने गजलों को उस अंदाज में पेश किया जो सुनने वालों के दिलों तक उतरती चली गई। गजलों और उनके संगीत को लेकर भी जगजीत सिंह ने कई तरह के प्रयोग किए।

...लबों पर आते ही मानो उसमे चांद तारें लग जाते

...लबों पर आते ही मानो उसमे चांद तारें लग जाते

गजलों में इंडियन और वेस्‍टर्न म्‍यूजिक की मौजूदगी के साथ उनकी महकती आवाज ने कई गीतों और गजलों को भी अमर कर दिया। गुजरे दौर के शायरों से लेकर नए जमाने के शायरों की भी गजलों और गीतों को अपनी आवाज दी। बात चाहे गालिब की हो या मीर की या हो फिराक गोरखपुरी का कलाम या फिर फैज और निदा फाजली की लिखी गजलें, उनके लबों पर आते ही मानो उसमे चांद तारें लग जाते। होंठों से छू लो तुम मेरा गीत अमर कर दो........जैसेे ही जो गीत उनके होठों पर आए वो ऐसे ही अमर हो गए

कभी गर्ल्‍स कॉलेज के इर्दगिर्द ही कटता था समय

कभी गर्ल्‍स कॉलेज के इर्दगिर्द ही कटता था समय

उनके लाइव शो के टिकट खरीदने के लिए लोग घंटों लाइन में लगते थे। कई लाइव शो में उन्‍होंने अपनी जिंदगी के कई रोचक किस्‍से भी सुनाए, जिस पर लोगों ने खूब ठहाके लगाए। ऐसे ही एक शो में उन्‍होंने अपने पहले प्‍यार का भी जिक्र किया था जो परवान नहीं चढ़ सका था। उन्‍होंने बताया था कि वो एक लड़की के प्‍यार में इस कदर पागल हो गए थे कि अक्‍सर उसके घर के बाहर साइकिल की चैन टूटने या पहिये की हवा निकलने का बहाना बनाकर खड़े हो जाते थे। ये सिलसिला काफी आगे तक बढ़ा और साइकिल से जगजीत मोटरसाइकिल पर आ गए। लेकिन वो कामयाब ही जगजीत की पढ़ाई में दिलचस्‍पी कुछ कम ही थी।

पिक्चर देखने में उड़ा देते थे पूरा जेब खर्च

पिक्चर देखने में उड़ा देते थे पूरा जेब खर्च

यही वजह थी कि वह एग्‍जाम में कई बार फेल भी हुए। जैसे-तैसे कॉलेज की पढ़ाई के लिए जालंधन के डीएवी कॉलेज में एडमिशन मिला तो यहां पर भी उनका ज्‍यादातर समय गर्ल्‍स कॉलेज के इर्दगिर्द की कटता था। इसके अलावा उन्‍हें फिल्‍म देखना भी काफी पसंद था। इसके लिए अपनी जेब खर्च के पैसों का इस्‍तेमाल करते थे और कई बार ब्‍लैक में टिकट लेने की वजह से ये खत्‍म भी हो जाते थे। बहरहाल, ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्‍होंने कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से हिस्‍ट्री में पोस्‍ट ग्रेजुएशन किया।

2003 में 'पद्म भूषण' से किया गया था सम्मानित

2003 में 'पद्म भूषण' से किया गया था सम्मानित

कई भारतीय भाषाओं में अपनी गायिकी के चलते मील का पत्थर साबित हो चुके जगजीत सिंह का जन्म 8 फरवरी 1941 को राजस्‍थान के बीकानेर स्थित श्रीगंगानगर में हुआ था। पहले नाम जगजीवन सिंह था बाद में उन्होंने इसे जगजीत सिंह कर लिया था । उनकी पढ़ाई जालंधर से हुई थी। जगजीत सिंह ने 1961 में अपने करियर की शुरुआत ऑल इंडिया रेडियो में गाने से शुरू की थी भारत सरकार की तरफ से जगजीत सिंह को साल 2003 में 'पद्म भूषण' सम्मान से नवाजा गया था। वर्ष 2014 में उनके सम्‍मान में दो डाक टिकट भी जारी किए गए थे।

जगजीत सिंह, चित्रा के गुरु भी रहे

जगजीत सिंह, चित्रा के गुरु भी रहे

1965 में जगजीत सिंह अपने परिवार को बिना बताए मुंबई आ गए थे । काफी स्ट्रगल के बाद उन्‍हें गानें का मौका मिला था। 1967 में जब जगजीत काम ढूंढ रहे थे तब उनकी मुलाकात चित्रा दत्ता से हुई । चित्रा उस वक्त शादीशुदा थीं । चित्रा और जगजीत एक-दूसरे को पसंद करने लगे थे । दिसंबर 1969 में चित्रा ने अपने पति को तलाक दे दिया और जगजीत से शादी कर ली थी। चित्रा ने एक इंटरव्यू में कहा था, 'जब मैं 22 साल की थी तब मैंने पहली बार जगजीत सिंह का गाना सुना था। मुझे उनकी आवाज बिल्कुल पसंद नहीं आई थी। लेकिन धीरे-धीरे मैं उनकी आवाज की दीवानी हो गई।' जगजीत सिंह, चित्रा के गुरु भी रहे । जगजीत सिंह और चित्रा सिंह एक साथ कॉन्सर्ट करते थे। साल 1980 तक जगजीत सिंह गजल किंग बन चुके थे। प्राइवेट एलबम के साथ जगजीत ने फिल्मों में भी कई गजलें गाईं जिनमें 'प्रेम गीत', 'अर्थ', 'जिस्म', 'तुम बिन', 'जॉगर्स पार्क' जैसी फिल्में शामिल हैं।

बेटे की मौत के बाद गाना नहीं चाहते थे

बेटे की मौत के बाद गाना नहीं चाहते थे

चित्रा और जगजीत सिंह का एक बेटा विवेक था जिसकी 20 साल की उम्र में रोड एक्सीडेन्‍ट में डेथ हो गयी थी। इस घटना ने चित्रा और जगजीत सिंह को हिला कर रख दिया था। वो दोनों संगीत की दुनिया से दूर हो जाना चाहते थे । करीब एक साल तक उन्होंने कोई गाना नहीं गाया । धीरे-धीरे उन्होंने संगीत की दुनिया में फिर वापसी की। वहीं उनकी पत्नी ने बेटे की मौत से दुखी होकर कभी न गाने का फैसला सुना दिया।

गजल किंग आवाज सदा रहेगी अमर

गजल किंग आवाज सदा रहेगी अमर

साल 2011 में जगजीत सिंह को यूके में गुलाम अली के साथ परफॉर्म करना था लेकिन ब्रेन हैमरेज के कारण 23 सितंबर 2011 को उन्हें मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती कराया गया। वो करीब 2 हफ्ते तक कोमा में रहे । उनकी हालत बिगड़ती चली गई और 10 अक्टूबर 2011 को जगजीत सिंह का निधन हो गया था। भले ही जगजीत सिंह अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सदाबहार आवाज में गायी गईं गजलें आज भी लोगों के मन में ताजा हैं।

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