EXPLAINED: कैसे PM मोदी के साहसिक कदमों ने भारत में नहीं होने दिए बांग्लादेश जैसे हालात, पढें विस्तार से

बांग्लादेश में शेख हसीना के पांचवें कार्यकाल के पहले वर्ष में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के विरोध को लेकर जो हिंसक माहौल बना, भारत में पिछले एक दशक में कई बार ऐसी परिस्थितियां पैदा हो चुकी हैं। नोटबंदी से लेकर किसान आंदोलन तक कई मौके आए, जिसमें जनता का एक बड़ा तबका सरकार से परेशान नजर आता था। लेकिन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार की अगुवाई में देश ने उन हालातों का डटकर मुकाबला किया और सफलता हासिल की।

2014 में नरेंद्र मोदी की अगुवाई में जब केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी तो उसे जनता का व्यापक समर्थन प्राप्त था। वोटरों ने अच्छे दिन के उम्मीद में 'ब्रांड मोदी' पर भरोसा किया था। सत्ता में आने के बाद से ही मोदी सरकार के सामने कई ऐसे मौके आए जिससे निपटना आसान नहीं था।

impact on India

मोदी सरकार ने ही खड़ा किया जन-आंदोलन
जनता के एक बड़े वर्ग में 'समझदारी या नासमझी' की वजह से सरकार के फैसले को लेकर व्यापक विरोध था। लेकिन, मोदी सरकार ने जनता का ही सहयोग लेकर उसे सकारात्मक रूप में जन-आंदोलन में बदलने में कामयाबी पायी।

बांग्लादेश की घटनाओं पर क्या कह रहा है विपक्ष?
इस बहस की आवश्यकता इसलिए पड़ी है, क्योंकि विपक्ष से बांग्लादेश की घटनाओं को लेकर कुछ ऐसे बयान आए हैं, जो शायद भारत की जमीनी हकीकत से वास्ता नहीं रख पा रहे हैं। मसलन कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने कहा है, 'बांग्लादेश में जो हो रहा है, वह यहां भी हो सकता है.....।'

नेशनल कांफ्रेंस के नेता फारूक अब्दुल्ला ने भी बांग्लादेश की स्थिति को लेकर भारत की मौजूदा व्यवस्था पर तंज कसने की कोशिश की है। उन्होंने कहा, 'छात्रों ने एक आंदोलन शुरू किया, जिसे कोई कंट्रोल नहीं कर सका, न तो आर्मी और नहीं कोई और...यह एक सबक है। सिर्फ बांग्लादेश के लिए नहीं, बल्कि हर तानाशाह के लिए।'

नोटबंदी
नोटबंदी मोदी सरकार का पहला ऐसा फैसला था, जिससे देश की 130 करोड़ से ज्यादा की आबादी सीधे प्रभावित हुई थी। सरकार के फैसले से पूरा देश स्तब्ध था। लेकिन, आम जनता में कहीं न कहीं एक भरोसा था कि प्रधानमंत्री जो भी कर रहे हैं, उसमें आखिरकार देशहित है और उसमें जनता की ही भलाई है।

नोटबंदी के दौरान लोगों को काफी दिक्कतें हुईं। लेकिन, सरकार पर जनता का भरोसा था, इसलिए धीरे-धीरे सभी चीजें सामान्य हो गईं और कभी भी अराजकता की नौबत नहीं आई।

आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण
मोदी सरकार ने सामान्य वर्ग में आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थाओं में 2019 से 10% आरक्षण लागू किया। इसके लिए संविधान में 103वां संशोधन किया गया। भारत में सरकारी नौकरियों में आरक्षण बहुत ही संवेदनशील मसला रहा है। कुछ लोगों ने मोदी सरकार के इस कदम पर सवाल भी उठाए। लेकिन, देश सरकार के साथ चलता रहा।

यह देश 1990 का वह दौर भी देख चुका है, जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने पर एक वर्ग में निराशा का ऐसा माहौल बन गया था कि एक रिपोर्ट के मुताबिक देश में 160 से ज्यादा लोगों ने आत्मदाह की कोशिश की थी। 60 से ज्यादा लोगों की मौत पुलिस कार्रवाई या विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हुई थी।

लेकिन, ईडब्ल्यूएस कोटा लागू करने से पहले ही मोदी सरकार इसपर राजनीतिक तौर पर एक आम सहमति कायम करने में सफल रही। इसका यहां तक असर दिखा कि जब सुप्रीम कोर्ट ने इसपर मुहर लगाया तो कांग्रेस ने यह कहकर स्वागत किया कि यह कोटा लागू करने की प्रक्रिया तो असल में मनमोहन सिंह की सरकार में ही शुरू हुई थी।

आर्टिकल 370
5 अगस्त, 2019 को मोदी सरकार ने जिस तरह से जम्मू और कश्मीर से आर्टिकल 370 हटाकर उसका विशेष दर्जा खत्म किया, उससे पहले कोई सोच भी नहीं सकता था। जम्मू और कश्मीर की क्षेत्रीय राजनीतिक पार्टियों के नेता इसको लेकर पहले तरह-तरह की चेतावनी दे रहे थे। पाकिस्तान की भाषा में बोलते नजर आते थे। लेकिन, कश्मीरियों ने जिस तरह से देश और अपनी सरकार का साथ दिया, उससे पाकिस्तान से सहानुभूति रखने वालों की भी आंखें खुली रह गईं।

इतने बड़े फैसले के पीछे जो राजनीतिक सोच थी और जो सूझबूझ दिखाई गई, वह बहुत ही कारगर साबित हुई। देश के गृहमंत्री के तौर पर पीएम मोदी ने अमित शाह को यह पहला टास्क दिया था, जो सबसे चुनौतिपूर्ण था। उस साल अगस्त के पहले चार दिनों में जिस तरह से जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों की चौकसी बढ़ा दी गई थी, वह अभूतपूर्व था। लग सबको रहा था कि कुछ बड़ा होने वाला है, लेकिन जो होने जा रहा था, उसकी भनक किसी को नहीं थी।

जम्मू-कश्मीर के तमाम अलगाववादी नेताओं पर पहले ही नकेल कस दी गई थी। मुख्यधारा की राजनीति करने वाले तमाम नेताओं को अपने-अपने घरों में ही भारी सुरक्षा बंदोबस्त के बीच रख दिया गया था। पूरी कार्रवाई को खुद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल संचालित कर रहे थे।

बड़े-बड़े सुरक्षा के सूरमा भी आजतक समझ नहीं पाए कि इतना बड़ा मिशन बिना किसी हंगामें के कैसे संपन्न हो गया। वह भी उस कश्मीर में जो आए दिन सुरक्षा बलों पर पत्थरबाजी के लिए कुख्यात हो गया था। 6-7 अगस्त को ही डोभाल कश्मीर घाटी की गलियों में हालात परखने को कोशिश करते नजर आ रहे थे।

बाबरी मस्जिद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला
9 नवंबर, 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने पवित्र राम जन्मभूमि विवाद पर ऐतिहासिक फैसला दिया था। हिंदुओं के पक्ष में आए इस फैसले को लेकर पहले तरह-तरह की आशंकाएं जताई गई थीं। लेकिन, केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से पहले ही देश में ऐसा शांतिपूर्ण माहौल तैयार किया था कि सबने देश की सर्वोच्च अदालत के फैसले को सिर आंखों पर लिया और समाज के दुश्मनों के नापाक मंसूबों पर पानी फेर दिया।

सरकार की ओर से पूरे देश में लोगों तक और समाज के प्रबुद्ध वर्गों तक यह संदेश पहुंचाया गया कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला चाहे जो भी आए, उससे सामाजिक व्यवस्था पर कोई प्रभाव नहीं पड़ना चाहिए और आपस में किसी तरह की कटुता पैदा नहीं होने देना है।

बाबरी ढांचा गिरने के बाद केंद्र सरकार ने राम जन्मभूमि की विवादित 2.77 एकड़ जमीन के चारों तरफ की 70 एकड़ जमीन का अधिग्रहण कर लिया था। जैसे ही सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया 70 एकड़ का यह क्षेत्र भी शांतिपूर्ण तरीके से मंदिर ट्रस्ट को ट्रांसफर किया गया जिस पर राम मंदिर का निर्माण हुआ है।

नागरिकता संशोधन कानून (CAA)
मोदी सरकार ने उसी साल संसद से नागरिकता संशोधन कानून पास करवाया, जिस वर्ष आर्टिकल 370 हटाया गया था और कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या पर फैसला सुनाया था। नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के नाम पर जरूर देश में आंदोलन चलाया गया, जो राजधानी दिल्ली में ही हिंसक हो गया।

इसी की वजह से दिल्ली में सांप्रदायिक दंगे भी भड़के। केंद्र सरकार और अन्य राज्य सरकारों ने आंदोलन करने के मौलिक अधिकारों के तहत लोगों को अपने जज्बातों को सामने रखने का मौका भी दिया। लेकिन, जब कोविड महामारी फैली और फिर भी कुछ आंदोलनकारी हालात को समझने के लिए तैयार नहीं हुए तो सरकार ने सख्ती दिखाकर उन्हें सड़कों से अपने घरों की ओर कूच करने को मजबूर कर दिया।

इस आंदोलन के नाम पर राजनीतिक रोटियां भी सेंकी गई और शायद इस दौरान हिंसा होने की यह एक बहुत बड़ी वजह रही। लेकिन, आखिरकार सब शांत हुआ और इस साल लोकसभा चुनावों से पहले सरकार ने इसे नोटिफाई भी कर दिया और सबकुछ शांत रहा।

किसान आंदोलन
कोविड महामारी के दौरान ही कुछ किसान संगठनों की ओर से तीन कृषि कानूनों के खिलाफ राजधानी दिल्ली के आसपास और देश में कुछ अन्य स्थानों पर धरना शुरू किया। यह देश के इतिहास में सड़क पर सबसे लंबे धरने का एक उदाहरण बन गया। इस दौरान 26 जनवरी, 2021 को कुछ शरारती तत्वों ने माहौल बिगाड़ने की कोशिश भी की और ट्रैक्टर रैली निकालने के नाम पर लालकिले पर उपद्रव करने पहुंच गए।

सरकार और खासकर दिल्ली पुलिस ने बहुत ही संयम का परिचय देते हुए आंदोलनकारियों में घुस आए उपद्रवी तत्वों पर नियंत्रण रखने की कोशिश की।

किसान आंदोलन और सीएए-विरोधी आंदोलन दोनों मौकों पर अगर सरकार सख्ती दिखाती तो हालात बिगड़ सकते थे और असामाजिक तत्व और देश-विरोधी ताकतें उसी में लगी हुई थीं। लेकिन, सरकार ने इसका मौका ही नहीं आने दिया।

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