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Bahraich Violence: हिंदुओं की हत्या पर क्यों मुर्दे की तरह मौन हो जाता है पूरा अंतरराष्ट्रीय इको सिस्टम?

Bahraich Violence News in Hindi: यूपी की बहराइच में अभी मातमी सन्नाटा है। यह सन्नाटा प्रशासन की सख्ती की वजह से है। यहां 22 साल के एक युवक रामगोपाल मिश्रा की गोलियों से छलनी करके हत्या कर दी गई है। इस हत्याकांड को अंजाम देने का आरोप मुस्लिम समुदाय के लोगों पर है।

रामगोपाल का शरीर सिर्फ गोलियों से ही छलनी ही नहीं किया गया था। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक गोली मारने से पहले उसके साथ बेरहमी की इंतेहा की गई। उसके नाखून तक उखाड़ लिए गए। इतना वहशीपन सिर्फ इसलिए कि कथित तौर पर उस युवक ने एक 'हरे' झंडे को उखाड़ दिया था।

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बहराइच के रामगोपाल मिश्रा के बाद अगला कौन?
लेकिन, छोटी-छोटी घटनाओं को तिल का तार बनाने वाला पूरा अंतरराष्ट्रीय इको सिस्टम या तो शांत हो गया है या फिर उसके प्यादे पीड़ित को ही गुनहगार साबित करने में जुट चुके हैं और हत्यारों को सारे कानून और संविधान को ताक पर रखकर क्लीनचिट देने की कोशिश की जा रही है।

टारगेटेड हिंदू हत्याओं की है लंबी श्रृंखला
क्रूरता, वहशीपन, दरिंदगी, बर्बरता या पशुवत बर्ताव वाली इस कट्टरपंथी मानसिकता का शिकार अकेले रामगोपाल मिश्रा नहीं हुए हैं। बीते कछ वर्षों में इसकी एक पूरी लंबी श्रृंखला है। चाहे यूपी के कासगंज वाले चंदन गुप्ता हों या फिर दिल्ली के विकासपुरी वाले डॉ पंकज नारंग या फिर राजस्थान के उदयपुर वाले कन्हैया लाल टेलर, ये सभी इसी नापाक सोच वाली मानसिकता की वजह से अपनी जानें गंवा चुके हैं।

इसी तरह से मेरठ वाले दीपक त्यागी हों या फिर मंगलुरु के गौरक्षक प्रशांत पुजारी या फिर लखनऊ के हिंदू समाज पार्टी के नेता कमलेश तिवारी ये सारे के सारे कथित तौर पर मुस्लिम कट्टरपंथियों के हाथों अपनी जान गंवा चुके हैं। इन सबका कसूर सिर्फ इतना था कि वे हिंदू थे, सनातन धर्म का पालन करना चाहते थे, उसी को अपनी जीवनधारा बनाए रखना चाहते थे।

मुर्दे की तरह मौन हो जाता है पूरा इको सिस्टम!
लेकिन, आजतक न तो कभी इनकी जान का कोई महत्त्व संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार समिति (UNHRC) समझ पायी है और न ही अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (IHRC)। बात-बात पर भारत को अल्पसंख्यकों के मसले पर ज्ञान देने वाली अमेरिकी एजेंसियों को भी हिंदुओं के साथ हुई घटनाओं की भनक लगते ही सांप सूंघ जाता है।

इतना ही नहीं, पिछले महीनों में बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद वहां हिंदुओं के साथ जो बर्बरता शुरू हुई, वैसी खबरें आजतक आनी बंद नहीं हुई हैं। लेकिन, क्या मजाल है कि कभी अमेरिकी एजेंसियों को उन हिंदू अल्पसंख्यकों की भी चिंता हुई हो या फिर उसके दबदबे वाले कथित अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के वकीलों को ही उनका ख्याल आया हो!

अल्पसंख्यकों का रोना रोने वाला अंतरराष्ट्रीय इको सिस्टम हिंदुओं की हत्या पर मौन
लेकिन, अमेरिकी ह्यूमैन राइट्स प्रैक्टिसेज तो अपनी रिपोर्ट जारी करने के लिए जैसे बहाना ढूंढ़ता रहता है कि उसे कब भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ कथित हिंसा पर ज्ञान देकर अपने इको सिस्टम को मनगढ़ंत कहानियां देने का मौका मिल जाए। इन्हीं रिपोर्ट के आधार पर अमेरिका भी भारत को नसीहत देना शुरू कर देता है। कभी ईसाइयों के उत्पीड़न का दावा किया जाता है तो कभी मुस्लिम अल्पसंख्यकों के नाम पर रोना रोया जाता है।

न्यूज एजेंसी पीटीआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक इसी साल जुलाई के आखिर में संयुक्त राष्ट्र मानव अधिकार समिति (UNHRC) ने भारत पर अल्पसंख्यकों के साथ कथित भेदभाव और हिंसा का तोहमत लगाया था। इस अंतरराष्ट्रीय संस्था ने भारत को क्रोएशिया, होंडुरास, मालदीव, माल्टा, सूरीनाम और सीरिया जैसे मुल्कों के साथ रखकर अपनी रिपोर्ट की विश्वसनीयता को खुद ही सवालों के घेरे में ला दिया था।

लेकिन, देश का दुर्भाग्य है कि इन्हीं भारत-विरोधी एजेंडावादी अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की रिपोर्ट पर भारत में भी उसके इकोसिस्टम के लोग छाती पीटना शुरू कर देते हैं, लेकिन जब कोई हिंदू मुस्लिम कट्टरपंथ की वजह से बेमौत मारा जाता है तो यह सिस्टम या तो गुहगार को बचाने में लग जाता है या फिर कुछ दिनों तक मुर्दे की तरह शांत हो जाता है।

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