नज़रिया: गुजरात जीतने के लिए पाटीदारों को जीतना कितना ज़रूरी

गुजरात चुनाव
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गुजरात की पहली महिला मुख्यमंत्री आंनदीबेन पटेल को हटाया जाना, उसके बाद पाटीदार समुदाय में बीजेपी की पकड़ कम होना और फिर इस समुदाय के संघर्ष का हिंसक आंदोलन में बदल जाना.

इन सभी घटनाओं की वजह से पिछले दो दशक से भी लंबे समय से गुजरात की सत्ता पर काबिज़ बीजेपी आज अपनी पकड़ ढीली पड़ती महसूस कर रही है.

चुनाव का वक्त क़रीब आने पर जाति का कार्ड खेला जाता है और राजनीति अपनी धुरी बदलने लगती है. ऐसा तब होता है जब जातिगत समुदायों के नेता अपने सत्ता में बैठे राजनेताओं से कहते हैं कि अब उनकी 'कीमत' चुकाने का वक्त आ गया है.

नरेंद्र मोदी गुजरात के सबसे लंबे समय तक (4610 दिन) मुख्यमंत्री रहे. 2014 में वे प्रधानमंत्री पद के लिए चुने जाने के बाद दिल्ली रवाना हो गए.

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आनंदीबेन पटेल

मोदी ने अपने विकल्प के रूप में आनंदीबेन पटेल को चुना. पार्टी और सरकार में मोदी की मजबूत पकड़ ने किसी भी तरह की टूट और महत्वकांक्षाओं को पनपने नहीं दिया. मोदी के नेतृत्व में पार्टी के भीतर किसी भी तरह की असहमति को तुरंत प्रभाव में निपटा लिया जाता था.

लेकिन मोदी के दिल्ली जाते ही कुछ ताकतें भी खुलकर सामने आने लगीं. इस आग की चिंगारी पाटीदार नेताओं ने जलाई जो आंनदीबेन के ख़िलाफ़ थे. ऐसे में आरक्षण से बेहतर मुद्दा और क्या हो सकता था?

पार्टी के भीतर ही कई लोग इस चिंगारी को हवा देने के लिए तैयार बैठे थे. नरेंद्र मोदी के दो सबसे करीबी साथी अमित शाह और आनंदीबेन के बीच प्रतिद्वंद्विता के बारे में सभी अच्छे से जानते हैं. गुजरात में बेकाबू होते पाटीदार आंदोलन ने आनंदीबेन पटेल की गुजरात में पकड़ कमज़ोर कर दी थी.

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पाटीदारों को आरक्षण

और फिर ऊना में दलित युवकों के ख़िलाफ़ हुई हिंसा ने अमित शाह को मौका दे दिया कि वे आनंदीबेन को हटा अपने करीबी विजय रूपाणी को मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठा सकें.

शिक्षण संस्थानों और सरकारी नौकरियों में पाटीदारों को आरक्षण देने की मांग उठाने वाले हार्दिक पटेल तब एक बड़ा चेहरा बनकर उभरे, जब राज्य सरकार ने उनपर देशद्रोह का मामला चलाया और छह महीने के लिए गुजरात से बाहर चले जाने का आदेश सुना दिया.

हार्दिक ने गुजरात में ज़बरदस्त वापसी की और उसके बाद से ही वे बीजेपी के लिए हलक में अटका हुआ कांटा बने हुए हैं.

संख्या के आधार पर पाटीदारों का गुजरात में ख़ासा प्रभाव है, वे आर्थिक रूप से भी मज़बूत हैं. पाटीदारों के बीच सामुदायिक समझ भी काफी बेहतर है, इसी का नतीजा है कि वे बंधुआ मजदूरी से उभरते हुए अब सामाजिक, व्यवसायिक और राजनीतिक रूप से मजबूत हुए हैं.

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पाटीदारों का दखल

गुजरात की 6 करोड़ 30 लाख की कुल आबादी में पाटीदारों का हिस्सा 14 प्रतिशत है और कुल वोटरों की बात करें तो उसमें पाटीदार 21 प्रतिशत हैं. आनंदीबेन पटेल की 24 सदस्यीय कैबिनेट में 8 मंत्री इसी समुदाय से आते थे. राज्य के कुल 182 विधायकों में से 42 विधायक पटेल हैं.

स्कूल और कॉलेजों में मजबूत पकड़ रखने वाले पटेलों को पहली बार दरकिनार होने का एहसास कांग्रेस के राज में हुआ था. 1985 में जब माधवसिंह सोलंकी गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब वे KHAM फॉर्मूला लेकर आए. इसका मतलब था K-क्षत्रिय, H-हरिजन, A-आदिवासी और M-मुस्लिमों का गठजोड़.

इस फॉर्मूले की मदद से कांग्रेस ने उस समय गुजरात में ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए 149 सीटें जीती थीं. तब पाटीदारों का झुकाव पटेलों के नेतृत्व वाले जनता दल की तरफ हो गया और बाद में वे बीजेपी की तरफ जाने लगे जिससे कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया जा सके.

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पाटीदार समुदाय

साल 1985 में ज़बरदस्त बहुमत पाने के बाद भी सोलंकी सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने में कामयाब नहीं रहे. उन्होंने ओबीसी आरक्षण को 27 प्रतिशत तक बढ़ाने का फ़ैसला लिया था जिसकी वजह से उन्हें आरक्षण विरोधी आंदोलन का सामना करना पड़ा.

आज आरक्षण की मांग करने वाले पाटीदार उस समय आरक्षण विरोधी गुट के अगुवा थे. धीरे-धीरे ये आंदोलन उग्र होने लगा था जिसके फलस्वरूप राजीव गांधी को सोलंकी को केंद्रीय मंत्री बनाकर दिल्ली वापस बुलाना पड़ा.

यही पाटीदार समुदाय जो कभी बीजेपी का बड़ा वोटबैंक था, आज आरक्षण की मांग के चलते बीजेपी को नुकसान पहुंचाने पर उतारू है. नवंबर 2015 में हुए गुजरात के स्थानीय निकाय चुनावों में ये पाटीदार ही थे जो सत्तारूढ़ बीजेपी के ख़िलाफ़ मुखर हुए और इसी चुनाव से कांग्रेस को नई जान मिली.

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स्थानीय निकाय चुनाव

हालांकि बीजेपी ने शहरी इलाकों के सभी नगर निगम अपने सियासी किले में बरकरार रखे, लेकिन उसकी जीत का मार्जिन जरूर घटा. ग्रामीण इलाकों में पार्टी को भारी नुक़सान हुआ. कांग्रेस गुजरात की 31 ज़िला पंचायतों में से 23 पर और 230 तहसील पंचायतों में 192 पर कब्ज़ा करने में कामयाब रही.

बीजेपी को 67 तहसील पंचायतों से संतोष करना पड़ा. कम से कम आठ ज़िले ऐसे थे जहां बीजेपी एक भी तहसील सीट जीतने में नाकाम रही. साल 2010 में बीजेपी ने स्थानीय निकाय की 323 सीटों में से 83 फीसदी यानी 269 सीटें जीत ली थीं.

साल 2015 में बीजेपी ने अपनी जीती सीटों में से 44 फीसदी सीटें गंवा दी और उसके ख़ाते में केवल 126 सीटें आईं. साल 2010 में बीजेपी ने 24 ज़िला पंचायतों में से 547 सीटों पर जीत दर्ज की. इस बार 31 ज़िला पंचायतों में कांग्रेस ने 596 सीटें जीतीं.

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कांग्रेस का भरोसा

दिल्ली जाने से पहले गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए मोदी के खाते में कामयाबी के कई रिकॉर्ड दर्ज हैं, 31 ज़िला पंचायतों में से 30, 230 तहसील पंचायतों में से 192, 56 स्थानीय निकायों में 49 और राज्य के सभी आठ नगर निगमों पर बीजेपी ने जीत दर्ज की.

मोदी को गुजरात से गए अभी तीन साल ही बीते थे कि राज्य में पार्टी की स्थिति बिगड़ने लगी. अब बीजेपी को घबराबट हो रही है कि इन हालात से कैसे निपटा जाए. दूसरी तरफ़ अपने अतीत के साए में सिकुड़ी कांग्रेस का भरोसा लौटता हुआ दिख रहा है.

और वो इस साल दिसंबर में होने वाले विधानसभा चुनाव में बीजेपी से दो-दो हाथ करने के लिए तैयार है. ऐसा नहीं है कि बीजेपी सरकार ने पाटीदारों का समर्थन बरकरार रखने के लिए कोशिश नहीं की. पिछले साल उसने आर्थिक रूप से पिछड़े तबके के लिए 10 फ़ीसदी कोटे का प्रावधान किया.

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आरक्षण की ज़रूरत?

लेकिन 8 अगस्त को हाई कोर्ट ने इस कोटे को ख़ारिज कर दिया. ये मुद्दा एक बार फिर से उस वक्त जोर पकड़ा जब हार्दिक पटेल ने कहा कि वे पाटीदारों के आरक्षण के बदले कांग्रेस को समर्थन दे सकते हैं. 22 नवंबर को हार्दिक ने घोषणा की कि उन्होंने पाटीदारों के आरक्षण के लिए कांग्रेस का प्रस्ताव मान लिया है बशर्ते पार्टी सत्ता में आ जाए.

एक सवाल ये भी है कि गुजरात में अपेक्षाकृत संपन्न माने जाने वाले पाटीदारों को आरक्षण की क्या वाकई में जरूरत है. इसका फौरी जवाब है नहीं. लेकिन हार्दिक को ऐसा नहीं लगता. उनका कहना है कि लोग दूध की बाल्टी में सतह पर मौजूद क्रीम को देखते हैं और अपने नतीजे निकाल लेते हैं.

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हार्दिक पटेल का दावा है कि उनके समुदाय के 60 फीसदी लोग गरीब हैं. हकीकत में पुराने लोगों का कहना है कि आज़ादी से पहले के भारत में पटेल खेतीहर मजदूर के तौर पर काम करते थे जो राजपूत किसानों के लिए काम करते थे, लेकिन वक्त के साथ-साथ वे ज़मीनों के मालिक बन गए.

ब्राह्मण समाज के डॉक्टर सुमित व्यास का कहना है, "राज्य में दूसरी ऐसी जातियां भी हैं जिनकी हालत पाटीदारों से ज्यादा ख़राब है, पाटीदार तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति में हैं. लेकिन दूसरी जातियों के पास न तो वो राजनीतिक और न ही आर्थिक हैसियत है जिससे सरकार पर अपनी मांगों के लिए वे दबाव बना सकें."

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