गलत नहीं कह रहे नरेंद्र मोदी, असम है बांग्‍लादेशी आतंकियों की पनाहगार

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गुवाहाटी। असम में जारी हिंसा में अब तक 40 लोगों की मौत हो चुकी है और इस राज्‍य में अभी भी हिंसा और तनाव की स्थिति बरकरार है। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि आखिर इतने दिनों से शांत असम में आखिर अचानक से ही क्‍या हो गया जो हालात इतने बिगड़ गए। लोगों की मौत और हिंसा के बीच ही इस मुद्दे पर राजनीति भी जारी है।

कुछ दिनों पहले नरेंद्र मोदी ने अपनी रैली में असम में मौजूद बांग्‍लादेशी नागरिकों का मुद्दा उठाया था और माना जा रहा है कि इसके बाद से ही यहां पर हालात बिगड़ने शुरू हो गए हैं। कहीं न कहीं नरेंद्र मोदी की उस बात में कुछ हद तक सच्‍चाई भी है जिसमें उन्‍होंने कहा था कि बांग्‍लादेशी घुसपैठी देश से बाहर जाएं क्‍योंकि असम में अगर आज हालात बिगड़े हैं तो इसकी वजह बांग्‍लादेश से आने वाले वह अातंकी हैं जिनके लिए असम एक सुरक्षित पनाहगार के तौर पर तब्‍दील हो गया है।

हकीकत यह है कि असम में तो 70 के दशक से ही ऐसे हालात हैं। अक्‍सर देश में कश्‍मीर के हालातों पर चर्चा होती है जबकि असम के हालात भी कश्‍मीर से कोई ज्‍यादा अलग नहीं हैं। अगर कोई एक बात इस हिस्‍से को कश्‍मीर से अलग करती है तो वह है कि यहां पर पड़ोसी मुल्‍क पाकिस्‍तान की तरह कोई भी हस्‍तक्षेप नहीं है। फिर भी आतंकी तत्‍व यहां पर सक्रिय हैं। न सिर्फ असम बल्कि पूरे नॉर्थ-र्इस्‍ट भारत के हालात ऐसे ही हैं।

'सेवेन सिस्‍टर्स' बनीं मुसीबत की बड़ी वजह
नॉर्थ ईस्‍ट जो देश के 23 किमी के इलाके में फैला है उसे सिलिगुड़ी कॉरीडोर के नाम से जाना जाता है। यहां पर कई तरह के क्षेत्रीय आतंकी समूह पिछले कई वर्षों से सक्रिय हैं। इनमें से कुछ समूह जहां इसे इलाके को अलग

राज्‍य घोषित करने की मांग करते रहते हैं तो कुछ इसकी स्‍वायत्‍ता की मांग करते आ रहे हैं। वही कुछ समूहों की मांग है इसे पूरी तरह से आजाद घोषित कर देश से अलग कर दिया जाए।

देश का यह उत्‍तरी-पूर्वी हिस्‍सा सात छोटे-छोटे राज्‍यों से मिलकर बना है। यह राज्‍य हैं असम, मेघालय, त्रिपुरा, अरुणांचल प्रदेश, मिजोरम, मणिपुर और नागालैंड। इन सात राज्‍यों को 'सेवेन सिस्‍टर्स' के नाम से लोकप्रियता हासिल है।

शायद यही 'सेवेन सिस्‍टर्स' कभी असम तो कभी त्रिपुरा में मुसीबत की वजह बन जाती हैं। इन सभी इलाकों की आबादी जनजातीय लोगों और दूसरे राज्‍यों के लोगों को मिलाकर बनी है। राज्‍य और केंद्र सरकारों ने यहां के लोगों का जीवनस्‍तर ऊपर उठाने की कई कोशिशें की हैं लेकिन इसके बाद भी असम, मणिपुर, नागालैंड और त्रिपुरा में हालात खराब होते जा रहे हैं।

इन इलाकों में अभी भी आतंकी तत्‍व मौजूद हैं और वह यहां पर स्थिरता पैदा करते रहते हैं।

आतंकियों की पनाहगार बन गया असम
पिछले दिनों नरेंद्र मोदी ने अपनी एक रैली में असम में मौजूद बांग्‍लादेशी नागरिकों का मुद्दा उठाया था। मोदी के इस बयान पर बहुत हंगामा मचा लेकिन मोदी ने कुछ भी गलत नहीं कहा था। बांग्‍लादेश और भूटान की सीमा से सटे होने की वजह से ही असम पिछले कई वर्षों से आतंकियों के लिए पनाहगार साबित होता आ रहा है।

1980 से असम में कई तरह के विरोधों की शुरुआत हुई थी जिसमें से यहां पर मौजूद विदेशी नागरिकों के खिलाफ शुरू होने वाले विरोध की शुरुआत भी शामिल थी। इसके साथ ही यहां पर असम-बोडो तनाव की शुरुआत होने लगी। आज असम में हालात यह हैं कि यहां पर मौजूद तनाव को विशेषज्ञ 'अत्‍यधिक सक्रिय' करार देने लगे हैं।

चुनावी माहौल बिगाड़ने की साजिश
असम में इस समय एक-दो नहीं बल्कि चार असम विरोधी तत्‍व पूरी तरह से सक्रिय हैं। जिनमें से उल्‍फा सबसे अहम है। उल्‍फा के अलावा यहां पर नेशनल डेमोक्रेटिक फ्रंट ऑफ बोडोलैंड जिसे बोडो सिक्‍योरिटी फोर्स के नाम से जाना जाता है वह भी काफी तेजी से सक्रिय है।

बोडोलैंड के अलावा कारबी लोंगरी एनसी हिल्‍स लिब्रेशन फ्रंट यानी केएलएनएफ और यूपीडीएस यानी यूनाइटेड पीपुल्‍स डेमोक्रेटिक सॉलिडीट्री आतंकी समूह भी सक्रिय है। विशेषज्ञ मानते हैं कि असम में जो भी हालात इस समय वह सिर्फ चुनाव में माहौल को बिगाड़ने की साजिश का हिस्‍सा हैं।

असम पिछले कुछ वर्षों से शांत था लेकिन एकाएक ही यहां पर माहौल बिगड़ना शुरू हुआ है। इस बात से इंकार करना कि गैर-प्रवासी भारतीयों की इसमें कोई भूमिका नहीं है, गलत होगा।

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