कांग्रेस से गठबंधन ना होने पर लाल पीले 'भगवा' क्यों हैं केजरीवाल?
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नई दिल्ली- आम आदमी पार्टी पहली बार कांग्रेस के खिलाफ मोर्चा खोलकर ही 2013 में दिल्ली की सत्ता में आई थी। वह सरकार भले ही 49 दिन तक चली हो, लेकिन तब कांग्रेस की बैसाखी के सहारे ही अरविंद केजरीवाल मुख्यमंत्री बने थे। 6 साल बाद केजरीवाल फिर से कांग्रेस पर उसी तरह लाल-पीले हो रहे हैं, लेकिन उनका रास्ता,उनका नजरिया और उनका मकसद अब पहले से काफी बदल चुका है। तब वो कांग्रेस के खिलाफ लड़कर आए थे, इसबार कांग्रेस से मिलकर लड़ने के रास्ते नहीं मिल पाने से विचलित हो रहे हैं। कांग्रेस को उनकी बिठायी सियासी गोटी में फिट होने में दिक्कत हो रही है, तो उन्हें 2013 की 'भ्रष्टाचारी' कांग्रेस में आज 'भगवाधारी' रूप नजर आ रहा है।

दिल्ली के तीन चुनावों का अंकगणित
केजरीवाल के 'भगवे' चश्मे का विश्लेषण करें,उससे पहले दिल्ली के सियासी अंकगणित को समझना बेहद जरूरी है। 2014 के आम चुनाव से लेकर अब तक दिल्ली में 3 चुनाव हो चुके हैं। इनमें से तीसरा और आखिरी चुनाव दिल्ली नगर निगम के लिए 2017 में हुआ था। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी का वोट शेयर, 2015 के विधानसभा चुनाव के 54.3% से घटकर सिर्फ 26% ही रह गया था। जबकि, इन दोनों चुनावों में बीजेपी और कांग्रेस का वोट शेयर बढ़कर क्रमश: 32.1% से 37% (बीजेपी) और 9.8% से बढ़कर 21% (कांग्रेस) तक पहुंच गया। वैसे 2014 के मोदी लहर की बात करें, तो उस वक्त बीजेपी को दिल्ली में 46.6%,एएपी को 33.1% और कांग्रेस को 15.2% वोट मिले थे।

केजरीवाल के 'भगवे' चश्मे का अंकगणित
अगर हम दिल्ली में पिछले तीन चुनावों का हिसाब लगाएं, तो आम आदमी पार्टी और उसके सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल की कांग्रेस से गठबंधन के उतावलेपन को समझा जा सकता है। 2015 के विधानसभा चुनावों में जब आम आदमी पार्टी ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया था, तब भी बीजेपी का वोट शेयर 32% से ज्यादा था। अब अगर केजरीवाल और उनकी टीम सबसे खराब प्रदर्शन यानी नगर निगम चुनाव को दिमाग में रखकर भी मैदान में उतरती है, तो कांग्रेस से उसके गठबंधन का मतलब है- दोनों का 47% के निर्णायक वोट शेयर पर कब्जा। वहीं 2014 के आंकड़ों के आधार पर भी देखें तो अगर दोनों उस समय भी मिलकर लड़तीं, तो उन्हें बीजेपी के 46.6% के मुकाबले 48.3% वोट मिलता। यानी आंकड़ों की मानें तो दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का गठबंधन आज भी अजेय गठबंधन बन सकता है।

एएपी और कांग्रेस के आकलन में फर्क समझिए
दिल्ली नगर निगम चुनाव ने प्रदेश कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं में नए सिरे से जान फूंक दिया है। विधानसभा चुनावों के मुकाबले तब कांग्रेस का प्रदर्शन वोट शेयर के हिसाब से तीनों पार्टियों में सबसे बेहतर रहा था। यानी कांग्रेस को लगता है कि विधानसभा चुनावों में उससे टूटकर आम आदमी पार्टी में गया उसका वोटर लोकसभा में फिर से उसके पास वापस आ सकता है। इसलिए, कहा जा रहा है कि कांग्रेस दिल्ली में 3+3+1 (कांग्रेस+एएपी+समर्थित निर्दलीय) के फॉर्मूले पर जोर दे रही थी। खबरों के मुताबिक वह विधानसभा चुनावों में भी गठबंधन जारी रखने की उम्मीद कर रही थी, लेकिन आम आदमी पार्टी की ओर से इस बात पर जो दिया जा रहा था, कि फिलहाल उनके लिए देश को बीजेपी से बचाना जरूरी है, इसलिए लोकसभा चुनावों पर ही बात होनी चाहिए। यही नहीं शायद केजरीवाल पंजाब में 6+6+1 और हरियाण में 4+4+2 पर भी डील चाहते थे। लेकिन, कांग्रेस इसके लिए तैयार नहीं हुई।

कांग्रेस के रेड सिंग्नल से ऐसे 'लाल' हुए केजरीवाल
दिल्ली की राजनीति में जो लोग थोड़ी भी दिलचस्पी रखते हैं, उन्हें मालूम है कि शुरू से केजरीवाल एंड कंपनी की ओर से ही गठबंधन के लिए ज्यादा हाथ-पैर मारे जा रहे हैं। जबकि, कांग्रेस का प्रदेश नेतृत्व शुरू से इसका खुलकर विरोध कर रहा था। केंद्र में कांग्रेस के इक्के-दुक्के नेता अगर इस गठबंधन के पक्ष में रहे भी हों, तो अजय माकन की जगह पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को कमान सौंपने से संकेत साफ था कि फर्स्ट फैमिली के दिमाग में कुछ और चल रहा है। जानकारों की राय में राजनीति में कुछ भी फाइनल नहीं होता, इसलिए नामांकन वापसी तक तालमेल का कोई फॉर्मूला निकल आए तो चौंकना भी नहीं चाहिए। लेकिन, फिलहाल कांग्रेस के आलाकमान ने गठबंधन पर रेड सिंग्नल देकर अरविंद केजरीवाल को लाल कर ही दिया है। इसलिए, जिनके साथ कल तक वो गठबंधन के लिए परेशान थे, अब उन्हीं पर बीजेपी के साथ गुप्त समझौते तक के आरोप लगा रहे हैं।
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