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क्या भारतीय मुसलमानों पर है अलग-थलग होने का ख़तरा: विश्लेषण

मुसलमान
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'धर्म संसद' में मुसलमानों को लेकर कही गई बातें, गुरुग्राम में जुमे की नमाज़ को लेकर विवाद, कर्नाटक में मुस्लिम महिला छात्रों के हिजाब पहन कर कॉलेज आने पर प्रतिबंध और अब एक अंतरराष्ट्रीय संस्था की ओर से नरसंहार की चेतावनी ने भारत में अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय की चिंताओं को बढ़ा दिया है.

अमेरिकी होलोकॉस्ट मेमोरियल म्यूज़ियम (USHMM) ने सामूहिक नरसंहार के जोख़िम वाले देशों की सूची में भारत को दूसरे स्थान पर रखा गया है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में बढ़ती मुस्लिम विरोधी भावनाओं को इसके पीछे की वजह बताया गया है.

हाल ही में हुई कुछ घटनाओं ने मुस्लिम समुदाय के बीच असुरक्षा और डर की भावनाओं को और गहरा किया है, जिनमें से एक है यति नरसिंहानंद की ओर से मुसलमानों के खिलाफ़ हिंसा का खुला आह्वान.

यति नरसिंहानंद की ओर से हरिद्वार में आयोजित 'धर्म संसद' के मामले में पुलिस ने काफ़ी आलोचना के बाद अब यति नरसिंहानंद को गिरफ़्तार तो कर लिया है लेकिन इस तरह एक आयोजन करके धर्म विशेष के खिलाफ़ हेट स्पीच को लेकर सरकार के सभी नेताओं ने चुप्पी साधे रखी है.

नरसंहार की चेतावनी

अमेरिका स्थित गैर-लाभकारी संगठन जेनोसाइड वॉच के संस्थापक प्रोफेसर ग्रेगरी स्टैंटन ने भारत में नरसंहार की चेतावनी दी है और कहा है कि मुस्लिम इसका लक्ष्य बन सकते हैं.

प्रोफेसर ग्रेगरी स्टैंटन ने ये बात 14 जनवरी को कही. उन्होंने 1994 में हुए रवांडा नरसंहार का भी पूर्वानुमान लगाया था.

उन्होंने कहा है, ''2002 में जब गुजरात में हुए दंगों में एक हज़ार से अधिक मुसलमान मारे गए थे तब से भारत में नरसंहार की चेतावनी पर जेनोसाइड वॉच मुखर रहा है. उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे. दरअसल, इस बात के कई सारे सबूत हैं कि उन्होंने उन नरसंहारों को बढ़ावा दिया. ''

स्टैंटन ने कहा कि मोदी का राजनीतिक जीवन मुस्लिम-विरोधी और इस्लामोफोबिक बयानबाज़ी पर आधारित है.

अंग्रेज़ी वेबसाइट द क्विंट ने स्टैंटन के बयान को कोट करते हुए लिखा है कि 'नरसंहार एक घटना नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया' के तहत किया गया जाता रहा है.

इस रिपोर्ट में स्टैंटन के हवाले से लिखा गया है कि उन्होंने नरसिंहानंद के उत्तराखंड में आयोजित धर्म संसद को लेकर कहा, ''हमें लगता है कि हरिद्वार में आयोजित इस सभा का खास मकसद नरसंहार के लिए लोगों को उकसाना ही था. ''

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फ़ैक्ट चेक वेबसाइट बूम के मुताबिक़ स्टैंटन ने कहा कि धर्म संसद में जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल किया गया वह मुसलमानों का अमानवीकरण करने जैसा था.

14 जनवरी को समाचार पत्र द टेलीग्राफ ने कहा कि यूएसएचएमएम की 'प्रारंभिक चेतावनी प्रोजक्ट' भारत के संदर्भ में कहता है, ''हमारे सांख्यिकीय मॉडल का अनुमान है कि 2021-2022 में भारत में 14.4 प्रतिशत (लगभग 7 में से 1) नरसंहार होने की संभावना है.''

इसके अलावा, गुरुग्राम में दक्षिणपंथी समूहों की ओर से जुमे की नमाज़ रोकने, कश्मीर में लगातार 24 सप्ताह तक जामिया मस्जिद को बंद रखने और मुस्लिम छात्राओं के सरकारी स्कूलों में हिजाब और बुर्का पहने पर प्रवेश रोकने जैसी घटनाओं ने मुसलमानों के भीतर डर का माहौल पैदा किया है.

हाल ही में कर्नाटक के एक सरकारी कॉलेज ने हिजाब पहन कर छात्राओं के कॉलेज आने पर रोक लगा दी.

सरकार की चुप्पी

केंद्र सरकार, अपनी ओर से, धार्मिक हिंसा की घटनाओं पर चुप्पी साधे हुए है. विश्लेषकों का मानना है कि दक्षिणपंथी समूह, सरकार की इस चुप्पी को सरकार की ओर से समर्थन के रूप में देखते हैं.

कुछ भारतीय अख़बारों ने बीजेपी सरकार की इस चुप्पी पर सवाल उठाए हैं. उर्दू दैनिक अख़बार इंकलाब में छपे एक संपादकीय में कहा गया कि 'देश में उकसावे के ख़िलाफ़ आवाज़ देश के बाहर और भीतर से उठाई जा रही है, इसके बावजूद, सत्ताधारी दल के किसी भी प्रभावशाली नेता ने ऐसे हिंसक भाषणों की निंदा नहीं की है. उनका मौन ही एकमात्र प्रतिक्रिया है."

विपक्ष ने भी सरकार के उदासीन रवैये की आलोचना की है.

उर्दू भाषा के अख़बार कौमी आवाज़ ने जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी के प्रमुख फ़ारूख़ अब्दुल्ला के हवाले से लिखा कि नफ़रत भरे भाषणों को लेकर सरकारी हलकों में "आपराधिक चुप्पी" ने गंभीर सवाल उठाए हैं.

धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को बचाने लिए भारतीय मुस्लिम समाज (नागरिक समाज के सदस्यों के एक समूह) के 278 लोगों के हस्ताक्षर वाले एक बयान में कहा, "किसी भी भारतीय को पीएम मोदी की चौंकाने वाली चुप्पी से आश्चर्यचकित होना चाहिए."

वेबसाइट द वायर की एक रिपोर्ट में इस पत्र के हवाले से कहा गया, "पीएम का मौन अक्षम्य है."

न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपने एक लेख में लिखा कि प्रधानमंत्री मोदी ने "एक चुप्पी साधे रखी है, विश्लेषकों का कहना है कि उनका इस तरह चुप रहना ऐसा करने वालों के लिए एक सकारात्मक मौन सहमति की तरह है.''

अल जज़ीरा की 16 जनवरी की एक रिपोर्ट के हवाले से बीजेपी सरकार के प्रवक्ता सैयद ज़फ़र इस्लाम ने धार्मिक हिंसा के दावों को खारिज करते हुए कहा, "ऐसी कोई चीज़ मौजूद नहीं है जिसे चित्रित किया जा रहा है."

पाकिस्तान ने जताई चिंता

पाकिस्तान ने मुसलमानों के कथित 'नरसंहार' के इस तरह आह्वान करने को लेकर गहरी चिंता व्यक्त की है, साथ ही जेनोसाइड वॉच की इस रिपोर्ट पर अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों का ध्यान भी आकर्षित किया है.

अंग्रेजी अख़बार द इंडियन एक्सप्रेस ने 28 दिसंबर को एक रिपोर्ट छापी जिसमें लिखा कि पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय ने इस्लामाबाद स्थित भारतीय उच्चायोग में सबसे वरिष्ठ भारतीय राजनयिक को तलब किया था और उनसे हिंदुत्वादी संगठन के लोगों की ओर से इस तरह जनसंहार की खुली चेतावनी देने पर गंभीर चिंता व्यक्त की.

पाकिस्तान के अंग्रेज़ी अख़बार द नेशन ने विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी असीम इफ़्तेख़ार अहमद के हवाले से लिखा कि जेनोसाइड वॉच की रिपोर्ट भारत में रह रहे 20 करोड़ मुसलमानों को लेकर गंभीर चिंता पैदा करती है.

इस रिपोर्ट में लिखा गया कि अहमद ने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, विशेष रूप से संयुक्त राष्ट्र से इस मामले पर ध्यान देने की अपील करते हुए कहा कि पाकिस्तान पहले भी भारतीय मुसलमानों को लेकर अपनी चिंताएं व्यक्त करता रहा है.

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'संप्रदयिकता बीजेपी का पुरकाना हथकंडा'

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम विरोधी बयानबाजी में वृद्धि देश के पांच राज्यों में होने वाले चुनावों को देखते हुए किया जा रहा है. ये बीजेपी की "डायवर्ज़न (भटकाव) की रणनीति" है.

आलोचक मानते हैं कि संप्रदायिकता से लोगों को भटकाने की नीति बीजेपी के लिए आज़माया हुआ हथकंडा है. वह मुद्रास्फीति और बेरोज़गारी जैसे मुद्दों से भटकाने के लिए फिर सांप्रदायिकता का सहारा ले रही है.

ब्लूमबर्ग में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक़ धर्म संसद जैसे आयोजन के पीछे आने वाले विधानसभा चुनाव अहम वजह हो सकते हैं.

हालांकि द वायर में छपे एक लेख के मुताबिक, बीजेपी के नेताओं ने बार-बार दिखाया है कि "सांप्रदायिकता अस्थायी नहीं है". चुनावों के समय ये सच्ची और प्रामाणिक लगे इसके लिए लिए इसे रोज़मर्रा की जिंदगी में एक नियमित अभ्यास में बदला जा रहा है.

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