संविधान में SC-HC जजों की नियुक्ति में आरक्षण की व्यवस्था नहीं, लेकिन....... किरेन रिजिजू
कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने संसद में सवालों का जवाब देते हुए स्पष्ट किया है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम के जजों की नियुक्ति संवैधानिक व्यवस्था के तहत होती है। इसमें आरक्षण का प्रावधान नहीं है।

संसद में उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति को लेकर पूछे गए सवाल के जवाब में कानून मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा है कि हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियुक्ति के लिए वही प्रक्रिया अपनाई जाती है, जो संविधान में दी गयी है। उन्होंने कहा है कि संविधान में उच्च न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति के लिए आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। फिर भी सरकार अपनी से पहल करती रही है कि हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति के दौरान सामाजिक विविधता बनाई रखी जाए।

'संविधान में SC-HC जजों की नियुक्ति में आरक्षण की व्यवस्था नहीं'
केंद्रीय काननू मंत्री किरेन रिजिजू ने संसद में एक सवाल के जवाब में गुरुवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति भारत के संविधान के अनुच्छेद 124, 217 और 224 के तहत की जाती है, जिसमें जाति या वर्ग के आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। हालांकि, उन्होंने कहा कि सरकार हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों से अनुरोध करती रही है कि जजों की नियुक्तियों के लिए प्रस्ताव भेजते समय अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यको और महिलाओं के योग्य उम्मीदारों का नाम भी भेजें, ताकि हाई कोर्ट के जजों की नियुक्ति में सामाजिक विविधता सुनिश्चित की जा सके।

हाई कोर्ट में 106 महिला जज कार्यकर्त- किरेन रिजिजू
इस बीच कानून मंत्री रिजिजू ने ये भी कहा कि 31 जनवरी तक पूरे देश के हाई कोर्ट में 775 जज कार्यरत थे, जिनमें से 106 महिलाएं हैं। इस तरह से हाई कोर्ट में कार्यरत महिला जजों की संख्या 9.5 फीसदी है। उनके मुताबिक हाई कोर्ट में जजों के स्वीकृत पदों की संख्या 1108 है। कानून मंत्री ने संसद में यह भी कहा कि जिला और निचली अदालतों में जजों और न्यायिक अधिकारियों की नियुक्ति का कार्य हाई कोर्ट और संबंधित राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है।

निचली अदालतों में नियुक्तियां
सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2007 में मलिक मजहर सुल्तान केस में एक न्यायिक आदेश के माध्यम से कहा था कि निचली अदालतों में जजों की नियुक्ति की प्रक्रिया एक कैलेंडर वर्ष के 31 मार्च को शुरू होगी और उसी साल 31 अक्टूबर तक पूरी कर ली जाएगी। इस केस में सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों में बड़ी संख्या में खाली पदों को देखते हुए स्वत: संज्ञान लिया था और राज्य सरकारों/ केंद्र शासित प्रदेशों और वहां के हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया था कि न्यायिक रिक्तियों के बारे में सूचना दें। इस न्यायिक आदेश के तहत सुप्रीम कोर्ट इन रिक्त पदों पर भर्तियों की निगरानी कर रहा है।

768 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट स्थापित किए गए
कानून मंत्री ने उनके मंत्रालय से पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए संसद को यह भी बताया कि FTSC स्कीम के तहत 768 फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट स्थापित किए गए, जिनमें यौन उत्पीड़न और POCSO केसों के लिए 418 POCSO कोर्ट भी शामिल हैं। ताकि, सर्वाइवर पर को जल्द से जल्द न्याय दिलाया जा सके। क्योंकि, इन मामलों को सामान्य अदालतों के भरोसे छोड़ने पर न्याय दिलाने में बहुत लंबा वक्त निकल सकता है।
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उच्च न्यायपालिका में सामाजिक संतुलन की उठती रही है बात
हाल के दिनों में उच्च न्यायपालिका में नियुक्तियों को लेकर कानून मंत्री किरेन रिजिजू काफी मुखर देखे गए हैं। जजों की नियुक्ति में कॉलिजियम सिस्टम उनके निशाने पर रहा है। दूसरी तरफ एक वर्ग बार-बार न्यायपालिका में सामाजिक संतुलन का मुद्दा उठाता रहा है। यही वजह है कि इससे संबंधित सवालों के जवाब में सरकार की ओर से कानून मंत्री ने संवैधानिक स्थिति सदन में स्पष्ट करने की कोशिश की है। (इनपुट-एएनआई और तस्वीरें-फाइल)












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